क्यों छोड़ा था भगवान बुद्ध ने अपना ऐसो-आराम! सुनिए बुद्ध के ह्रदय की आवाज। spirituality

क्यों छोड़ा था भगवान बुद्ध ने अपना ऐसो-आराम! सुनिए बुद्ध के ह्रदय की आवाज।

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     भगवान बुद्ध के जीवन की कथा है! जब उनका मन सांसारिक भोग-विलासों से ऊब गया तो वे एक रात चुपचाप अपनी पत्नी और इकलौते बेटे को सोता हुआ छोड़कर जंगल एकांत में चले गए। पत्नी यशोधरा की जब नींद टूटी तब वह शयनकक्ष में बुद्ध को न पाकर बहुत चिन्तित हुई, उसने महल में बुद्ध को बहुत खोजा किंतु वे तो जा चुके थे अपने वास्तविक महल की तलाश में! इस पृथ्वी पर बने हुए महल, बने हुए घर तभी तक प्रीतकर लगते हैं जब-तक असली घर की खबर नहीं मिलती, जिस व्यक्ति को पता चल जाता है कि उसका असली ठिकाना कहां है, तो फिर वह नाहक ही यहाँ जीवन नहीं व्यर्थ करता, फिर निकल ही जाता है उसकी खोज में, उसकी तलाश में। जैसे छोटा बच्चा है, जब माँ नहीं रहती है या किसी काम धंधे में व्यस्त रहती है तो वह बच्चा खिलौनों से खेलता रहता है, अपना चट्टू मुंह में दबाए चूसता रहता है, किंतु जैसे ही माँ पर दृष्टि पड़ती है वैसे ही वह सारे खिलौने और चट्टू फेंककर मां की तरफ हांथ फैला देता है।

     वे खिलौने और चट्टू तो बहाना थे, महत्वपूर्ण तो मां थी, एक छोटे बच्चे के लिए मां के अतिरिक्त अन्य कुछ महत्वपूर्ण हो भी नहीं सकता है। हमारे लिए परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, इसलिए उसके सौंदर्य की धुन जब भी किसी व्यक्ति के कानों में पड़ती है तब वह स्वयं को रोकने में असमर्थ हो जाता है। बुद्ध नहीं रुक सके, वे रुक जांए इसके लिए उनके पिता ने बड़े आयोजन किये थे, सुन्दर से सुन्दर स्त्रियाँ उन्हें उपलब्ध करायी गयीं, कहते हैं वे जिधर से गुजरते थे उधर खड़े वृक्षों से मुरझाए व पीले पड़े पत्तों को तोड़ कर हटा दिया जाता था जिससे उनके मन में इस जगत की नश्वरता का कोई असर न पड़े, लेकिन उन्हें नहीं रोका जा सका।

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आखिर क्यों छोड़ा बुद्ध ने संसार का ऐसो-आराम!

     संसार में लिप्त लोगों के लिए यह प्रश्न सदा ही सोंचने योग्य रहा है लेकिन जो जानते हैं उनके लिए समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। दरअसल इस संसार में ऐसो-आराम जैसा कुछ भी नहीं है लोग सिर्फ दिखाई पड़ते हैं कि वे सुख में हैं, सुख में यहां कोई भी नहीं है, सुख यहां किसी को छूता ही नहीं है। यह बात बुद्ध ने अनुभव कर ली थी। बुद्ध के पास सबकुछ था धन, वैभव, पद-प्रतिष्ठा सबकुछ, किंतु वह सबकुछ होते हुए भी मन की शांति नहीं थी, मन उतना ही अशांत था जितना किसी ऐसे व्यक्ति का अशांत रहता है जिसके पास कुछ भी नहीं होता। मन की शांति इस जगत में कुछ होने या न होने पर निर्भर नहीं है, मन सिर्फ उसे ही खोजता है चाहे धन में खोजे, पद में खोजे, पति में खोजे, प्रेमी खोजे खोज सिर्फ परमात्मा की ही हो रही है। हर कोई उसे ही तलाश रहा है, जिसका उससे मिलन हो जाता है उसकी यात्रा फिर समाप्त हो जाती है, बुद्ध की यात्रा समाप्त हो गई।

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यहां प्रत्येक को अनंत की तलाश है!

     क्या कभी आपने सोंचा है कि यहाँ हर कोई अनंत की अभीप्स क्यों रखता है, अनंत की चाहत क्यों रखता है। एक आदमी मकान बनाता है तो इतना मजबूत बनाने की इच्छा रखता है कि वह अनंतकाल तक टिका रहे, एक आदमी किसी के प्रेम में पड़ता है तो यही चाहत रखता है कि उसका प्रेम अनंतकाल तक कायम रहे, हिन्दुओं ने तो कल्पना की है कि विवाह का बंधन सात जन्म तक बरकरार रहता है। हम कुछ भी खरीदते हैं तो उसकी भी गांरटी फिक्स कर लेते हैं कि यह जो मैं खरीद रहा हूँ यह ज्यादा दिन टिकेगा या नहीं। हम चाहते हैं कि यहाँ जो कुछ भी हो वह अनंतकाल के लिए हो, सुख का मिलन हो या दुख से छूटना हो सब सदा-सदा के लिए हो जाए।

     यह चाहत हमारे भीतर क्यों है? यह सवाल स्यमं से पूछ लेना चाहिए। जिसने भी यह प्रश्न पूछा है उसने पाया है कि हमारी मांग अनंत की इसलिए है कि हम इस अनंत आस्तित्व के हिस्से हैं और यह अनंत जब तक हमें नहीं मिल जाता तब तक यह दुख न टूटेगा, तब तक यह संताप नहीं मिटेगा। इसलिए अगर प्रेम ही करना हो तो परमात्मा से कर लेना, अगर गांठ ही बांधनी हो तो अनंत से बांध लेना, अगर विवाह ही रचाना हो तो उससे रचा लेना जो अनंत है। कबीर ने कहा है, राम मेरे पिया, मैं राम की दुल्हनियां! मैं तो ब्याह चली राम एक अविनाशी को!! पिया तो एक ही है, पति तो एक ही है, प्रेमी तो एक ही है उसी से मिलना है, उसी का आलिंगन करना है, उसी की बांहों में स्यमं को समर्पित कर देना है बाकी तो सब प्रतीक भर हैं। यह बात यदि समझ में आ जाय तो ही बुद्ध को समझा जा सकता है अन्यथा उन्हें समझना कठिन होगा।

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