शर्मनाक: जिस्म बेचना यहां की परंपरा है, गंदा है पर धंधा है, मंदसौर में देह की मंडी !

बाछड़ा समुदाय की लड़कियां, महिलाएं एक ऐसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जो उनके अपनों ने ही उनके लिए चुना है।

https://www.paltuji.com/
https://www.paltuji.com/
     जिस तरह मध्य प्रदेश का मंदसौर अफीम उत्पादन और तस्करी के लिए मशहूर है उसी तरह नीमच, मंदसौर, रतलाम के कुछ खास इलाके देह व्यापार के लिए कुख्यात है। यहां सदियों से लोग अपनी ही बहन-बेटियों से धंधा करवा रहे हैं। यहां के बाछड़ा समाज के लिए ज्यादा बेटियां पैदा करने का मतलब है ज्यादा ग्राहक! ऐसे में जब आप किसी टैक्सी वाले से नीमच चलने के लिए कहते हैं तो उसके चेहरे में एक प्रश्नवाचक मुस्कुराहट स्वत: ही तैर आती है। इस यात्रा में अनायास ही ऐसे दृश्य सामने आने लगते हैं, जो आमतौर पर सरेराह दिनदहाड़े कहीं नहीं देखने को मिलते। हां, सिनेमा के रुपहले पर्दे पर जरूर कभी- कभार दिख जाते हैं।

     महू- नीमच राजमार्ग से गुजरते हुए जैसे ही मंदसौर शहर पीछे छूटता है। वैसे ही सड़क किनारे ही बने कच्चे-पक्के घरों के बाहर अजीब सी चेष्टाएं दिखने लगती हैं। कस्बाई इत्र से महकती कम उम्र की कमनीय लड़कियाँ ट्रकों, कारों को रुकने के लिए इशारे करतीं हैं। पहली बार यहां से गुजरने वाले यात्री उनकी ये हरकतें देखकर हक्के-बक्के रह जाते हैं। लेकिन इन कमसिन बालाओं की देह के साथ खिलवाड़ करना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है। मुश्किल है तो किसी सेक्स वर्कर, महिला दलाल से बात करना। हालांकि उनको पुलिस का डर नहीं होता है,

     डर है, तो इस बात का कहीं टीवी चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन में उनकी तस्वीर न दिखाई जाए। ग्राहकों को यह न लगे कि उनकी ऐशगाह असुरक्षित है। समुदाय में धंधे में लगी लड़कियों की संख्या पहले ही कम नहीं थी, उस पर से गरीबी, भुखमरी के चलते अब पड़ोसी जिलों, राज्यों से भी यहां पर जमकर लड़कियां लाई जा रही हैं। इनके मां-बाप इन्हें एक मुश्त रकम देकर बेच जाते हैं। या फिर तय अवधि में आते हैं और दलाल से उसके कमीशन, बेटी के रहने,खाने का खर्च काटकर उसकी कमाई ले जाते हैं। अर्थात बेटी अपनी जिंदगी महज दाल रोटी के लिए बसर कर रही है। लेकिन ऐसी लड़कियों को स्थानीय बाछड़ा लड़कियों की भीड़ में पहचानना बेहद मुश्किल है, क्योंकि उनके इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरा भी है।

https://www.paltuji.com/
https://www.paltuji.com/
     बड़ी जद्दोजहद के बाद सड़क के किनारे बसे एक गांव की अधेड़ उम्र की जोहराबाई बातचीत करने के लिए तैयार हुईं। वैसे जब उन्होंने मुझे अपने मकान की तरफ आते देखा तो एक तेरह बरस की लड़की को मेरी ओर लपकाया। जोहराबाई ने अपने समाज की व्यवस्थाओं से, देह व्यापार से जुड़े सवालों पर जवाब देते हुए कहा कि उनके परिवार ने उन्हें तेरह की उमर में ही इस धंधे में धकेल दिया था। वह कहती हैं कि हमारे समाज में सिसकियों, मिन्नतों का कोई मोल नहीं है। क्योंकि परिवार के मर्द चाहते हैं कि बेटियां धंधा करें ताकि वह रोजी-रोटी की फ्रिक से दूर शराब पीने में मशगूल रह सकें।

बाछड़ा समुदाय में बेटियों से वेश्यावृत्ति करवाना बेहद आम रिवाज है।

     रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों के सैकड़ों गांवों में यह कुप्रथा आज भी जारी है। इनमें कचनारा, रुंडी, परोलिया, सिमलिया, हिंगोरिया, मोया, चिकलाना आदि प्रमुख हैं। किसी को नहीं मालूम यह कब से चला आ रहा है, लेकिन जब बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि उनकी मां-दादी/ नानी भी धंधा करती थीं, तो जाहिर है कि मामला दशकों का नहीं सदियों का है। दूसरी ओर ज्यादातर पुरुष निठल्ले, शराबखोर ही मिलेंगे। उनके लिए इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि उनकी अपनी बेटी/बेटियों को स्लेट, कापियों की उम्र में ग्राहको को रिझाने के गुर सिखाए जाते हैं। मंदसौर से नीमच के बीच सड़कों के किनारे जिस्मफरोशी की जितनी दुकाने हैं, उससे अधिक दुकाने, अड्डे गांवों के भीतर हैं। रास्ते से गुजरते वाहनों के सामने लड़कियां लिपस्टिक पोते, अपने उरेजों के उभारों को भरसक दिखाने की चेष्टा करती हैं। ऐसी ही एक बाला ने कहा, साहब पहली बार आए हो! कोई बात नहीं, यहां पहली बार आने पर लोग ऐसे ही शर्माते हैं। झिझक मिटने में अधिक देर नहीं लगती।

