महामूर्ख तुलसीदास के इस सूझाव के कारण भारतीय समाज में महिलाओं और शूद्रों का होता है शोषण!

महामूर्ख तुलसीदास के इस सूझाव के कारण भारतीय समाज में महिलाओं और शूद्रों का होता है शोषण! 


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      रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास को परम ज्ञानियों की कोटि में रखा गया है, उन्हें परम विद्वान भी माना गया है किंतु रामचरित मानस में उनके द्वारा समाज को दिए गए कुछ सुझाव ऐसे भी हैं जिन्हें पढ़कर भारतीय समाज पर ऐसा दुष्प्रभाव पड़ा है जिसका खामियाजा सर्वाधिक महिलाओं और शूद्रों को ही भुगतना पड़ा है। और इसलिए बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो तुलसीदास को विद्वान मानने से ही इंकार करते हैं और उनकी मानस की प्रतियों को जलाते रहे हैं।

आइए जानते हैं तुलसीदास द्वारा दिए गए उस सूझाव के संबंध में जो तुलसीदास को महामूरख सिद्ध करता है।

     मनुष्य के मन के संबंध में यह बिल्कुल सत्य है कि अच्छा सुझाव उसे बार-बार देना पड़ता है फिर भी उसे स्वीकार करने में कठिनाई होती है किंतु गलत सुझाव एक बार में ही आत्मसात कर लेता है। जैसे ही तुलसीदास ने कहा कि "ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी" वैसे ही लोगों ने आत्मसात कर लिया, उससे पहले सैकड़ों ग्रंथों में यह समझाया जा चुका है गीता, बाईबल, उपनिषद, सभी में ऋषियों ने सभी चराचर प्राणियों को एक समान बताया है। यहां न कोई छोटा है न बड़ा है न ऊंचा है न नीचा है लेकिन ऋषियों की बात, गीता, उपनिषद की बात किसी को नहीं जंची! तुलसीदास की बात एकदम जंच गई। 

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी! सकल ताड़ना के अधिकारी!!

     इस चौपाई में तुलसीदास कुछ खास लोगों को सूझाव दे रहे हैं शायद ऐसे लोगों को जो आने वाले समय में समाज के निचले वर्ग को हांकने का काम करेंगे, उन्हें चलायेंगे। ऐसे वर्ग के साथ कैसा बर्ताव करना है यह तुलसी ने इस चौपाई में बताया है। तुलसीदास समझा रहे हैं कि शूद्र और नारी को कभी भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, क्यों नहीं देखना चाहिए! तो तुलसी उसी चौपाई में उदाहरण भी जोड़ देते हैं कि जैसे ढोल परंपरागत रूप से सिर्फ पीटने के लिए ही होता है ऐसे ही स्वाभाविक रूप से शूद्र, पशु और नारी असम्मान के अधिकारी होते हैं इन्हें कभी भी सिर पर चढ़ाने का प्रयास नहीं करना चाहिए और न ही इन्हें कभी स्वयं से ऊपर उठने का मौका ही देना चाहिए।


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यहां एक बात समझ लेनी जरूरी है कि तुलसीदास ने हमारे समाज की महिलाओं को उसी कोटि में रखा है जिस कोटि में शूद्र सम्मिलित हैं, फिर वह महिला चाहे जितने उच्च पद पर आसीन हो, चाहे जितने उच्च घराने में बैठी हो, यदि वह महिला है तो उसका स्थान वही है जो हमारे समाज में शूद्रों का है, इसलिए जितना शोषण शूद्रों का होता है उतना ही शोषण महिलाओं का भी किया जाता है और इस व्यवस्था पर संपूर्ण उच्च वर्ग का पुरूष समाज एकमत है। कोई भी इस व्यवस्था को भंग करने के लिए राजी नहीं है। 

     आप जानकर हैरान होंगे सारी दुनियाँ में सभी वर्गों के लोग महिलाएं और पुरुष सभी समान रूप से प्रगति की राह पर चलते हैं, उनका समान मात्रा में विकास हो रहा है। अकेले भारत में विगत पांच सौ वर्षों से महिलाओं और शूद्रों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं दिया गया है उसका कुल कारण उच्च वर्ग के मस्तिष्क में तुलसीदास द्वारा ठूंसा गया जहर है जो कहता है महिलाओं और शूद्रों की बुद्धि को कभी विकसित न होने दो, इन्हें बुद्धि और विकास की कोई जरूरत नहीं है। तुलसीदास का सुझाव कहता है महिलाएं मात्र उपभोग का साधन हैं और शूद्र सेवा और स्वर्णो के पैर दबाने के लिए हैं, समाज में इनका अन्य कोई भी आस्तित्व नहीं है।

