जानिए बुद्धि का रहस्य! बुद्धिमान व्यक्ति क्यों नहीं होते हैं सुन्दर! Psychology of intelligence. Practical life.

जानिए बुद्धि का रहस्य! बुद्धिमान व्यक्ति क्यों नहीं होते हैं सुन्दर!

     आप यह तो जानते ही हैं कि जगत में, समाज में बुद्धि की बड़ी उपयोगिता है, उसकी प्रसंशा भी खूब होती है! बुद्धिमान व्यक्ति, महिला हो या पुरुष वह प्रत्येक स्थान पर सम्मान का पात्र होता है!

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         लेकिन क्या आपको यह पता है कि बुद्धि भौतिक देह को कुरूप करती है, पंगु करती है! जी हां! यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है! लेकिन जरूरी नहीं है कि मैं जो कह रहा हूँ, वह मनोविज्ञान को पता है! लेकिन पता होने या पता न होने से कोई तथ्यों में भेद नहीं पड़ता! स्त्री हो या पुरुष बुद्धि जितना अधिक विकसित होती जायेगी, भौतिक शरीर उसी की तुलना में कुरूप और भद्दा होता जायेगा!

     आपने कभी शायद गौर नहीं किया होगा! बड़े-बड़े स्कूलस् हैं, डिग्री कॉलेज हैं! वे सब होडिंगस् लगाते हैं, पोस्टर दिखाते हैं! उन पोस्टरों में 'टॉपर' बच्चों की, छात्र-छात्राओं की तस्वीरें होती हैं! वे सब अच्छे नंबरों से पास हुए होते हैं! किंतु क्या आपने कभी उन तस्वीरों में एक भी ऐसी तस्वीर देखी है जो सुन्दर व आकर्षक हो! और अगर देखी हो तो समझ लेना यह चमत्कार हो गया स्कूल प्रशासन की तरफ से! क्योंकि यह संयोग कभी हजारों में एक-आध के साथ ही घटित होता है जब बुद्धि और सौंदर्य इकट्ठे हो जाते हैं! अन्यथा तो बुद्धि सौंदर्य की विरोधी है! जहाँ बुद्धि है, वहां सौंदर्य व आकर्षण का होना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

     उसके कारण हैं! बुद्धि सदा प्राकृति के विपरीत खड़ी होती है, विरोध में खड़ी होती है! और जीवन की सारी सुन्दरता, सारी सहजता, सारी निर्दोषता प्राकृति के साथ एक होकर जीने में ही है! प्राकृति से अलग होकर जीना ऐसा ही है, जैसे कोई छोटा बच्चा अपने माता-पिता से अलग होकर जंगली जानवरों के साथ जाकर जिए!

     आज मनुष्यता के संबंध बुद्धि के साथ प्रीतिकर होते जा रहे हैं, मधुर होते जा रहे हैं! और बुद्धि एक पागल-भाव के सिवाय कुछ भी नहीं है! बुद्धि तुम्हें भावनाओं से पृथक करती है, प्राकृति से तोड़ती है, सत्य से, सहजता से, निर्दोषता से दूर धकेलती है, तुम्हारे ह्रदय को पत्थर करती है और तुम खाली हो जाते हो! अब खोपड़ी में विचारों के अतिरिक्त, कल्पनाओं के अतिरिक्त, सपनों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं बचता है।

इसलिए बुद्धिमान स्त्रियाँ खो देती हैं अपना सौंदर्य:

     प्रायः बुद्धि जो होती है वह पुरुष-प्रधान होती है और भावनाओं को स्त्री प्रधान माना जाता है। जिस स्त्री का ह्रदय भावनाओं प्रेम, समर्पण, करूणा, दया, ममता आदि से भरा होता है वह उतना ही अपने परिवार व समाज के लिए प्रीतकर और सौंदर्यवान होती है, और सभी उसकी प्रशंसा करते हैं। जब वही स्त्री बुद्धिमान बनने की चेष्टा करती है तब वह बुद्धिमान तो हो जाती है किंतु वह अपने ह्रदय की नैसर्गिक भावनाओं की जो संभावनाएं होती हैं उनसे अलग हो जाती है।

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     ख्याल रहे! इस पुरूष प्रधान जगत में स्त्रियों की बुद्धिमत्ता का कोई मूल्य नहीं है। स्त्री जब भी कुछ ऐसा हासिल करना चाहती है जिसकी वह चाहत रखती है तब उसे वह उसकी बुद्धि के बल पर नहीं, बल्कि उसके ह्रदय की भावनाओं और उसके सौंदर्य के बल पर ही उपलब्ध होता है, फिर वह चाहे क्लियोपैट्रा हो, सीता हो, द्रोपदी हो या आज की कोई प्रसिद्ध नारी हो, सबकी कामयाबी का राज उनके ह्रदय और सौंदर्य में ही निहित रहता है न कि मस्तिष्क में!

