जानिए कैसे हुआ था गांधारी और दुर्वासा के श्राप से यदुवंशियों के कुल का समूल सर्वनाश?....!

जानिए कैसे हुआ था गांधारी और दुर्वासा के श्राप से यदुवंशियों के कुल का समूल सर्वनाश?....!

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     महाभारत के युद्ध में कौरवों के कुल का तो समूल नाश हुआ ही था, पांच पांडवों को छोड़कर पांडव पक्ष के भी तमाम लोग इस नरसंहार में मारे गए। लेकिन इस युद्ध की वजह से एक और वंश का खात्मा हुआ था और वह वंश था श्री कृष्ण का 'यदुवंश, जी हाँ! इस युद्ध में यदुवंशियों के कुल का भी समूल सर्वनाश हो गया था। और एक भी यदुवंशी जीवित नहीं बचा था। यहां तक की श्री कृष्ण भी इसी युद्ध की वजह से 'जरा, नाम के बहेलिए के तीर से मारे गए थे।

कैसे हुआ यदुवंशियों का समूल सर्वनाश?

     अठारह दिन चले महाभारत की समाप्ति के बाद पांडव युधिष्ठिर के राजतिलक की तैयारी कर रहे थे। उधर अपने सौ पुत्रों के शोक में गांधारी का रो-रोकर बुरा हाल हुआ जा रहा है। सांत्वना देने के उद्देश्य से श्री कृष्ण गांधारी के पास गए। भगवान श्री कृष्ण को देखते ही गांधारी आगबबूला हो गईं और उन्हें श्राप दे दिया, गांधारी ने कहा कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से आपसी युद्ध में मेरे सौ पुत्रों का नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे कुल-वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा। यह यदुवंश के सर्वनाश का पहला श्राप था जो गांधारी की तरफ से दिया गया।

     दूसरे श्राप की कथा इस प्रकार है-  महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो राजा युधिष्ठिर को तरह-तरह के अपशकुन दिखाई देने लगे। विश्‍वामित्र, असित, दुर्वासा, कश्‍यप, वशिष्‍ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास पिंडारक क्षेत्र में निवास कर रहे थे। एक दिन सारण आदि किशोर जाम्‍बवती नंदन साम्‍ब को स्‍त्री वेश में सजाकर उनके पास ले गए और बोले- ऋषियों, यह कजरारे नैनों वाली बभ्रु की पत्‍नी है और गर्भवती है। यह कुछ पूछना चाहती है लेकिन सकुचाती है। इसका प्रसव समय निकट है, आप सर्वज्ञ हैं। बताइए, यह कन्‍या जनेगी या पुत्र।

     ऋषियों से मजाक करने पर उन्‍हें क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में कह दिया यह निश्चित ही यदुवंशियों का नाश करने के लिए लोहे का एक विशाल मूसल उत्‍पन्‍न करेगा। केवल बलराम और श्रीकृष्‍ण पर उसका वश नहीं चलेगा। बलरामजी स्‍वयं ही अपने शरीर का परित्‍याग करके समुद्र में प्रवेश कर जाएंगे और श्रीकृष्‍ण जब भूमि पर शयन कर रहे होंगे, उस समय जरा नामक व्याध उन्‍हें अपने बाणों से बींध देगा।

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मुनियों की यह बात सुनकर वे सभी किशोर बहुत डर गए। उन्‍होंने तुरंत साम्‍ब का पेट (जो गर्भवती दिखने के लिए बनाया गया था) खोलकर देखा तो उसमें एक मूसल मिला। वे सब बहुत घबरा गए और मूसल लेकर अपने घर चले गए। उन्‍होंने भरी सभा में वह मूसल ले जाकर रख दिया।

     उन्होंने राजा उग्रसेन सहित सभी को यह घटना बता दी। उन्‍होंने उस मूसल का चूरा-चूरा कर डाला तथा उस चूरे व लोहे के छोटे टुकड़े को समुद्र में फिंकवा दिया जिससे कि ऋषियों की भविष्यवाणी सही न हो। लेकिन उस टुकड़े को एक मछली निगल गई और चूरा लहरों के साथ समुद्र के किनारे आ गया और कुछ दिन बाद एरक (एक प्रकार की घास) के रूप में उग आया।

     मछुआरों ने उस मछली को पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकडा था उसे जरा नामक ब्‍याध ने अपने बाण की नोंक पर लगा लिया। मुनियों के शाप की बात श्रीकृष्‍ण को भी बताई गई थी। उन्‍होंने कहा- ऋषियों की यह बात अवश्‍य सच होगी। एकाएक उन्‍हें गांधारी के शाप की बात याद आ गई। यदुवंशियों को दो श्राप मिले थे, एक गांधारी का और दूसरा ऋषियों का। श्रीकृष्‍ण सब कुछ जानते थे लेकिन श्राप पलटने में उनकी रुचि नहीं थी।

     36 वां वर्ष चल रहा था। उन्‍होंने यदुंवशियों को तीर्थयात्रा पर चलने की आज्ञा दी। वे सभी प्रभास में उत्सव के लिए इकट्ठे हुए और किसी बात पर आपस में झगड़ने लगे। झगड़ा इतना बढ़ा कि वे वहां उग आई घास को उखाड़कर उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। उसी 'एरका' घास से यदुवंशियों का नाश हो गया। हाथ में आते ही वह घास एक विशाल मूसल का रूप धारण कर लेती। श्रीकृष्‍ण के देखते-देखते साम्‍ब, चारुदेष्‍ण, प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध की मृत्‍यु हो गई।

     इस घटना के बाद बलरामजी ने समुद्र में जाकर जल समाधि ले ली। भगवान श्रीकृष्ण महाप्रयाण कर स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गए। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण स्वधाम को पधार गए।

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     इस तरह गांधारी तथा ऋषि दुर्वासा के शाप से समस्त यदुवंश का नाश हो गया और ऋषियों द्वारा दिया गया शाप कि 'इस मूसल से सभी मारे जाएंगे' वह भी पूरा हुआ, क्योंकि मछली के पेट में मूसल का एक टुकड़ा था जिससे जरा ने अपना तीर बना लिया था। अब सवाल उठता है! जब यदुवंशियों के कुल का समूल सर्वनाश पहले ही हो चुका था जिसमें कृष्ण भी नहीं बच सके थे तो अब जो यह स्वयं को यदुवंशी होने का दावा कर रहे हैं ये कौंन हैं? यह सोंचने वाली बात है।





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