इन पांच महिलाओं ने लिखी थी महाभारत के महाविनाश की पटकथा! Practical life.

इन पांच महिलाओं ने लिखी थी महाभारत के महाविनाश की पटकथा। 


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भागीरथी गंगा

     एक ऐसा नाम जिसके बिना महाभारत की कहानी अधूरी है। महाविनाशकारी महाभारत में गंगा ही वह प्रमुख पात्र थी जिसने भीष्म पितामह को जन्म दिया। भीष्म पितामह की प्रण-प्रतिज्ञा के कारण ही महाभारत का भविष्य महाविनाश की ज्वलंत ज्वाला से धधक उठा था और महाभारत तक विकसित समस्त ज्ञान-विज्ञान उस आग में जलकर खाक हो गया था। गंगा की उत्पत्ति की कथा पुराणों में विस्तारपूर्वक वर्णित है। कथा के अनुसार गंगा का जन्म भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था। लेकिन पृथ्वी पर उनका आगमन भागीरथ की कठोर तपस्या के परिणामस्वरूप हुआ। 

     भगीरथ इक्ष्वाकु वंश के सम्राट राजा दिलीप के पुत्र थे। कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए अपने वंशज राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए अट्ठारह वर्षों तक कठोर तप किया था। इसलिए भागीरथ के नाम पर ही गंगा को 'भागीरथी' कहा जाता है। दरअसल गंगा का पृथ्वी पर आगमन पूर्व-नियोजित था,भागीरथ तो सिर्फ माध्यम बने थे, उस पूर्व-नियोजित कथा को आगे बढ़ाने के लिए। कई दफे नियति को एक घटना को पूर्ण करने के लिए अनेकों-अनेकों पात्र जन्माने पड़ते हैं और फिर उन पात्रों को अपने किरदारों के अनुसार अभिनय करना होता है। विधी के विधान को यदि ठीक से समझे तो भागीरथ, राजा सगर, उनके साठ हजार पुत्र और उनका समस्त राजपाट गंगा की ही अपूर्ण कथा का हिस्सा थे जो उनकी कथा को संपूर्ण करने के लिए जन्में थे।

राजा शांतनु और गंगा के पूर्व जन्म की कथा! 

     पृथ्वी पर आने से पहले गंगा स्वर्गलोक में थीं, राजा शांतनु अपने पूर्व जन्म में इसी पृथ्वी पर राजा महाभिषेक के नाम से राज करते थे अपने पूण्य कर्मों एवं दान धर्म के बल पर उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। एक दिन इंद्र के दरबार में सभा हो रही थी उस सभा में गंगा और शांतनु दोनों मौजूद थे। अचानक बीच सभा में किसी कारणवश गंगा उठकर जाने लगी तभी उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे फिसल गया इतने में राजा महाभिषेक उन्हें एकटक देखने लगे अपने खूबसूरत बदन को निहारते हुए देखकर गंगा भी महाभिषेक की तरफ देखने लगी। 


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     बहुत समय बीत जाने पर जब दोनों की दृष्टि अलग नहीं हुई तब सभापति इंद्र ने उन दोनों को पास बुलाकर स्वर्ग के नियम बताये और स्मरण कराया कि स्वर्ग में प्रेम करना बेमानी है। प्रेम करने के लिए तुम दोनों को पृथ्वी पर जाना होगा और मनुष्य देह धारण करनी होगी। किंतु कठिनाई यह थी कि राजा महाभिषेक को तो पृथ्वी के वातावरण का अनुभव था लेकिन गंगा पृथ्वी से अपरिचित थी इसलिए महाभिषेक का शीघ्रता से जन्म हो गया किन्तु गंगा को अवसर नहीं मिला। महाभिषेक के कई जन्म बीत जाने के बाद जब वे शांतनु के रूप पैदा हुए तब वह घड़ी आई जब गंगा को पृथ्वी आने का मौका मिला और वे भागीरथ के माध्यम से पृथ्वी पर अवतरित हो पायीं। इस तरह गंगा महाभारत की प्रमुख धारा थीं।

