जानिए स्वप्नों का संसार! PRACTICAL LIFE

मैं, सो जाता हूँ! फिर भी वह मेरी आंखों में सारी रात जागती है? जानिए स्वप्नों का संसार!

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     एक व्यक्ति अपने साठ साल के जीवनकाल में करीब बीस साल निद्रा में ही जीवन गुजार देता है। अगर आप साठ साल जीने वाले व्यक्ति हैं और प्रत्येक चौबीस घंटों में आठ घंटे सोने में बिताते हैं तो इस हिसाब से साठ वर्ष में बीस वर्ष सोने में ही निकल जाते हैं। यह जो निद्रा का काल होता है इसी में स्वप्नों का संसार सजता है, हालांकि कुछ लोग जागते हुए भी स्वप्न देखते हैं।

स्वप्न क्या हैं?

     अगर हम भगवान बुद्ध की देशनाओं को समझें और आधुनिक फ्रायड के मनोवैज्ञान को समझें तो दोनों का विश्लेषण यही कहता है कि मनुष्य के स्वप्न और आकांक्षाएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं लेकिन उन सभी के मूल में छिपी हुई जो वासना है वह एक ही है। यहां प्रत्येक मनुष्य अपनी-अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए प्रयासरत है। आमतौर से हम वासनाओं को अनंत रुपों में देखते हैं किंतु वे अनंत नहीं हैं, मूल वासना एक ही है जिसे हम 'कामवासना, कहते हैं यही अतृप्त कामवासना स्वप्नदोष का कारण भी बनती है।

     मनुष्य के जीवन की नियति अधूरापन है, यहां कोई भी कृत्य कभी पूरा नहीं होता है। किंतु प्रकृति किसी भी कृत्य को अधूरा नहीं नहीं रहने देती। प्राकृति प्रत्येक कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं रहती है। मनुष्य और प्राकृति के बीच यह लड़ाई निरंतर ही चलती रहती है। मनुष्य दिनभर जो सोंचता है, विचार करता है, आकांक्षाएं पालता है उन्हें वह संभव नहीं है कि पूरी कर पाए, जिन आकांक्षाओं को, वासनाओं को वह पूरी नहीं कर पाता है, प्राकृति उन्हें रात में स्वप्नों के माध्यम से पूरी करती है।

     यदि कोई व्यक्ति बहुत कामुक प्रवृति का है और दिनभर किसी स्त्री का आलिंगन या प्रेम पाने के लिए प्रयासरत रहता है किंतु सफलता नहीं मिलती तो प्राकृति उसकी इस असफलता को स्वप्न के माध्यम से जब उसका चेतन मन सो जाता है तब सफल बना देती है, तब वह स्त्री जिसे वह पाना चाहता था उसके सपने में आकर स्यमं ही समर्पित हो जाती है और वह व्यक्ति स्वयं को धन्यभागी समझने लगता है यह प्राकृति और मन द्वारा रचा गया महज एक खेल होता है जो वास्तविकता से बहुत परे है।

     प्राकृति और मन की दुनियाँ में रात और दिन के लिए कोई समय निश्चित नहीं है! कब रात शूरूं होती है और कब दिन समाप्त हो जाता है वहां इसकी कोई समय-सारणी नहीं होती है। मनुष्य जब निद्रा में चला जाय तभी रात समझो, जब जाग जाय तभी दिन समझो! इसलिए स्वप्न की घटना कभी भी घट सकती है।

     एक पूर्णिमा की रात 'मैं, अपनी छत पर खुले आसमान के नीचे सोया था। अचानक बीच रात में मैं उठ बैठा, ऐसा लगा जैसे वो मुझे पुकार रही है। गर्मीं के दिन थे, गेंहूं की फसल काटी जा चुकी थी, दूर-दूर तक मानो पृथ्वी पूरी नग्न दिखाई दे रही थी। चांद की दूधिया चांदनी भी अपने पूरे शबाब पर थी, तेज चलती हवाएं मेरी देह को झकझोर रहीं थीं, डर बहुत लग रहा था किंतु उसकी झलक पाने के लिए मैंने हिम्मत जुटाई और अपनी सफेद चादर ओढ़कर नंगे पाँव आहिस्ता से सीढ़ी से नीचे उतर गया! पीछे का दरवाजा खुला था उससे मैं बाहर चला गया।