     इसलिए देखते हैं! भारत में शूद्रों की, महिलाओं की कैसी दुर्गति होती है। अगर कोई स्वर्ण बिरादरी का व्यक्ति किसी शूद्र को या महिला को सहारा देता भी है तो भी उसका शोषण करने के लिए ही ऐसा करता है। स्वर्ण अपने साथ शूद्र को लेकर चलता तो है लेकिन कभी उसे अपने बराबर में नहीं चलने देता है, वह उसे पीछे रखता है, ऐसे ही जब पुरुष चलता है तो महिला उससे पीछे चलती है, उसके बराबर चलने की इजाजत उसे भी नहीं है। यह सब तुलसी जैसे महामूर्खों द्वारा दी गयी व्यवस्था का परिणाम है जिसे आज भी हिला पाना कठिन मालुम पड़ता है।

     भारत की गरीबी के लिए, भारत के पिछड़ेपन के लिए, भारत की दरिद्रता के लिए सभी महत्वपूर्ण कारणों में यह सबसे बड़ा महत्वपूर्ण कारण रहा है कि यहां मुठ्ठी भर अल्पसंख्यक जातियों के लोग एक बहुत बड़े बहुसंख्यक समुदाय पर जिसमें शूद्र और महिलाएं दोनों शामिल हैं उन पर राज कर रहे हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, उनकी तरक्की से नफरत कर रहे हैं। और इसके पीछे मानसिकता वही जो तुलसीदास ने अपनी चौपाई में बतायी है। 

     शूद्र को अधिकार नहीं है कि वह विकसित हो, अपनी तरक्की करे, शूद्र को यदि कुछ चाहिए तो वह स्वर्ण के चरणों में जाकर निवेदन कर सकता है, उसकी सेवा कर सकता है, उसे जो मिलेगा वह स्वर्ण के माध्यम से ही मिलेगा! दाता वह स्वर्ण होगा। इसलिए देखा ही होगा गांवों में जिमींदार होते हैं, पटीदार होते हैं और वे सब स्वर्ण जातियों के होते हैं और वे सारे गाँव के गरीबों की छाती पर मूंग दलते हैं, उनके घर की महिलाओं का शारीरिक शोषण करते हैं, सारी ताकत अपने हांथ में रखते हैं। अभी भी अधिकतर गांवों में यही सब चल रहा है। सौभाग्य से मेरा जन्म एक शूद्र घर में हुआ, सौभाग्य इसलिए क्योंकि तभी मुझे इन कुरीतियों का पता चला अन्यथा तो बड़ा मुश्किल हो जाता समझना! और विगत पच्चीस वर्षों से निरंतर मैं स्वर्णों के ही संपर्क में रहा हूँ जिसमें ठाकुर, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य लगभग सभी उच्च जातियों के लोग शामिल हैं। 
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     उन सभी में मैंने एक समानता देखी है कि वे शूद्रों को आज के आधुनिक युग में भी बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते हैं। आज भी वे अपनी मालकियत छोड़ने से घबरा रहे हैं। क्योंकि वह सदियों पुरानी मालकियत उनके जहन में विरासत का रुप ले चुकी है। मैं ऐसी परंपरागत मानसिकता वाले विक्षिप्त लोगों से कहना चाहता हूं कि अब तुलसीदास के वचन की ऊर्जा समाप्त होती रही है, उसका असर खत्म हो रहा है। अब हमें सभी वर्गों को, सभी जातियों को जाति-धर्म से ऊपर उठकर प्राकृति के नियम को स्वीकार कर लेना चाहिए। प्राकृति सभी को समान भाव से आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है, हमें भी किसी के विकास से परहेज नहीं करना चाहिए, यही मनुष्य होने का सच्चा प्रमाण है।


लेखक : अरुन गौतम
रुस्तम विहार कॉलोनी, अमौसी एयरपोर्ट, 
लखनऊ, उत्तर प्रदेश 

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