हिंदू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म का शरीर चार भागों में विभाजित है। Psychoanalysis.

वर्णों के आधार पर, इन चारों जातियों को आजीविका के लिए मिले हैं अलग-अलग काम!

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     हिंदू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म का शरीर चार भागों में विभाजित है। उन्हीं चार भागों से क्रमशः चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र जातियां निर्मित मानी गई हैं। शास्त्रों की मानें तो ब्राह्मण ब्रह्म के मुख से जन्में हैं और क्षत्रिय भुजाओं व सीने प्रदेश से पैदा हुए हैं, इसी तरह वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्म के कटि प्रदेश से लेकर जंघाओं के मध्य भाग से मानी गई है, और शूद्रों का आविर्भाव ब्रह्म के घुटनों से निचले भाग से हुआ माना गया है।

वर्णों के आधार पर, इन चारों जातियों को आजीविका के लिए मिले हैं अलग-अलग काम!

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     ब्राह्मण: कौंन से वर्ण के लोग कौंन सा कार्य करके अपनी आजीविका चलांएगें शास्त्रों में यह भी पूर्व-निर्धारित है। उदाहरण के लिए ब्रह्ममण जो ब्रह्म के मुख से जन्मा है वह अपने मुख का ही उपयोग करके अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करेगा, यही कारण है कि ब्राह्मण अधिकांश कथा-भागवत द्वारा ही धनोपार्जन करते हुए पाये जाते हैं। ब्राह्मण को यदि बंदूक देकर सरहद पर भेजेंगे तो वह कतई राजी नहीं होगा उसे तो मंत्रोच्चार करने अथवा वेदपाठ व गीतापाठ करने में ही रस आता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण की सारी चेतना मुख में ही निवास करती है, बोलना और भोगना यही ब्राह्मण का मूल धर्म है।

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     क्षत्रिय: क्षत्रिय ब्रह्म की भुजाओं एवं छाती भाग से जन्मा है इसलिए क्षत्रिय को वह बिल्कुल भी रास नहीं आता जो ब्रह्माण को रास आता है, क्षत्रिय अपनी जुबान से नहीं बल्कि अपनी भुजाओं की ताकत से धनोपार्जन करता है और अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। क्षत्रिय का जीवन ब्राह्मण के जीवन से एकदम विपरीत है, इसलिए क्षत्रिय सदा कटने-मरने के लिए तत्पर रहता है यही उसका स्वभाव भी है और धर्म भी। इसीलिए गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपने धर्म में मर जाना भी श्रेयस्कर है क्योंकि दूसरे का धर्म भय देने वाला होता है, स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।

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     वैश्य: अपना व अपने कुटुंब का पालन-पोषण करने के लिए वैश्य व्यापार का सहारा लेता है। वैश्य को न हिंसा में रस होता है और न ही अहिंसा में। वैश्य का जन्म कटि प्रदेश अर्थात नाभि से नीचे व घुटनों से ऊपर पड़ने वाले भाग से हुआ है। इसलिए वह यदि धनोपार्जन के लिए इस भाग का उपयोग करे तो बिल्कुल शास्त्रसंम्मत है। वैश्य ऐसा वर्ण है जिसके पास न मुख से बड़बड़ाने की ऊर्जा है और न ही भुजाओं की शक्ति है इसलिए उसके लिए कुछ बेचकर ही धन अर्जित करने का मात्र एक मार्ग है।

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     शूद्र: इस वर्ण का जन्म ब्रह्म के शरीर के चार भागों में से सबसे नीचे के भाग अर्थात घुटनों से नीचे से हुआ है हिंदू शास्त्रों में ऐसा बताया गया है। शरीर के इस भाग का उपयोग दौड़ने-भागने व मेहनत करने के लिए ही होता है। और यह भाग ही शरीर के अन्य भागों का बोझ ढोता फिरता है। इसलिए शूद्र का काम है कि वह चुपचाप सेवा करता रहे। इसलिए देखते हैं शूद्र बेचारा सदियों से दूसरों के पैर दबा रहा है फिर भी उसे कोई सम्मान नहीं मिलता और वह सम्मान पाने की चेष्टा भी नहीं करता वह अपनी इस सेवा से राजी है।

     हिंदू शास्त्रों में वर्णित इस ब्रह्मांडीय वर्ण-व्यवस्था की परिभाषा महराज मनु द्वारा की गई है जिसे आजतक भारतीय मानुष हिला नहीं पाया है। क्या है इसका कारण? क्यों जातिवाद भारतीय चेतना का गला सदियों से दबाए हुए है। इसका मनोविज्ञान कारण हम जानेंगे, प्रैक्टिकल लाईफ के अगले लेख में, धन्यवाद!


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