क्या स्त्रियों का मोटापा पुरुषों के मोटापे से होता है अलग? क्या है इसका कारण, जानिए पुरुष मोटापे का मनोवैज्ञानिक कारण।

क्या स्त्रियों का मोटापा पुरुषों के मोटापे से  होता है अलग? क्या है इसका कारण, जानिए पुरुष मोटापे का मनोवैज्ञानिक कारण।


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     शरीर के मोटापे को समझने से पहले, थोड़ा शरीर के संबंध में जान लेना जरूरी है। जिसे हम शरीर कहते हैं, वह दरअसल आत्मा द्वारा इकठ्ठा किया गया भोजन ही होता है। आपातकाल में जब आत्मा को बाहर से भोजन नहीं मिलता है तब वह इसी शरीर को पचाना व खाना शुरूं कर देती है, जिसे हम भूख का लगना कहते हैं यह असल में वही घटना होती है, इस समय पेट में जो बाहर से भोजन डाला गया था वह समाप्त हो चुका होता है और तब आत्मा शरीर को ही पचाने लगती है, इसी वजह से भूख से पीड़ा उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में यदि बाहर से भोजन न मिले तो आत्मा एक स्वस्थ शरीर को भी नब्बे दिनों के भीतर ही भीतर पचाकर समाप्त कर देगी अर्थात सारे मांस को खा जायेगी सिर्फ हड्डियां ही हड्डियां शेष रह जायेंगीं, यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है।

     मनुष्य यह जो संग्रह करने की क्षमता अपने भीतर लेकर आता है, और जीवन सिर्फ संग्रह करने में ही व्यर्थ कर देता है, यह प्रोत्साहना भी उसे इसी आत्मा द्वारा मिलती है। आत्मा जब गर्भ में प्रवेश करती है तब उसके पास मात्र एक ही सूक्ष्म अणु होता है वह अणु अपने आसपास अन्य तमाम अणुओं को आकर्षित और इकठ्ठा करता जाता है, एक संपूर्ण शरीर निर्मित होने तक यह अपने इर्द-गिर्द करोड़ों-करोंड़ों अणुओं को एकत्रित कर लेता है। ये सारे अणु आत्मा के लिए कवच का काम करते हैं। भारतीय योग दर्शन बहुत पहले से यह बात जानता है कि मनुष्य का शरीर करीब सात करोड़ तंतुओं एवं अणुओं से मिलकर बना है।

चित्त की दशा का शरीर पर सबसे ज्यादा पड़ता है प्रभाव!


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     मनुष्य का मन एवं शरीर चित्त की दशाओं का गुलाम होता है, शरीर स्यमं को उसी तरह ढालना शुरूं कर देता है जैसा उसका चित्त व मस्तिष्क उसे संकेत देता है। जो व्यक्ति चित्त से जितना लोभी व कंजूस होता है वह बाहर की दुनियाँ में उतना ही धन-बिपासु होकर भटकता है। कंजूस व्यक्ति की एक उपलब्धि यह भी होती है कि वह वस्तुओं को न संग्रहित ही करता है बल्कि उन्हें अपने पास सदा के लिए रोककर भी रखना चाहता है जोकि आस्तित्व के नियमों के विरुद्ध होता है। चित्त जब बहुत स्वार्थ से भर जाता है और वस्तुओं को संग्रहित करने लगता है और संग्रहित की हुई वस्तुओं को त्यागने से डरने लगता है तब उसका शरीर भी उसकी इस आदत का अनुसरण करने लगता है और शरीर भी अपने भीतर अतिरिक्त मांस इकठ्ठा करने लगता है, क्योंकि यही उसकी क्षमता होती है और यही वह कर पाता है। तब पाचन क्रिया गतिशील हो जाती है, भोजन की मांग बढ़ जाती है, पेट निकलने लगता है और वह व्यक्ति मोटापे का शिकार हो जाता है।

मोटापे से बचने का सबसे कारगर उपाय!

     सामान्यतः मोटापे का संबंध शरीर से कम और मन से ज्यादा होता है इसलिए यह साधारण सी बिमारी भी मनुष्य के लिए नर्क के समान बन जाती है और जल्दी काबू में नहीं आती है। मोटापे से बचने के लिए चित्त का सकारात्मक होना अति-आवश्यक है। मन यदि कंजूस है, लोभी है, दंभी है तो यह बिमारी जल्दी नहीं जायेगी क्योंकि जैसा मैंने कहा कि लोभी व्यक्ति का शरीर भी मांस को संग्रहित करता है तो सबसे पहले इस संग्रह के ख्याल को अपने भीतर से निकालना होगा और उदारता की कला सीखनी होगी, बांटने की हिम्मत जुटानी होगी, यह अनुभव करना होगा कि यहाँ वस्तुएं सिर्फ उपयोग के लिए हैं न कि संग्रहित करने के लिए। अगर यह बात मन में बैठ जाए तो चित्त मांस को जमा करना बन्द कर देता है और मोटापा सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।


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     और यह जो बात मैं कह रहा हूँ इसकी प्रमाणिकता के लिए कसौटियां हैं आप स्यमं ही जांच-पड़ताल कर सकते हैं, यदि आप मोटापे से पीड़ित हैं तो निश्चित ही आप भीतर से वस्तुओं के, धन के लोलुप होने चाहिए, यह अपने भीतर खोजने की बात है। 

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