क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?

क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?

क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?       अगर हम पुरातन भारतीय समाज की महिलाओं की स्थित की तुलना आज के भारतीय समाज से करें तो हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं! रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, मार-पीट, हत्या, बलात्कार जैसी तमाम अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सरकारें चाहे वे केंद्र की हों या फिर राज्य की आये दिन नये नये कानून बनाती जा रही हैं फिर भी हिंसा पर काबू नहीं हो रहा है, क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?       मेरे देखे! भारत में जो महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा होती है, मारपीट होती है या फिर उन्हें घर के भीतर ही जलाकर मार डाला जाता है ऐसी आपराधिक घटनाओं के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे द्वारा बनाये गए वे मूढ़ नियम कानून ही जिम्मेवार हैं जो महिलाओं को उसी डाल को काटने के लिए मजबूर करते हैं जिस डाल पर उनका आशियाना टिका होता है, उन नियमों के चलते पत्नी न चाहते हुए भी अपने उसी पति को जेल ठूंसवाने के लिए मजबूर हो जाती है जो उसे दो वक्त की रोटी कमाकर खिलाता था! इस तरह के नियम कानून बनाने वाले मूढ़ो को यह भी समझ में नहीं आता कि जब आशियाना ही उजड़ जायेगा, जब वह डाल ही काट दी जायेगी, जब वह पति ही जेल में ठूंस दिया जायेगा तब वह महिला जिसके छोटे छोटे बच्चे होंगे वह कहाँ से अपने और अपने बच्चों का भरणपोषण करेगी! पति से अलगाव होने के बाद इस तरह की महिलाएं जिनके पतियों पर पत्नियों द्वारा मुकदमें चलवाये जा रहे हैं या फिर उनके पतियों को झूंठे केसों में जेलों में ठुंसवाया जा रहा है उनके न रहने पर वे मजबूरी में वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होने लगती हैं! भारत में यह जो बेसवाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है इसमें हमारे नियम कानूनों का बहुत बड़ा हांथ है!       वषोॅ से भारत की सामाजिक नीति व्यवस्था ऐसे मूढ़ो द्वारा तय की जाती रही है जिन्हें किसी भी तरह के गृहस्थ जीवन का रत्ती भर भी अनुभव नहीं रहा है फिर वे चाहे सतयुग के वशिष्ठ हों या फिर कलयुग के मोदी योगी इनमें से किसी को भी घरेलू समस्याओं का कोई अनुभव नहीं था! हजारों सालों से भारतीय धर्म ग्रंथ समझाते आयें हैं कि 'स्त्री बालक एक समाना, स्त्री और बालक एक समान होते हैं, क्षण में रुठना और क्षणभर में ही मान जाना उनका स्वभाव होता है बावजूद इसके स्त्रियों को उकसाने के लिए नित नये नये नियम बनाये जा रहे हैं, नारी शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है और यह सब उसी परिवार, उसी पुरुष के विरुद्ध किया जा रहा जिस पर वह निर्भर है!       जब कोई पति अपनी पत्नी की हरकतों से परेशान होकर उसे थप्पड़ मारता है या कुछ कहता है और वह रुठकर थाने चली जाती है तो थाने में पत्नी को समझाने बुझाने, डांटने डपटने के बजाय उसके पति को बुलाकर उसी के सामने पुलिसकर्मी उसके पति को जलील करते हैं उसके पति को कुत्ते की तरह मारते पीटते हैं जिससे पत्नी थोड़ी देर के लिए गदगद तो हो जाती है, लेकिन बाद में जब वह घर जाती है तब सब उलटा पुलटा हो जाता है आज तक जो पत्नी अपने पति का सम्मान करती थी, उसे पति परमेश्वर मानती थी वही अब पति का शोषण शुरुं कर देती है! रोज रोज उनके रिश्ते बिगड़ते जाते हैं फिर एक दिन पति शराब पीकर आता है और पत्नी की हत्या कर देता है, फिर यही कानून पत्नी की हत्या के जुर्म में पति को फांसी पर चढा़ देता है, फिर उसके छोटे छोटे बच्चे बेसहारा होकर सड़कों पर भीख मांगने लगते हैं, चोरी करने लगते हैं, फिर यही कानून इन बच्चों को भी अपराधी मानकर सजा सुनाने लगता है और हम सब गधों की तरह ताली और थाली बजाने लगते हैं! जय हो भारतीय कानून व्यवस्था की!       