यह है दुनियाँ की सबसे विचित्र ममी, 550 साल पुराने शव के आज भी बढ़ रहे हैं बाल और नाखून।

यह है दुनियाँ की सबसे विचित्र ममी, 550 साल पुराने शव के आज भी बढ़ रहे हैं बाल और नाखून। 

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  ममी, मर चुके लोगों के वे शव होते हैं जिन्हें संरक्षित करके रखा जाता है। लेकिन इन शवों को अधिकांश पीरामिंडों में ही सहेजा जाता है इसलिए ममीज़ का जिक्र आते ही जहन में मिस्र के पीरामिंडों की तस्वीर उभर जाती है। शवों को संरक्षित करके रखने की परंपरा बहुत प्राचीन है। पीरामिंडों और म्युजियमों में हजारों वर्ष पुराने शव अभी भी जस के तस रखे हैं, जिन्हें दुनियाँ भर से सैकड़ों लोग जिज्ञासावश देखने आते हैं। 

     आधुनिक विज्ञान की माने तो इन शवों को संरक्षित करके रखने के पीछे मंशा यह है कि कभी न कभी विज्ञान इतना सक्षम जरूर हो जायेगा जब वह नवीन तकनीक के सहारे हजारों सालों से मुर्दा पड़े इन शवों में पुनः चेतना प्रवेश करा सकेगा और वे फिर से जीवित हो जायेंगें। आमतौर से किसी न किसी तरल द्रव्यों में या सुखाकर इन शवों को संरक्षित किया जाता है। लेकिन कुछ महान लोग ऐसे भी होते हैं जिनके शवों को किसी प्रकार के कैमिकल व पीरामिंडों की जरूरत नहीं होती है वे प्राकृतिक रुप से स्वत: ही हजारों साल तक संरक्षित रहते हैं। 

भारत में मौजूद हैं ऐसे ही साधकों की जीवित ममियां! 

     हिमाचल का गीयू गांव सतत होती बर्फबारी की वजह से देश से कटा रहता है। यहां साल में 6-8 महीने बेहिसाब बर्फ पड़ती है। गांव काफी ऊंचाई पर स्थित है। तिब्बत से इस गांव की दूरी मात्र दो किलोमीटर है। इस गांव में एक ममी बैठी हुई अवस्था में मौजूद है। विज्ञानिकों ने जांच में पाया है कि यह ममी करीब छ: सौ साल पुरानी है और इसके नाखून और बाल आज भी बढ़ रहे हैं। 

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     बताया जाता है कि जब जवान सड़क का निर्माण कर रहे थे तो खुदाई के दरम्यान कुदाल लगने से ममी के सिर से खून बहने लगा। इसके बाद जवानों की निगाह इस ममी पर गई। उन्होंने इसे वहां से उठाकर आईटीबीपी के कैंप में रख दिया। आज भी कूदाल का वह घाव इस ममी के सिर पर साफ दिखाई देता है।

     साल 2009 तक यह ममी आईटीबीपी के कैंप में ही थी। इसके बाद गांव वालों ने इसे अपने गांव की शरहद पर स्थापित कर दिया। ममी को शीशे के एक कैबिन में रखा गया। इस ममी की देखभाल गांव में रहने वाले परिवार बारी-बारी से करते हैं। इस ममी के बारे में गांव वालों का कहना है कि पहले यह ममी एक स्तूप में गांव में ही स्थापित थी। साल 1974 में इस इलाके में भयंकर भूकंप आया जिसमें यह ममी दब गई। इसके बाद से लोगों ने इस ममी को नहीं देखा। ममी क एक सबसे बड़ी खासियत है इसका बैठी अवस्था में होना। विश्व की दूसरी सभी ममी आपको लेटी अवस्था में मिलेगी, लेकिन यह एकमात्रा ऐसी ममी है, जो बैठी अवस्था में मौजूद है। अपनी इस खासियत के चलते हर साल लाखों की तादाद में पर्यटक इस ममी को देखने के लिए आते हैं। उनके लिए हिमाचल का यह गांव आकर्षण का केंद्र है

     इस ममी के बारे में कहा जाता है कि 550 साल पहले गीयू गांव में एक संत रहते थे। उस वक्त इस गांव में बिछुओं का बहुत ज़्यादा प्रकोप था। गांव वालों को बिछुओं के प्रकोप से बचाने के लिए संत ने समाधि ली। समाधि के दौरान जैसे ही संत के प्राण निकले पूरे गांव में इंद्रधनुष निकल आया और गांव बिछुओं के प्रकोप से मुक्त हो गया।

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     इसके अलावा कुछ लोगों का मानना है कि यह ममी एक बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग की है। सांगला तिब्बत से भारत आए और इस गांव में ध्यान लगाने के लिए बैठे। कहा जाता है कि उसके बाद से फिर वह कभी नहीं उठे। गांव वालों का कहना है कि अब इस ममी के बाल और नाखून बढ़ने कम हो गए हैं। बाल कम होने की वजह से अब ममी का सिर गंजा होने लगा है।



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