     जिस तरह बुद्धिमान पुरूष के इर्द-गिर्द अन्य तमाम पुरूष इकठ्ठे होने लगते हैं और उसे अपना गुरू मानने लगते हैं ठीक उसी प्रकार सौंदर्य और प्रेम से सराबोर स्त्री की अन्य तमाम स्त्रियाँ भक्त हो जाती हैं और उसे अपनी सबसे अच्छी मित्र व सलाहकार समझने लगती हैं। बुद्धिमान स्त्री जो दो और दो चार जोड़ना जानती है उसे न तो स्त्रियाँ ही पसंद करती हैं और न पुरूष ही पसंद करते हैं। उसका कारण जैसा मैंने कहा यही है कि बुद्धिमत्ता ह्रदय से प्रेम, समर्पण, दया, ममता, स्नेह आदि को नष्ट कर देती है और एक संपूर्ण स्त्री के लिए प्रेम, समर्पण, दया, ममता, स्नेह आदि ही सबसे बड़ा धन है जिस स्त्री के ह्रदय में उक्त गुंण विद्यमान नहीं हैं वह अकेले बुद्धि के बल पर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं प्राप्त कर पाती है।

बुद्धिमान व्यक्तियों का कभी बुद्धिमान स्त्रियों से प्रेम या विवाह नहीं होता है!

     आमतौर से यह देखा जाता है कि माता-पिता अपने पुत्र के विवाह के लिए एक पढ़ी-लिखी, और होशियार बहू तलाशते हैं। किंतु यह शायद आपको पता नहीं है कि यह सपना सिर्फ साधारण और असक्षम परिवारों का ही होता है, जो बहुत बुद्धिमान होते हैं अथवा राजा या सम्राट होते हैं वे बुद्धिमान नहीं बल्कि सौंदर्यवान स्त्री की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। उदाहरण के लिए मैं यहाँ कुछ घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा।

     राजा शांतनु एक सम्राट थे और वे 'सत्यवती, एक अपढ़ मल्लाह की अपढ़ कन्या पर आकर्षित हुए थे क्योंकि उसका रूप और सौंदर्य किसी उर्वशी से कम न था! शकुंतला के सौंदर्य से भला कौंन नहीं परिचित होगा, वह जंगल में एक ऋषि की कुटिया में पली-बढ़ी थी, वह भी शिक्षा-दीक्षा से कोसों दूर थी किंतु उसके रूप और सौंदर्य पर मोहित होकर राजा दुष्यंत ने उससे विवाह रचाया था।

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     कालीदास ने अपनी प्रेयसी के संबंध जो लिखा है वह भी समझ लेने जैसा है। कालीदास ने लिखा है! देह की छरहरी, उठते यौवन वाली, नुकीले दातों वाली, पके कुंदरू से लाल अधर वाली, कटि की क्षीण, चकित हिरणी की चितवन वाली, गहरी नाभि वाली, श्रोणि भार से चलने में अलसाती हुई, स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई! कालीदास कहते हैं ऐसी मेरी पत्नी अलकापुरी की स्त्रियों में मानों ब्रह्मा की पहली कृति है।

     कालीदास यह भी लिख सकते थे कि किसी भी सवाल को क्षण में हल कर देने वाली, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं लिखा, जबकि वे जिस लड़की के प्रेम में थे (विद्वात्तमा) वह बहुत बुद्धिमान थी उसकी बुद्धि को देखकर ही उसका नाम विद्वत्तमा रखा गया था। हम आज भी देखते हैं कि यह जो पुरुष समाज है यह स्त्रियों के रूप और सौंदर्य का ही दीवाना है न कि उनकी बुद्धिमत्ता का! स्त्री कितनी ही बुद्धिजीवी क्यों न हो, यदि वह दिखने में कुरूप होगी तो वह सभी स्थानों पर निराशा की ही भागी बनेगी!

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एक लंबे अर्से तक क्यों रखा गया स्त्रियों को शिक्षा से दूर!