यह जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए नीति नियम बनाये जा रहे हैं इनसे कोई महिलाओं की रक्षा नहीं होने वाली है और महिलाओं को भी यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए इसलिए ऐसे कानूनों का समर्थन करना चाहिए जो उनकी अपनी नींव को नुकसान न पहुंचाते हों! पति और पति का परिवार उनकी बुनियाद है ये कानून उस बुनियाद को दुरुस्त नहीं करते हैं बल्कि उसे ढहा देते हैं जिसमें वह महिला भी दबकर मर जाती है!       अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक और नया मूढ़तापूर्ण नियम उन महिलाओं के लिए निकाला है जिनके पतियों पर मुकदमे चल रहे हैं या उनके पति घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के केसों में हवालात में बन्द हैं! सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी महिलाएं जिनके पति जेलों में बन्द हैं या जिनके तलाक के केस चल रहे हैं वे महिलाएं अब अलग न रहकर पति के घर में या पति के किसी रिश्तेदार के घर बेझिझक रह सकती हैं! अब इन मूढ़ो को मनुष्य के मनोविज्ञान का कोई भी ज्ञान नहीं है! इन्हें नहीं मालुम कि जिस माँ बाप के बेटे को बहू ने जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया होगा और स्वयं दूसरे पुरुषों के साथ रंगरलिया मना रही होगी वह बहु यदि उस घर में जायेगी तो वह कैसे सुरक्षित बचेगी! इसलिए मैं महिलाओं से निवेदन करुंगा कि थोड़ा अपनी बुद्धि और विवेक का भी उपयोग करें अगर आपका चाल चलन सामाजिक है और सास ससुर से अच्छी बनती है सिर्फ पति से ही मनमुटाव था तो ही इस नियम का पालन करें!       अगर महिलाओं को पुरुषों के शोषण से बचाना है, उन्हें बराबरी का मान सम्मान देना है, अगर हम सच में चाहते हैं कि घरेलू हिंसा कम हो, महिलाओं को घरों में न सताया जाए तो बराबरी का कानून बनाना पड़ेगा!  एकतरफा कानून से कोई समाधान न होगा, इसमें पुरुषों की बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रयास करना चाहिए, उन्हें स्वयं ही मांग उठानी चाहिए,आंदोलन करने चाहिए, धरने प्रदर्शन करने चाहिए जिससे जल्दी से जल्दी पुरुष आयोग बने जहाँ महिला को सजा देने का प्रावधान हो, महिला की शक्ति बढ़ाने की जरूरत नहीं है परमात्मा ने उसे पहले ही शक्तिशाली बनाया है, उसमें और कुछ जोड़ने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ उसकी शक्ति को दिशा देने की जरूरत है हम नारी शक्ति को अपनी ही बुनियाद, अपने ही पैर काटने में नष्ट कर रहे हैं!

     अगर हम पुरातन भारतीय समाज की महिलाओं की स्थित की तुलना आज के भारतीय समाज से करें तो हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं! रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, मार-पीट, हत्या, बलात्कार जैसी तमाम अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सरकारें चाहे वे केंद्र की हों या फिर राज्य की आये दिन नये नये कानून बनाती जा रही हैं फिर भी हिंसा पर काबू नहीं हो रहा है, क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?

     मेरे देखे! भारत में जो महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा होती है, मारपीट होती है या फिर उन्हें घर के भीतर ही जलाकर मार डाला जाता है ऐसी आपराधिक घटनाओं के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे द्वारा बनाये गए वे मूढ़ नियम कानून ही जिम्मेवार हैं जो महिलाओं को उसी डाल को काटने के लिए मजबूर करते हैं जिस डाल पर उनका आशियाना टिका होता है, उन नियमों के चलते पत्नी न चाहते हुए भी अपने उसी पति को जेल ठूंसवाने के लिए मजबूर हो जाती है जो उसे दो वक्त की रोटी कमाकर खिलाता था! इस तरह के नियम कानून बनाने वाले मूढ़ो को यह भी समझ में नहीं आता कि जब आशियाना ही उजड़ जायेगा, जब वह डाल ही काट दी जायेगी, जब वह पति ही जेल में ठूंस दिया जायेगा तब वह महिला जिसके छोटे छोटे बच्चे होंगे वह कहाँ से अपने और अपने बच्चों का भरणपोषण करेगी! पति से अलगाव होने के बाद इस तरह की महिलाएं जिनके पतियों पर पत्नियों द्वारा मुकदमें चलवाये जा रहे हैं या फिर उनके पतियों को झूंठे केसों में जेलों में ठुंसवाया जा रहा है उनके न रहने पर वे मजबूरी में वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होने लगती हैं! भारत में यह जो बेसवाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है इसमें हमारे नियम कानूनों का बहुत बड़ा हांथ है!