     मैं किसी पागल प्रेमी की भांति उसकी आवाज का पीछा करने लगा, किंतु जितना मैं उस आवाज के करीब जाता उतना ही वह मुझे दूर सुनाई पड़ती। लेकिन मुझे उससे मिलना था, उसके मिलन के वगैर यह जीवन अधूरा था, उसी के आलिंगन के लिए, उसी के प्रेम के लिए, उसी से मिलने के लिए तो मैं इस जमीन पर उतरा था, यदि उससे न मिल पाऊं तो समझो यह जीवन व्यर्थ गया फिर इस जीवन में कोई सार नहीं। इसलिए मैंने ठान लिया कि जिससे एक होने के लिए मैं जन्मा हूँ उससे मिलन की राह में यदि मेरे प्रांण भी चले जाएं तो भी मैं स्वयं को सफल मानूंगा। उसके बिना इतने दिन मैंने कैसे काटे थे यह मुझे ही मालुम था, मेरे लिए वे दिन, वे रातें बिल्कुल बेकार थीं जिन दिनों और रातों में मैंने उसे याद नहीं किया था। जिन दिनों और रातों में मैंने उसे याद किया और आंसू बहाये वही सिर्फ रातें और दिन मेरे लिए सार्थक सिद्ध हुए। आज मुद्दत के बाद उसने मुझे पुकारा था, इसलिए न जाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।

     आंखों में आंसू और ह्रदय में उससे मिलन की चाहत लिए मैं तेजी से चला जा रहा था, तेज चलती हवाओं से मेरी श्वेत चादर ऐसे उड़ रही थी जैसे किसी विरहिणी का आंचल हो, जो अपने बिछड़े हुए प्रेमी से मिलने भागी जा रही है! उस रात मैं कितना चला, कब तक चला इसका मुझे कुछ पता नहीं! उबड़-खाबड़ रास्ता पार करता हुआ मैं एक तेज बहती नदी के पास पहुंचा, शायद यही वह जगह थी जहाँ से वह मुझे बुला रही थी क्योंकि यहां आकर वह आवाज चुप हो गई थी और यहां पूर्ण सन्नाटा भी छाया हुआ था सिर्फ नदी का बहता हुआ पानी कल-कल कर रहा था, नदी की लहरें खिले चांद की रौशनी में बड़ी मनमोहक लग रही थीं किंतु मैं तो उस चांद के दीदार के लिए तड़प रहा था जो मेरी आत्मा थी, जो मेरे लिए परमात्मा थी।

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     बहुत समय तक इधर-उधर निहारने के बाद मेरा ध्यान उस खंडहर पड़े मन्दिर पर गया जो एक बड़े बरगद के पेड़ की छाया में दिखाई नहीं दे रहा था। मैं निडर भाव से उस मन्दिर की तरफ बढ़ा, अब मेरा भय जा चुका था, क्योंकि अब मैं स्वयं को उसकी खुशबूदार कोमल देह के क्षेत्र में महसूस कर रहा था, यह उसी का इलाका था। मैं मन्दिर के भीतर गया किंतु वहां कोई नहीं था, मन्दिर के दूसरे छोर से एक पतली सी पगडंडी नदी की तरफ नीचे उतरी थी उसी से मैं नीचे उतर गया वहां नदी के किनारे गीली रेत से कुछ दूर पानी में एक नाव ठहरी थी, उस पर कामुक परिधान में एक नव-युवती अलसाई सी बैठी थी, रात होने के बावजूद भी उसका दूधिया बदन और उसके आकषर्क उरोज मुझे निमंत्रण दे रहे थे, लंबे खुले बाल, लाल सुर्ख होंठ, भरी-पूरी छाती ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कोई स्वर्ग की अप्सरा थी। उसने अपने सुकुमार, कोमल हांथ से मुझे इशारा कर नाव में आ जाने के लिए कहा। मैं उसके इशारे को उसका आदेश समझकर उसकी नाव पर चला गया!

     मेरा जीवन आज सफल हो गया, मेरा अधूरापन समाप्त हो गया, मेरा प्रेम, मेरा परमात्मा मुझे प्राप्त हो गया, उसके सन्निध्य में पहुंचकर मेरी सारी दौड़ मिट गई। सुबह जब आंख खुली तो देखा सूरज की गर्म किरणें मेरे माथे को तपा रहीं हैं, पसीना बहने लगा है, गीली रेत से मेरी चादर गंदी हो चुकी है। अब न वह नाव थी, न ही वह मेरे सपनों की नाववाली थी।

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     मैं बहुत थक चुका था, बड़ी मुश्किल से उस मन्दिर तक पहुंचा वहां एक बूढ़ा पुजारी मिला, उसे मैंने सारी आपबीती सुनाई। वह बोला! बेटा, वह कोई तुम्हारी प्रेयसी नहीं थी वह तो एक भटकती हुई आत्मा थी, वह अक्सर नवयुवकों को रात में जगाकर यहां ले आती है और उनके शरीर से अपनी कामवासना को शान्त करने का प्रयास करती है, तुम बड़े खुशनशीब हो बेटा! जो जीवित बच गए। पुजारी की बात सुनकर मैं निराशा का भाव लिए घर लौट आया। सुबह जब मेरी माँ ने मुझे जगाया तब मैंने देखा दिन बहुत चढ़ गया था, घर के सब लोग अपने-अपने काम-धन्धों पर निकल चुके थे।लेकिन अभी भी मुझे अपने वास्तविक प्रेम की तलाश है, आज भी मैं उसे खोजता हूँ, पुकारता हूँ।




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