     भंवरी की बातों में कोरी सच्चाई और अनुभव की तपिश है। उस अनुभव से उपजी पीड़ा की जिसे न चाहते हुए भी वासना की भट्टी में झोंक दिया गया था। कमसिन उम्र में उसके नाजुक बदन को दिन-रात यहां से गुजरने वाले ट्रक चालकों और इलाके के जमींदारों के सामने परोस दिया गया। यह सिलसिला तब जाकर थमा जब भंवरी के साथ उसके ग्राहक रामसिंह ने ही दिल मिला लिया था।यहां प्यार होने के बाद यही रिवाज चलता है। एक औरत, बाछड़ा लड़की की नियति यही होती है जब तक वे ग्राहकों को रिझाने के काबिल होती हैं तब तक उनके परिवार को यह कतई मंजूर नहीं होता है कि लड़कियां घर की दहलीज को पार करें। क्योंकि ऐसा करने से उनको हर महीने मिलने वाली मोटी रकम से हाथ धोना पड़ सकता है। अनेक प्रगतिशील विचारों के धनी ऐसे भी हैं जिन्होंने इस मोटे अर्थशास्त्र को समझा है और यहीं बस गए। उन्होंने वेश्यावृत्ति करने वाली किसी लड़की से शादी कर ली है और फिर उसको तो इस धंधे से दूर रखा है लेकिन उसके नेटवर्क का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं और उसकी दूसरी बहनों से धंधा भी करवा रहे है।

     चलिए इनको तो फिर भी बख्शा जा सकता है लेकिन उन भाइयों पिताओं को कैसे क्षमा किया जा सकता है जो अपनी बहन बेटियों की रक्षा का दम भरते है उससे रिश्तों की दुहाई देते है। फिर उसे विवश करते हैं कि वह अपने जिस्म से उनके लिए रोटियां सेंके। उसे मजबूर करते हैं कि वह तितलियों को पकड़ने, सपने बुनने के बजाय कम उम्र में ही ग्राहकों की बाहों में मसली जाएं। एक ग्राहक के जाने के बाद दूसरे के लिए फिर सजकर रोड़ किनारे बैठ जाएँ। बाछड़ा समाज अपनी बेटियों से ही धंधा करवाता है। इस काम में बहुओं को आमतौर पर नहीं उतारा जाता है। बातचीत में एक अन्य महिला ने बताया कि हमारे बेटों को यह कतई पसंद नहीं है कि बीबी किसी गैर मर्द का बिस्तर गर्म करें। यदि कोई बहू इस तरह की हिमाकत करती है तो हमारे बेटे उनके हाथ-पांव काटकर फेंकने से भी नहीं हिचकते हैं। वह आगे कहती हैं कमबख्त मर्द अपनी जोरू को तो संभालकर रखना चाहते हैं और बहन बेटियों को पैदा होत ही ग्राहकों का बिस्तर गरम करने के लिए विवश करते हैं।

     कुल मिलाकर बाछड़ा समाज के लिए बेटी मोटी कमाई का सहज सुलभ साधन है। परिवार के पालन-पोषण के लिए, धन कमाने के लिए इनके लिए इससे बेहतर कोई साधन नहीं है। ग्राहकों को बुलाने और सौदा तय करने के काम में कहीं भी आपको कोई पुरूष नजर नहीं आएगा। इसे समाज के मर्दों की शान के खिलाफ समझा जाता है। यानि मां और उसकी बेटी-बेटियां ही धंधे के समय घर के दरवाजे और ढाबों होटलों के इर्द-गिर्द नजर आती हैं। इनकी जाति पंचायतों की बात और भी निराली है। जहां एक ओर दुनियाँ के सामने मंच से शरीर के सौदे की मुखालफत की जाती है वहीं दूसरी ओर पंचायत सरकारी अफसर इसे बढ़ावा देते रहते हैं ताकि उनकी दुकाने बंद न हों। वैसे भी यह सारा धंधा मर्दो के आलस और उनके निकम्मेपन की ही देन है। मर्दों के पास चूंकि एक तय रकम होती है इसलिए वह मेहनत-मजदूरी से परहेज करते हैं।