क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?       अगर हम पुरातन भारतीय समाज की महिलाओं की स्थित की तुलना आज के भारतीय समाज से करें तो हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं! रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, मार-पीट, हत्या, बलात्कार जैसी तमाम अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सरकारें चाहे वे केंद्र की हों या फिर राज्य की आये दिन नये नये कानून बनाती जा रही हैं फिर भी हिंसा पर काबू नहीं हो रहा है, क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?       मेरे देखे! भारत में जो महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा होती है, मारपीट होती है या फिर उन्हें घर के भीतर ही जलाकर मार डाला जाता है ऐसी आपराधिक घटनाओं के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे द्वारा बनाये गए वे मूढ़ नियम कानून ही जिम्मेवार हैं जो महिलाओं को उसी डाल को काटने के लिए मजबूर करते हैं जिस डाल पर उनका आशियाना टिका होता है, उन नियमों के चलते पत्नी न चाहते हुए भी अपने उसी पति को जेल ठूंसवाने के लिए मजबूर हो जाती है जो उसे दो वक्त की रोटी कमाकर खिलाता था! इस तरह के नियम कानून बनाने वाले मूढ़ो को यह भी समझ में नहीं आता कि जब आशियाना ही उजड़ जायेगा, जब वह डाल ही काट दी जायेगी, जब वह पति ही जेल में ठूंस दिया जायेगा तब वह महिला जिसके छोटे छोटे बच्चे होंगे वह कहाँ से अपने और अपने बच्चों का भरणपोषण करेगी! पति से अलगाव होने के बाद इस तरह की महिलाएं जिनके पतियों पर पत्नियों द्वारा मुकदमें चलवाये जा रहे हैं या फिर उनके पतियों को झूंठे केसों में जेलों में ठुंसवाया जा रहा है उनके न रहने पर वे मजबूरी में वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होने लगती हैं! भारत में यह जो बेसवाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है इसमें हमारे नियम कानूनों का बहुत बड़ा हांथ है!       वषोॅ से भारत की सामाजिक नीति व्यवस्था ऐसे मूढ़ो द्वारा तय की जाती रही है जिन्हें किसी भी तरह के गृहस्थ जीवन का रत्ती भर भी अनुभव नहीं रहा है फिर वे चाहे सतयुग के वशिष्ठ हों या फिर कलयुग के मोदी योगी इनमें से किसी को भी घरेलू समस्याओं का कोई अनुभव नहीं था! हजारों सालों से भारतीय धर्म ग्रंथ समझाते आयें हैं कि 'स्त्री बालक एक समाना, स्त्री और बालक एक समान होते हैं, क्षण में रुठना और क्षणभर में ही मान जाना उनका स्वभाव होता है बावजूद इसके स्त्रियों को उकसाने के लिए नित नये नये नियम बनाये जा रहे हैं, नारी शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है और यह सब उसी परिवार, उसी पुरुष के विरुद्ध किया जा रहा जिस पर वह निर्भर है!       जब कोई पति अपनी पत्नी की हरकतों से परेशान होकर उसे थप्पड़ मारता है या कुछ कहता है और वह रुठकर थाने चली जाती है तो थाने में पत्नी को समझाने बुझाने, डांटने डपटने के बजाय उसके पति को बुलाकर उसी के सामने पुलिसकर्मी उसके पति को जलील करते हैं उसके पति को कुत्ते की तरह मारते पीटते हैं जिससे पत्नी थोड़ी देर के लिए गदगद तो हो जाती है, लेकिन बाद में जब वह घर जाती है तब सब उलटा पुलटा हो जाता है आज तक जो पत्नी अपने पति का सम्मान करती थी, उसे पति परमेश्वर मानती थी वही अब पति का शोषण शुरुं कर देती है! रोज रोज उनके रिश्ते बिगड़ते जाते हैं फिर एक दिन पति शराब पीकर आता है और पत्नी की हत्या कर देता है, फिर यही कानून पत्नी की हत्या के जुर्म में पति को फांसी पर चढा़ देता है, फिर उसके छोटे छोटे बच्चे बेसहारा होकर सड़कों पर भीख मांगने लगते हैं, चोरी करने लगते हैं, फिर यही कानून इन बच्चों को भी अपराधी मानकर सजा सुनाने लगता है और हम सब गधों की तरह ताली और थाली बजाने लगते हैं! जय हो भारतीय कानून व्यवस्था की!       