कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान से मिलता महापुण्य, यहां खुद देवता मनाते हैं दिपावली!


  यहां पांच नदियों का होता है संगम, कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान से मिलता महापुण्य, यहां खुद देवता मनाते हैं दिपावली!

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    काशी में पंचगंगा घाट पर किरणा व धूतपापा नदियों का गंगा में होता है मिलन कार्तिक पूर्णिमा पर काशी में सात किमी लंबे 90 से अधिक घाटों पर देव दीपावली मनाई जाती है। यहां पंचगंगा घाट पर स्नान करने से पांच नदियों का पुण्य मिलता है। कारण यहां पांच नदियों गंगा, जमुना, सरस्वती, धूतपापा और किरणा नदी का संगम है। यहां के कुछ मंहतों व पंडितों ने बताया कि ऐसी मान्यता है- महादेव ने जब त्रिपुरासुर असुर का वध किया था तो कार्तिक पूर्णिमा के दिन इसी पंचगंगा संगम पर देवताओं ने स्नान दीपोत्सव मनाया था। तभी से यह परंपरा जारी है।

यहां है किरणा व धूतपापा नदी का उद्गम स्थल! 

    पंच गंगा घाट के ठीक पहले जटार घाट पर किरणा नदी पत्थर के बेदी के नीचे से गंगा में मिलती है। वहीं, कुछ दूरी पर घाट पर ही छोटे से मंदिर में धूत पापेश्वर महादेव विराजमान हैं। ठीक नीचे की ओर एक बेदी है, जहां से गुप्त धूतपापा नदी गंगा में मिलती है।

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    कार्तिक मास में दूर दूर से लोग स्नान को यहां आते है पर उन्हें ये नहीं मालूम कि यहां पंच नदियों का पवित्र संगम भी है। अहिल्या बाई ने यहां पत्थरों की नक्कासीदार दो एक हजारा दीपक का निर्माण कराया जो देव दीपावली वाले दिन जलाया जाता है।

तेल दान लेकर शुरू हुआ महापर्व! 

     जानकारों के मुताबिक पहले लोग अपनी श्रद्धा से दीपक जलाते थे। 1985 में इसे भव्य बनाने के लिए गली-गली, पान की दुकानों पर कनस्तर रखा गया कि लोग तेल दान करें। 11 कनस्तर तेल उस समय मिला था। पहली बार एक साथ पंच गंगा घाट पर हजारा दीपक के साथ 25 हजार दीपक जले थे। 1986 में केंद्रीय देव दीपावली समिति का गठन हो गया, जो अब देव दीपावली का आयोजन कराती है।

लोगों का दावा- आज भी देवगणों की उपस्थिति का एहसास! 

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     यहां के मंहत बताते हैं कि - साल 1986 में पानी के पम्प लगाकर देर रात घाट की सफाई की जा रही थी। अचानक 1 बजे रात को कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले पंप खराब हो गया। तभी आभास हुआ कि कोई मानो ये समझाना चाह रहा है कि सभी लोग यहां से हट जाएं। कुछ देव मानों यहां स्नान को आ चुके हैं। सभी लोग वहां से हट गए। भोर में आकर पम्प चलाया गया तो चलने लगे। तभी से कार्तिक पूर्णिमा के एक दिन पहले अर्ध रात्रि में यहां कुछ नहीं किया जाता। दशाश्मेध घाट पर 90 के दशक में एक ब्राह्मण फिर 5 ब्राह्मणों द्वारा गंगा आरती का आयोजन शुरू किया, जो आज देव दीपावली के दिन महा आरती का रूप धारण कर चुकी है।


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