क्या भगवान अंधा है? जानिए अदृश्य आस्तित्व की सच्चाई! Science

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     आंखों के देखने की जो प्रक्रिया होती है वह इतनी आसान नहीं है जितनी दिखाई पड़ती है। आंखों में किसी की तस्वीर बनने तक जो प्रक्रिया होती है वह बड़ी ही जटिल होती है। उदाहरण के लिए हम इसे एक कैमरे के माध्यम से समझ सकते हैं। कैमरे की भांति ही आंखो में भी एक लॆंस और एक पर्दा अर्थात रेटीना होता है। हम जो वस्तुएं देखते हैं उनकी तस्वीर इसी पर्दे यानी हमारे रेटीना पर बनती है। लेंस जो होता है वह पारदर्शी होता है और रेटीना अर्थात पर्दा अपारदर्शी होता है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तब हमें वह वस्तु दिखाई नहीं पड़ती है जैसा आमतौर से समझा जाता है। जो वास्तु हमें दिखाई पड़ती है उससे पहले उस वस्तु पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं फिर वही किरणें परिवर्तित होकर आंखो के लेंस से होती हुई आंखों के पर्दे अर्थात रेटिना पर पड़ती हैं, रेटीना अपारदर्शी होता है, इसी अपारदर्शीता की वजह से किरणें पर्दे पर आकर ठहर जाती हैं और जिस वस्तु से प्रकाश की किरणें टकराकर लौटती हैं उस वस्तु की तस्वीर हमारे रेटीना पर बन जाती हैं।

चीजें न दिखाई देने का कारण!

    महत्वपूर्ण बात यह है कि देखने की प्रक्रिया मुख्य रूप से आंखों के लैंस, रेटीना और वस्तु पर पड़ने वाले प्रकाश की किरणों पर निर्भर होती है। इन तीनों में यदि कोई एक भी अस्तव्यस्त हो जाए तो देखने की घटना नहीं संभव हो सकेगी। इस संबंध में दो तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं! एक यदि ऐसी कोई वस्तु हो, जिस पर प्रकाश की किरणें तो पडें किंतु वे उस वस्तु के आर-पार निकल जाएं, परिवर्तित होकर आंखों तक न पहुंचे ऐसी स्थिति में वह वस्तु दिखाई नहीं देगी। इस आस्तित्व में ऐसी बहुत से विशालकाय पिंड व वस्तुएं मौजूद हैं जो पारदर्शी होने के कारण दिखाई नहीं पड़ती हैं, क्योंकि प्रकाश की किरणें उन वस्तुओं के आर-पार निकल जाती हैं, आंखों तक पहुंचती हैं।

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     दूसरी स्थिति में, वस्तु पारदर्शी न हो, प्रकाश की किरणें भी आर-पार न जा रहीं हों फिर भी वस्तु अदर्श्य हो जाएगी अर्थात दिखाई नहीं देगी। ऐसी स्थिति तब होती है जब आंख के रेटीना में कोई गड़बड़ी हो जाती है और किरणें ठहर नहीं पाती हैं और जब पर्दे पर किरणें ठहरेंगीं ही नहीं तो चित्र भी नहीं बनेगा। ऐसी स्थिति वाले मनुष्यों को ही अंधा कहा जाता है उनके अंधेपन का कुल कारण इतना ही होता है कि उनके रेटीना पर पड़ने वाली प्रकाश की किरणें ठहर नहीं रहीं हैं वे आर-पार जा रही होती हैं।

     अगर आंखों के देखने की इस प्रक्रिया को ठीक से समझें तो जो भी वस्तुएं अदर्श्य हैं, दिखाई नहीं पड़ती हैं वह सब पारदर्शी होनी चाहिए अर्थात प्रकाश की किरणें उन वस्तुओं पर पड़ती तो हैं परंतु परिवर्तित नहीं हो पाती हैं। अदर्श्य वस्तुओं की भांति ही अदर्श्य आस्तिव व देवता, भगवान आदि वह भी यदि नहीं दिखाई पड़ते हैं तो उनके न दिखाई पड़ने का कारण भी इसी नियम पर आधारित है। अगर भगवान, देवता आदि मनुष्यों की पकड़ के बाहर हैं, दिखाई नहीं देते हैं तो समझना मुश्किल नहीं है कि प्रकाश की किरणें उनके भी आर-पार निकल रही हों और वह भी मनुष्य जगत को देखने में असमर्थ हों, जैसा मनुष्य जगत उन्हें देखने में असमर्थ है।

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