यह जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए नीति नियम बनाये जा रहे हैं इनसे कोई महिलाओं की रक्षा नहीं होने वाली है और महिलाओं को भी यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए इसलिए ऐसे कानूनों का समर्थन करना चाहिए जो उनकी अपनी नींव को नुकसान न पहुंचाते हों! पति और पति का परिवार उनकी बुनियाद है ये कानून उस बुनियाद को दुरुस्त नहीं करते हैं बल्कि उसे ढहा देते हैं जिसमें वह महिला भी दबकर मर जाती है!       अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक और नया मूढ़तापूर्ण नियम उन महिलाओं के लिए निकाला है जिनके पतियों पर मुकदमे चल रहे हैं या उनके पति घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के केसों में हवालात में बन्द हैं! सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी महिलाएं जिनके पति जेलों में बन्द हैं या जिनके तलाक के केस चल रहे हैं वे महिलाएं अब अलग न रहकर पति के घर में या पति के किसी रिश्तेदार के घर बेझिझक रह सकती हैं! अब इन मूढ़ो को मनुष्य के मनोविज्ञान का कोई भी ज्ञान नहीं है! इन्हें नहीं मालुम कि जिस माँ बाप के बेटे को बहू ने जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया होगा और स्वयं दूसरे पुरुषों के साथ रंगरलिया मना रही होगी वह बहु यदि उस घर में जायेगी तो वह कैसे सुरक्षित बचेगी! इसलिए मैं महिलाओं से निवेदन करुंगा कि थोड़ा अपनी बुद्धि और विवेक का भी उपयोग करें अगर आपका चाल चलन सामाजिक है और सास ससुर से अच्छी बनती है सिर्फ पति से ही मनमुटाव था तो ही इस नियम का पालन करें!       अगर महिलाओं को पुरुषों के शोषण से बचाना है, उन्हें बराबरी का मान सम्मान देना है, अगर हम सच में चाहते हैं कि घरेलू हिंसा कम हो, महिलाओं को घरों में न सताया जाए तो बराबरी का कानून बनाना पड़ेगा!  एकतरफा कानून से कोई समाधान न होगा, इसमें पुरुषों की बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रयास करना चाहिए, उन्हें स्वयं ही मांग उठानी चाहिए,आंदोलन करने चाहिए, धरने प्रदर्शन करने चाहिए जिससे जल्दी से जल्दी पुरुष आयोग बने जहाँ महिला को सजा देने का प्रावधान हो, महिला की शक्ति बढ़ाने की जरूरत नहीं है परमात्मा ने उसे पहले ही शक्तिशाली बनाया है, उसमें और कुछ जोड़ने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ उसकी शक्ति को दिशा देने की जरूरत है हम नारी शक्ति को अपनी ही बुनियाद, अपने ही पैर काटने में नष्ट कर रहे हैं!

     वषोॅ से भारत की सामाजिक नीति व्यवस्था ऐसे मूढ़ो द्वारा तय की जाती रही है जिन्हें किसी भी तरह के गृहस्थ जीवन का रत्ती भर भी अनुभव नहीं रहा है फिर वे चाहे सतयुग के वशिष्ठ हों या फिर कलयुग के मोदी योगी इनमें से किसी को भी घरेलू समस्याओं का कोई अनुभव नहीं था! हजारों सालों से भारतीय धर्म ग्रंथ समझाते आयें हैं कि 'स्त्री बालक एक समाना, स्त्री और बालक एक समान होते हैं, क्षण में रुठना और क्षणभर में ही मान जाना उनका स्वभाव होता है बावजूद इसके स्त्रियों को उकसाने के लिए नित नये नये नियम बनाये जा रहे हैं, नारी शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है और यह सब उसी परिवार, उसी पुरुष के विरुद्ध किया जा रहा जिस पर वह निर्भर है!