सत्यवती

     यह भी एक ऐसा किरदार था जिसके बिना महाभारत की कल्पना व्यर्थ हो जाती है। सत्यवती का वास्तविक नाम 'मत्स्यगंधा' था। यह नाम भी उसे इसलिए मिला था क्योंकि उसके शरीर से मछली की बदबू आती रहती थी और यह बदबू भी अकारण नहीं थी इसके पीछे की कथा का कारण है। मत्स्यगंध यानी सत्यवती का जन्म आद्रिका नाम की मछली के पेट से हुआ था जो श्राप के कारण मछली बनकर जीवन जी रही थी। उपरिचत नाम के राजा का वीर्य उसके गर्भ में चला गया था अपने भाई के साथ मत्स्यगंधा मछली बनी अप्सरा के पेट में पल रही थी। एक दिन एक मछुआरे ने नदी में जाल फेंका जिसमें वह फंस गई जब मछुआरे ने उसका पेट चीरा तो उसमें से दो शिशु निकले जिन्हें लेकर वह राजा के दरबार पहुंचा, राजा ने पुत्र को तो अपना लिया किंतु कन्या के पालन-पोषण का जिम्मा मछुआरे को सौंप दिया। मछुआरा कन्या को लेकर घर लौट आया। 


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     धीरे-धीरे यह कन्या बड़ी हो गई! एक दिन पराशर ऋषि की द्रष्टि उस पर पड़ी तो वे उसके प्रेम में पड़ गए अपनी योगविद्या के प्रभाव से ऋषि ने मत्स्यगंधा के शरीर से आ रही मछली की गंध को सदा के लिए समाप्त कर दिया जिसके बाद वह एक सुंदर रुपवान सत्यवती नाम की स्त्री बन गई। ऋषि ने उससे विवाह कर लिया, वेदव्यास उन्हीं दोनों की संतान थे! बाद में शांतनु भी इसी कन्या पर मोहित हो गए और उससे विवाह करने की जिद पर अड़ गए। पिता के समझाने-बुझाने सत्यवती इस शर्त पर शांतनु से विवाह करने के लिए सहमत हो गई कि भीष्म आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगें जिसे भीष्म ने स्वीकार कर लिया था, यहीं पर महाभारत के महाविनाश की नींव पड़ चुकी थी।

अम्बा

     सत्यवती से शांतनु को दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य। सत्यवती ने अपने दोनों पुत्रों के विवाह की जिम्मेदारी गंगा पुत्र भीष्म को सौंप दी। इसी बीच काशी नरेश की तरफ से उनकी तीनों पुत्रियों अम्बा, अंबिका और अम्बालिका के स्वयंवर की घोषणा कर दी गई। इस स्वयंवर में काशी नरेश ने सत्यवती के पुत्रों चित्रांगद और विचित्रवीर्य को आमंत्रित नहीं किया जिससे भीष्म पितामह नाराज हो गए उन्होंने इसे हस्तिनापुर का अपमान समझ लिया और स्वयंवर में पहुंचकर तीनों कन्याओं का अपहरण कर लाए जिनमें एक का विवाह विचित्रवीर्य  से और दूसरी का चित्रांगद से संपन्न करा दिया किंतु अम्बा भीष्म से आग्रह करने लगी कि वह शाल्व नरेश से प्रेम करती है अतः उसे शाल्व के राजकुमार के पास पहुंचा दिया जाय। 