     यहां अनेक पढे लिखे लोग भी इस काम को अपने घरों में ही चला रहे हैं। उनके पास ऐसी संभावना, योग्यता है कि वह दूसरे पेशे को अपनाकर जीवनयापन कर सकते हैं लेकिन वह ऐसा करते नहीं हैं। क्योंकि उनके पास रोजगार का सबसे बढ़िया साधन है, उनकी बेटियां। इसी कारण वह ऐसी लड़कियों को भी इस धंधे में उतार देते हैं, जो पढ़ाई में जुटी हुई हैं। नीमच मार्ग पर ही बसे मुरली गांव में एक ऐसे दंपति से मुलाकात हुई, जिनके तीनों बच्चे सरकारी सेवा में हैं, लेकिन उसके बाद भी वह दलाली के काम में लगे हुए हैं। इसी तरह सड़क किनारे चारपाई पर बैठकर ग्राहकों को बुलाने के लिए एक प्रौढ़ महिला की कहानी भी खासी रोचक है। उसने अपनी दो बेटियों, बेटे की शादी कर दी है और अब बाहर यानि उड़ीसा, राजस्थान से आने वाली लड़कियों की दलाली खाती हैं। इस काम में यहां के पुरुर्षों की भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि वे ही परिवार की स्त्रियों को दलाली करने के लिए उकसाते, मजबूर करते हैं। बाछड़ा समुदाय पर काम कर रहे अनेक इस संगठनों और सरकार को यह बात चौंकाने लगती है, देह की इस मंडी में अब राजस्थान से भी लड़कियां उतारी जा रही हैं। तेरह साल की अनीता हालात की मारी एक ऐसी ही बेबस है, जिसे राजस्थान से उसका परिवार यहां छोड़ गया है।

     यह वही लड़की है जिसे जोहराबाई ने मुझे खुश करने के लिए मेरी तरफ लपकाया था। वह दिनभर में कम से कम पांच ग्राहकों की वासना को संतुष्ट करती है। यह सारा इलाका ऐसी हजारों लड़कियों से भरता जा रहा है। इसके साथ ही महाराष्ट्र से बेकार होने के बाद बार बालाओं के ठुमके और जिस्म के सौदों के लिए भी यह राजमार्ग नया ठिकाना है। देह के कारोबार में तीस साल से अधिक बिताने के बाद उम्र के अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची  सेमरी बाई बताती हैं, हम लोग अपनी बच्चियों को सात की उम्र से ही ग्राहकों को पटाने के तरीके सिखाने लगते हैं। यह समय लड़कियों के प्रशिक्षण का होता है। कम उम्र में उनके विरोध का खतरा नहीं होता और इनकी कीमत भी मोटी मिलती होती है।

     देह की इस मंडी में उतारी गई लड़कियों की साक्षरता के बारे में कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इन दिनों अनेक एसी लड़कियां खुद को ग्राहकों के सामने परोसने में लगीं हैं जो दसवीं और बारहवीं की छात्राएं हैं। अब वे इसके लिए तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। मोबाइल नंबरों की पहुंच इंदौर के अनेक मालदारों तक है। जो कभी यहां आते हैं, तो कभी लड़कियों की आपूर्ति बिजनेस मीटिंग के लिए इंदौर आने वाले सफेदपोश लोगों के लिए होती है। वासना के प्यासे धनकुबेरों और वैश्वीकरण की कथित कमाई से फूल कर कुप्पा हुए लोगों के सामने देह की ऐसी मंडी है, जिसका सारा कारोबार मासूम उम्र की लड़कियों के इर्द-गिर्द ही सिमटा है। जिनकी औसत उम्र नौ से पैंतीस साल है।

https://www.paltuji.com/
https://www.paltuji.com/
     जिस तरह दिनदहाड़े सड़क पर बने कच्चे-पक्के मकानों में जिस्मफरोशी होती है, उससे जाहिर है कि पुलिस इस कारोबार में बराबर की हिस्सेदार है। बार-बार ग्राहकों, धंधा करने वालों को होने वाली दिक्कतों से अच्छा है कि टेंशन फ्री होकर काम करो। शाम गहराते ही यहाँ का नज़ारा बदल जाता है। दोपहर में सौ से दो सौ रुपए की मांग करने वाली लड़कियां शाम को बीस से पचास रुपए में ही राजी हो जाती हैं। वजह, रात को यहां कोई भी वाहन नहीं रुकता, साथ ही अब यहां लड़कियां अधिक हो गई हैं, जिनके अनुपात में ग्राहक कम आते हैं। इस तरह रतलाम, मंदसौर, नीमच जिलों में बाछड़ा समुदाय की लड़कियां, महिलाएं एक ऐसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जो उनके अपनों ने ही उनके लिए चुना है। इसलिए उनके नारकीय जीवन से मुक्ति के लिए भी महिला नेतृत्व को ही आगे आना होगा। क्योंकि पुलिस, सरकार से महिलाओं को अपने ही समाज की पुरुष सत्ता के खिलाफ न्याय की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है।


https://www.paltuji.com/



Previous
Next Post »