     जब कोई पति अपनी पत्नी की हरकतों से परेशान होकर उसे थप्पड़ मारता है या कुछ कहता है और वह रुठकर थाने चली जाती है तो थाने में पत्नी को समझाने बुझाने, डांटने डपटने के बजाय उसके पति को बुलाकर उसी के सामने पुलिसकर्मी उसके पति को जलील करते हैं उसके पति को कुत्ते की तरह मारते पीटते हैं जिससे पत्नी थोड़ी देर के लिए गदगद तो हो जाती है, लेकिन बाद में जब वह घर जाती है तब सब उलटा पुलटा हो जाता है आज तक जो पत्नी अपने पति का सम्मान करती थी, उसे पति परमेश्वर मानती थी वही अब पति का शोषण शुरुं कर देती है! रोज रोज उनके रिश्ते बिगड़ते जाते हैं फिर एक दिन पति शराब पीकर आता है और पत्नी की हत्या कर देता है, फिर यही कानून पत्नी की हत्या के जुर्म में पति को फांसी पर चढा़ देता है, फिर उसके छोटे छोटे बच्चे बेसहारा होकर सड़कों पर भीख मांगने लगते हैं, चोरी करने लगते हैं, फिर यही कानून इन बच्चों को भी अपराधी मानकर सजा सुनाने लगता है और हम सब गधों की तरह ताली और थाली बजाने लगते हैं! जय हो भारतीय कानून व्यवस्था की!

     यह जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए नीति नियम बनाये जा रहे हैं इनसे कोई महिलाओं की रक्षा नहीं होने वाली है और महिलाओं को भी यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए इसलिए ऐसे कानूनों का समर्थन करना चाहिए जो उनकी अपनी नींव को नुकसान न पहुंचाते हों! पति और पति का परिवार उनकी बुनियाद है ये कानून उस बुनियाद को दुरुस्त नहीं करते हैं बल्कि उसे ढहा देते हैं जिसमें वह महिला भी दबकर मर जाती है!

क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?       अगर हम पुरातन भारतीय समाज की महिलाओं की स्थित की तुलना आज के भारतीय समाज से करें तो हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं! रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, मार-पीट, हत्या, बलात्कार जैसी तमाम अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सरकारें चाहे वे केंद्र की हों या फिर राज्य की आये दिन नये नये कानून बनाती जा रही हैं फिर भी हिंसा पर काबू नहीं हो रहा है, क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?       मेरे देखे! भारत में जो महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा होती है, मारपीट होती है या फिर उन्हें घर के भीतर ही जलाकर मार डाला जाता है ऐसी आपराधिक घटनाओं के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे द्वारा बनाये गए वे मूढ़ नियम कानून ही जिम्मेवार हैं जो महिलाओं को उसी डाल को काटने के लिए मजबूर करते हैं जिस डाल पर उनका आशियाना टिका होता है, उन नियमों के चलते पत्नी न चाहते हुए भी अपने उसी पति को जेल ठूंसवाने के लिए मजबूर हो जाती है जो उसे दो वक्त की रोटी कमाकर खिलाता था! इस तरह के नियम कानून बनाने वाले मूढ़ो को यह भी समझ में नहीं आता कि जब आशियाना ही उजड़ जायेगा, जब वह डाल ही काट दी जायेगी, जब वह पति ही जेल में ठूंस दिया जायेगा तब वह महिला जिसके छोटे छोटे बच्चे होंगे वह कहाँ से अपने और अपने बच्चों का भरणपोषण करेगी! पति से अलगाव होने के बाद इस तरह की महिलाएं जिनके पतियों पर पत्नियों द्वारा मुकदमें चलवाये जा रहे हैं या फिर उनके पतियों को झूंठे केसों में जेलों में ठुंसवाया जा रहा है उनके न रहने पर वे मजबूरी में वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होने लगती हैं! भारत में यह जो बेसवाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है इसमें हमारे नियम कानूनों का बहुत बड़ा हांथ है!       