     यह बात शायद आप सभी जानते होंगे कि भारत जैसे पुरातन और सनातन समाज में स्त्रियों को बहुत लंबे अर्से तक शिक्षा से दूर रखा गया, उन्हें शिक्षित होने की अनुमति नहीं दी गई। आज भी हमारे समाज में ऐसे तमाम लोग मौजूद हैं जो नहीं चाहते कि स्त्रियाँ शिक्षित हों। लेकिन आज जो लोग इसकी खिलाफत करते हैं वे अपने निहित स्वार्थों और स्त्रियों का शोषण करने के लिए करते हैं। इससे पूर्व जो लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोध में थे उनका कारण स्वार्थ नहीं था और न ही स्त्रियों का शोषण करना था। उनका विरोध बड़ा ही वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक था। और उस विरोध का मनोविज्ञान यही था कि स्त्रियों की बुद्धि उनके सौंदर्य, प्रेम, स्नेह और ममत्व जैसे ह्रदय के भावों को कमजोर करती है। उनका ख्याल स्त्री के सौंदर्य, रुप, और ममत्तव पर अधिक था, वे स्त्रियों को बुद्धिमान बनाकर उनका सौंदर्य और प्रेम नष्ट नहीं करना चाहते थे। इसलिए स्त्रियों के लिए शिक्षा कोई अनिवार्य अंग नहीं थी।

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     आज शिक्षा स्त्रियों के लिए अनिवार्य अंग है, आज शिक्षा स्त्रियों के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पुरूष के लिए है, बल्कि मैं तो कहूँगा उससे भी ज्यादा क्योंकि आज कारण बदल चुके हैं। आज स्त्रियों की शिक्षा का विरोध इस फिक्र में नहीं होता है कि उनका सौंदर्य और प्रेम बरकरार रहे बल्कि इसलिए होता है कि उनका शोषण किया जा सके। आज स्त्री जितनी अशिक्षित और अपढ़ होगी परिवार और समाज द्वारा उतनी ही सहजता से वह शोषित की जायेगी।

क्या करें? जिससे बुद्धि और सौंदर्य दोनों बरकरार रहें!

पहली बात! मैंने जो बातें यहां प्रस्तुत की हैं इनका अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियों को शिक्षा नहीं ग्रहण करना चाहिए। शिक्षा तो प्रत्येक को प्राप्त करनी ही होगी और पुरुषों से ज्यादा करनी होगी, क्योंकि अब शिक्षित और गैर-शिक्षित दोनों ही प्रकार की स्त्रियाँ पुरूषों द्वारा शोषित की जा रही हैं। अब वे जो सौंदर्य के फूल को सम्हालते थे वही उस फूल की सुगंध को दुर्गंध में बदलने का कार्य कर रहे हैं।

     अब बात करते हैं उपाय की! अब तक आपने यह समझ लिया है कि बुद्धि और सौंदर्य परस्पर विरोधी तत्व हैं। ऐसे में क्या करें जिससे बुद्धिमान भी बन जाएं और सौंदर्य व आकर्षण भी बना रहे। यह प्रश्न यदि पुरूष से संबंधित है तो ज्यादा फिकर करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पुरूष के सौंदर्य को कोई नहीं देखना चाहता है, क्योंकि पुरूष बुद्धि प्रधान होता है इसलिए पुरूष की बुद्धि ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुरूष का शरीर कितना ही आकर्षक हो, यदि वह बुद्धिमान नहीं है तो मूढ़ ही समझा जायेगा। किंतु स्त्रियों के संबंध में बिल्कुल उल्ट मामला है। इसलिए स्त्रियों को इस मामले में बहुत सजग रहने की जरूरत है।

यह करें:
1. जानें कि शिक्षा इसलिए जरूरी है ताकि पुरूषों के शोषण से बचा जा सके!
2. कभी भी शिक्षा को सौंदर्य और भावनाओं से ऊपर न समझें!
3. शिक्षा के लिए कभी इतना गंभीर न हों जिससे वह मानसिक व्याधि बन जाए!
4. अनुभव करें कि शिक्षा समाज में पद-प्रतिष्ठित तो दिला सकती है किंतु प्रेम और समर्पण नहीं!
5. शिक्षा के लिए कभी प्रेम और समर्पण को कुर्बान न करें बल्कि यदि जरूरत पड़े तो प्रेम और समर्पण के लिए शिक्षा को कुर्बान कर दें!
6. इस बात का सदा ख्याल रखें कि स्त्री का सबसे बड़ा गहना उसके ह्रदय में भरा उसका प्रेम और समर्पण ही होता है।
7. शिक्षा और प्रेम दोनों का समन्वय बना रहे, इसलिए दोनों के लिए चिन्तित हों न केवल शिक्षा के लिए!
8. शिक्षा में असफल होने पर कभी दुख न प्रकट करें, बल्कि दुख तब प्रकट करें जब ह्रदय से प्रेम का दिया बुझ जाय और नेत्र आँसुओं से रिक्त हो जाएं।

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2 comments

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Hales
admin
January 8, 2019 at 7:24 AM ×

Awesome and interesting article. Great things you've always shared with us. Thanks. Just continue composing this kind of post. La cara oculta de Sigmund Freud

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