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     सच्चाई जानकर भीष्म ने उसे सम्मानपूर्वक शाल्व नरेश के पास भेज दिया किंतु शाल्व नरेश ने उसे हरण की हुई स्त्री कहकर अपनाने से इंकार कर दिया। दुखी मन से वह भीष्म के पास लौट आई और उनसे कहने लगी कि आपके कारण ही नरेश ने मुझे त्याग दिया है यदि आप मेरा अपहरण न करते तो मेरे साथ यह सब न होता अत: अब आप मुझसे विवाह कीजिए। लेकिन अपनी प्रतिज्ञा में बंधे भीष्म उससे विवाह न कर सके और अपनी प्रतिज्ञा पर अड़े रहे। उसी समय अम्बा ने प्रतिज्ञा कर ली कि भले ही उसे कितने ही जन्म क्यों न लेने पड़ें किंतु वह भीष्म पितामह से इसका बदला अवश्य लेगी और उनकी मृत्यु का कारण बनेगी। 


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      यही अम्बा मृत्यु के बाद सिखंडी के रुप में पैदा हुई जो आधी स्त्री और आधा पुरुष थी और यह बात भीष्म भी जानते थे कि उनकी मृत्यु का कारण यही सिखंडी बनी अम्बा है। इस तरह अम्बा भविष्य में होने वाले महाभारत की पटकथा पहले ही लिख चुकी थी। 

द्रौपदी 


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     महाभारत की सबसे मुख्य पात्र थी द्रौपदी! ऐसा लगता है द्रौपदी का जन्म महाभारत के महाविनाशकारी युद्ध के लिए ही हुआ था। द्रौपदी के पिता द्रुपद ने द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए पुत्र की कामना से एक यज्ञ किया था उसी अग्नि कुंड से पुत्र के साथ-साथ यह कन्या भी प्रकट हुई थी। द्रुपद जानते थे कि अर्जुन द्रोणाचार्य का सबसे बड़ा धनुर्धर और प्रिय शिष्य है इसलिए उन्होंने स्वयंवर में ऐसी कठिन शर्त रखी थी जिसे केवल अर्जुन ही पूरी कर सकता था। आखिरकार वही हुआ जो द्रुपद चाहते थे! अर्जुन ने वह शर्त पूरी कर ली और द्रौपदी से विवाह कर लिया। द्रौपदी महाभारत की जलती आग में घी साबित हुई। 

दुशाला

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     महाभारत के महायुद्ध में दुशाला का वही स्थान था जो रामायण में मंदोदरी का था ऐसा लगता है जैसे मंदोदरी ही महाभारत में दुशाला के रुप में प्रकट हुई थी फिर भी वह अपने पति जयद्रथ के कारण निंदा की पात्र मानी गई दुशाला दुर्योधन की बहन थी। एक दफे जयद्रथ ने द्रौपदी को अगवा करने की कोशिश की थी। यह घटना उन द‌िनों की है जब पांडव जुए में सबकुछ हारने के बाद 13 वर्ष का वनवास काट रहे थे। एक द‌िन जयद्रथ द्रौपदी का अपहरण करके अपने राज्य ले जाने लगा। पांडवों ने जयद्रथ को बंदी बना ल‌िया और उसे मृत्यु दंड देने लगे। उस समय द्रौपदी ने पांडवों को ऐसा करने से रोक दिया था और कहा क‌ि जयद्रथ के सारे बाल काट ल‌िए जाएं स‌िर्फ पांच चोट‌ियां छोड दी जाए ताक‌ि यह क‌िसी को मुंह द‌िखाने लायक न रहे। 

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     जयद्रथ इस घटना के बाद पांडवों से बदला लेने की ताक में लग गया था इसके लिए उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और वरदान मांगा था कि वह पांडवों को मृत्यु दंड देने के लिए सक्षम हो जाय इसलिए एक दिन वह युद्ध के मैदान पर सभी पांडवों पर भारी पड़ रहा था कृष्ण की कृपा से वह कामयाब तो नहीं हो सका किंतु अभिमन्यु की मृत्यु का कारण अवश्य बन गया।

     तो ये थीं महाभारत की वे पांच कन्याएँ जो न होती तो शायद महाभारत की पटकथा कुछ और होती। 


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