वषोॅ से भारत की सामाजिक नीति व्यवस्था ऐसे मूढ़ो द्वारा तय की जाती रही है जिन्हें किसी भी तरह के गृहस्थ जीवन का रत्ती भर भी अनुभव नहीं रहा है फिर वे चाहे सतयुग के वशिष्ठ हों या फिर कलयुग के मोदी योगी इनमें से किसी को भी घरेलू समस्याओं का कोई अनुभव नहीं था! हजारों सालों से भारतीय धर्म ग्रंथ समझाते आयें हैं कि 'स्त्री बालक एक समाना, स्त्री और बालक एक समान होते हैं, क्षण में रुठना और क्षणभर में ही मान जाना उनका स्वभाव होता है बावजूद इसके स्त्रियों को उकसाने के लिए नित नये नये नियम बनाये जा रहे हैं, नारी शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है और यह सब उसी परिवार, उसी पुरुष के विरुद्ध किया जा रहा जिस पर वह निर्भर है!       जब कोई पति अपनी पत्नी की हरकतों से परेशान होकर उसे थप्पड़ मारता है या कुछ कहता है और वह रुठकर थाने चली जाती है तो थाने में पत्नी को समझाने बुझाने, डांटने डपटने के बजाय उसके पति को बुलाकर उसी के सामने पुलिसकर्मी उसके पति को जलील करते हैं उसके पति को कुत्ते की तरह मारते पीटते हैं जिससे पत्नी थोड़ी देर के लिए गदगद तो हो जाती है, लेकिन बाद में जब वह घर जाती है तब सब उलटा पुलटा हो जाता है आज तक जो पत्नी अपने पति का सम्मान करती थी, उसे पति परमेश्वर मानती थी वही अब पति का शोषण शुरुं कर देती है! रोज रोज उनके रिश्ते बिगड़ते जाते हैं फिर एक दिन पति शराब पीकर आता है और पत्नी की हत्या कर देता है, फिर यही कानून पत्नी की हत्या के जुर्म में पति को फांसी पर चढा़ देता है, फिर उसके छोटे छोटे बच्चे बेसहारा होकर सड़कों पर भीख मांगने लगते हैं, चोरी करने लगते हैं, फिर यही कानून इन बच्चों को भी अपराधी मानकर सजा सुनाने लगता है और हम सब गधों की तरह ताली और थाली बजाने लगते हैं! जय हो भारतीय कानून व्यवस्था की!       यह जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए नीति नियम बनाये जा रहे हैं इनसे कोई महिलाओं की रक्षा नहीं होने वाली है और महिलाओं को भी यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए इसलिए ऐसे कानूनों का समर्थन करना चाहिए जो उनकी अपनी नींव को नुकसान न पहुंचाते हों! पति और पति का परिवार उनकी बुनियाद है ये कानून उस बुनियाद को दुरुस्त नहीं करते हैं बल्कि उसे ढहा देते हैं जिसमें वह महिला भी दबकर मर जाती है!       अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक और नया मूढ़तापूर्ण नियम उन महिलाओं के लिए निकाला है जिनके पतियों पर मुकदमे चल रहे हैं या उनके पति घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के केसों में हवालात में बन्द हैं! सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी महिलाएं जिनके पति जेलों में बन्द हैं या जिनके तलाक के केस चल रहे हैं वे महिलाएं अब अलग न रहकर पति के घर में या पति के किसी रिश्तेदार के घर बेझिझक रह सकती हैं! अब इन मूढ़ो को मनुष्य के मनोविज्ञान का कोई भी ज्ञान नहीं है! इन्हें नहीं मालुम कि जिस माँ बाप के बेटे को बहू ने जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया होगा और स्वयं दूसरे पुरुषों के साथ रंगरलिया मना रही होगी वह बहु यदि उस घर में जायेगी तो वह कैसे सुरक्षित बचेगी! इसलिए मैं महिलाओं से निवेदन करुंगा कि थोड़ा अपनी बुद्धि और विवेक का भी उपयोग करें अगर आपका चाल चलन सामाजिक है और सास ससुर से अच्छी बनती है सिर्फ पति से ही मनमुटाव था तो ही इस नियम का पालन करें!       अगर महिलाओं को पुरुषों के शोषण से बचाना है, उन्हें बराबरी का मान सम्मान देना है, अगर हम सच में चाहते हैं कि घरेलू हिंसा कम हो, महिलाओं को घरों में न सताया जाए तो बराबरी का कानून बनाना पड़ेगा!  एकतरफा कानून से कोई समाधान न होगा, इसमें पुरुषों की बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रयास करना चाहिए, उन्हें स्वयं ही मांग उठानी चाहिए,आंदोलन करने चाहिए, धरने प्रदर्शन करने चाहिए जिससे जल्दी से जल्दी पुरुष आयोग बने जहाँ महिला को सजा देने का प्रावधान हो, महिला की शक्ति बढ़ाने की जरूरत नहीं है परमात्मा ने उसे पहले ही शक्तिशाली बनाया है, उसमें और कुछ जोड़ने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ उसकी शक्ति को दिशा देने की जरूरत है हम नारी शक्ति को अपनी ही बुनियाद, अपने ही पैर काटने में नष्ट कर रहे हैं!

     अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक और नया मूढ़तापूर्ण नियम उन महिलाओं के लिए निकाला है जिनके पतियों पर मुकदमे चल रहे हैं या उनके पति घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के केसों में हवालात में बन्द हैं! सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी महिलाएं जिनके पति जेलों में बन्द हैं या जिनके तलाक के केस चल रहे हैं वे महिलाएं अब अलग न रहकर पति के घर में या पति के किसी रिश्तेदार के घर बेझिझक रह सकती हैं! अब इन मूढ़ो को मनुष्य के मनोविज्ञान का कोई भी ज्ञान नहीं है! इन्हें नहीं मालुम कि जिस माँ बाप के बेटे को बहू ने जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया होगा और स्वयं दूसरे पुरुषों के साथ रंगरलिया मना रही होगी वह बहु यदि उस घर में जायेगी तो वह कैसे सुरक्षित बचेगी! इसलिए मैं महिलाओं से निवेदन करुंगा कि थोड़ा अपनी बुद्धि और विवेक का भी उपयोग करें अगर आपका चाल चलन सामाजिक है और सास ससुर से अच्छी बनती है सिर्फ पति से ही मनमुटाव था तो ही इस नियम का पालन करें!

क्यों नहीं थम रही है भारत में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा?       अगर हम पुरातन भारतीय समाज की महिलाओं की स्थित की तुलना आज के भारतीय समाज से करें तो हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं! रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, मार-पीट, हत्या, बलात्कार जैसी तमाम अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सरकारें चाहे वे केंद्र की हों या फिर राज्य की आये दिन नये नये कानून बनाती जा रही हैं फिर भी हिंसा पर काबू नहीं हो रहा है, क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?       मेरे देखे! भारत में जो महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा होती है, मारपीट होती है या फिर उन्हें घर के भीतर ही जलाकर मार डाला जाता है ऐसी आपराधिक घटनाओं के लिए कोई और नहीं बल्कि हमारे द्वारा बनाये गए वे मूढ़ नियम कानून ही जिम्मेवार हैं जो महिलाओं को उसी डाल को काटने के लिए मजबूर करते हैं जिस डाल पर उनका आशियाना टिका होता है, उन नियमों के चलते पत्नी न चाहते हुए भी अपने उसी पति को जेल ठूंसवाने के लिए मजबूर हो जाती है जो उसे दो वक्त की रोटी कमाकर खिलाता था! इस तरह के नियम कानून बनाने वाले मूढ़ो को यह भी समझ में नहीं आता कि जब आशियाना ही उजड़ जायेगा, जब वह डाल ही काट दी जायेगी, जब वह पति ही जेल में ठूंस दिया जायेगा तब वह महिला जिसके छोटे छोटे बच्चे होंगे वह कहाँ से अपने और अपने बच्चों का भरणपोषण करेगी! पति से अलगाव होने के बाद इस तरह की महिलाएं जिनके पतियों पर पत्नियों द्वारा मुकदमें चलवाये जा रहे हैं या फिर उनके पतियों को झूंठे केसों में जेलों में ठुंसवाया जा रहा है उनके न रहने पर वे मजबूरी में वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होने लगती हैं! भारत में यह जो बेसवाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है इसमें हमारे नियम कानूनों का बहुत बड़ा हांथ है!       वषोॅ से भारत की सामाजिक नीति व्यवस्था ऐसे मूढ़ो द्वारा तय की जाती रही है जिन्हें किसी भी तरह के गृहस्थ जीवन का रत्ती भर भी अनुभव नहीं रहा है फिर वे चाहे सतयुग के वशिष्ठ हों या फिर कलयुग के मोदी योगी इनमें से किसी को भी घरेलू समस्याओं का कोई अनुभव नहीं था! हजारों सालों से भारतीय धर्म ग्रंथ समझाते आयें हैं कि 'स्त्री बालक एक समाना, स्त्री और बालक एक समान होते हैं, क्षण में रुठना और क्षणभर में ही मान जाना उनका स्वभाव होता है बावजूद इसके स्त्रियों को उकसाने के लिए नित नये नये नियम बनाये जा रहे हैं, नारी शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है और यह सब उसी परिवार, उसी पुरुष के विरुद्ध किया जा रहा जिस पर वह निर्भर है!       जब कोई पति अपनी पत्नी की हरकतों से परेशान होकर उसे थप्पड़ मारता है या कुछ कहता है और वह रुठकर थाने चली जाती है तो थाने में पत्नी को समझाने बुझाने, डांटने डपटने के बजाय उसके पति को बुलाकर उसी के सामने पुलिसकर्मी उसके पति को जलील करते हैं उसके पति को कुत्ते की तरह मारते पीटते हैं जिससे पत्नी थोड़ी देर के लिए गदगद तो हो जाती है, लेकिन बाद में जब वह घर जाती है तब सब उलटा पुलटा हो जाता है आज तक जो पत्नी अपने पति का सम्मान करती थी, उसे पति परमेश्वर मानती थी वही अब पति का शोषण शुरुं कर देती है! रोज रोज उनके रिश्ते बिगड़ते जाते हैं फिर एक दिन पति शराब पीकर आता है और पत्नी की हत्या कर देता है, फिर यही कानून पत्नी की हत्या के जुर्म में पति को फांसी पर चढा़ देता है, फिर उसके छोटे छोटे बच्चे बेसहारा होकर सड़कों पर भीख मांगने लगते हैं, चोरी करने लगते हैं, फिर यही कानून इन बच्चों को भी अपराधी मानकर सजा सुनाने लगता है और हम सब गधों की तरह ताली और थाली बजाने लगते हैं! जय हो भारतीय कानून व्यवस्था की!       यह जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए नीति नियम बनाये जा रहे हैं इनसे कोई महिलाओं की रक्षा नहीं होने वाली है और महिलाओं को भी यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए इसलिए ऐसे कानूनों का समर्थन करना चाहिए जो उनकी अपनी नींव को नुकसान न पहुंचाते हों! पति और पति का परिवार उनकी बुनियाद है ये कानून उस बुनियाद को दुरुस्त नहीं करते हैं बल्कि उसे ढहा देते हैं जिसमें वह महिला भी दबकर मर जाती है!       अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक और नया मूढ़तापूर्ण नियम उन महिलाओं के लिए निकाला है जिनके पतियों पर मुकदमे चल रहे हैं या उनके पति घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के केसों में हवालात में बन्द हैं! सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी महिलाएं जिनके पति जेलों में बन्द हैं या जिनके तलाक के केस चल रहे हैं वे महिलाएं अब अलग न रहकर पति के घर में या पति के किसी रिश्तेदार के घर बेझिझक रह सकती हैं! अब इन मूढ़ो को मनुष्य के मनोविज्ञान का कोई भी ज्ञान नहीं है! इन्हें नहीं मालुम कि जिस माँ बाप के बेटे को बहू ने जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया होगा और स्वयं दूसरे पुरुषों के साथ रंगरलिया मना रही होगी वह बहु यदि उस घर में जायेगी तो वह कैसे सुरक्षित बचेगी! इसलिए मैं महिलाओं से निवेदन करुंगा कि थोड़ा अपनी बुद्धि और विवेक का भी उपयोग करें अगर आपका चाल चलन सामाजिक है और सास ससुर से अच्छी बनती है सिर्फ पति से ही मनमुटाव था तो ही इस नियम का पालन करें!       अगर महिलाओं को पुरुषों के शोषण से बचाना है, उन्हें बराबरी का मान सम्मान देना है, अगर हम सच में चाहते हैं कि घरेलू हिंसा कम हो, महिलाओं को घरों में न सताया जाए तो बराबरी का कानून बनाना पड़ेगा!  एकतरफा कानून से कोई समाधान न होगा, इसमें पुरुषों की बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रयास करना चाहिए, उन्हें स्वयं ही मांग उठानी चाहिए,आंदोलन करने चाहिए, धरने प्रदर्शन करने चाहिए जिससे जल्दी से जल्दी पुरुष आयोग बने जहाँ महिला को सजा देने का प्रावधान हो, महिला की शक्ति बढ़ाने की जरूरत नहीं है परमात्मा ने उसे पहले ही शक्तिशाली बनाया है, उसमें और कुछ जोड़ने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ उसकी शक्ति को दिशा देने की जरूरत है हम नारी शक्ति को अपनी ही बुनियाद, अपने ही पैर काटने में नष्ट कर रहे हैं!
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     अगर महिलाओं को पुरुषों के शोषण से बचाना है, उन्हें बराबरी का मान सम्मान देना है, अगर हम सच में चाहते हैं कि घरेलू हिंसा कम हो, महिलाओं को घरों में न सताया जाए तो बराबरी का कानून बनाना पड़ेगा!  एकतरफा कानून से कोई समाधान न होगा, इसमें पुरुषों की बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रयास करना चाहिए, उन्हें स्वयं ही मांग उठानी चाहिए,आंदोलन करने चाहिए, धरने प्रदर्शन करने चाहिए जिससे जल्दी से जल्दी पुरुष आयोग बने जहाँ महिला को सजा देने का प्रावधान हो, महिला की शक्ति बढ़ाने की जरूरत नहीं है परमात्मा ने उसे पहले ही शक्तिशाली बनाया है, उसमें और कुछ जोड़ने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ उसकी शक्ति को दिशा देने की जरूरत है हम नारी शक्ति को अपनी ही बुनियाद, अपने ही पैर काटने में नष्ट कर रहे हैं! 

Author: Arun Gautam


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