क्या गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या ने जानबूझकर किया था देवराज इंद्र से संभोग! practical life.

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     हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार (अहिल्या) सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी। वह इतनी रूपवान व आकर्षक थी कि उसे प्राप्त करने के लिए सभी देवता इंद्र आदि व्याकुल थे। इस प्रतिस्पर्धा के चलते ब्रह्माजी को अपनी पुत्री अहिल्या के विवाह के लिए एक  शर्त रखनी पड़ी थी। शर्त में ब्रह्माजी ने कहा था कि जो भी पुरूष तीनों लोकों की परिक्रमा करके सर्वप्रथम इस प्रांगण में आएगा अहिल्या उसे ही पति रूप में स्वीकार करेगी। देवराज इंद्र तीनों लोकों की परिक्रमा करके सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास पहुंचे थे और उन्होंने ही सबसे पहले अहिल्या को अपनाने का दावा प्रस्तुत किया था। बस थोड़ी ही देर में अहिल्या का देवराज इंद्र से विवाह होना निश्चित हो चुका था।

     तभी अचानक वहां नारदजी उपस्थित हुए, उन्होंने बताया कि तीनों लोकों की परिक्रमा इंद्रदेव से भी पहले गौतम ऋषि द्वारा पूर्ण की गई है। ब्रह्माजी के पूछने पर नारदजी ने कहा कि एक घने जंगल में एक गाय प्रसव की पीड़ा में कराह रही थी तभी गौतम ऋषि की उस पर दृष्टि पड़ी और वे भागकर उस गाय के समीप गए और उसके प्रसव में उसकी सहायता की। नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा 'भगवन, गाय की सेवा करना, तीनों लोकों के भ्रमण करने से भी अधिक महत्व वाली है। अतः अहिल्या पर इंद्रदेव का नहीं वरन् गौतम ऋषि का अधिकार है। यह सुनकर देवराज इंद्र बहुत दुखी हुए और अपना अपमान समझकर वहाँ से प्रस्थान कर गए।

     देवराज इन्द्र क्रोधवश वहां से चले तो गए किंतु अहिल्या को भोगने की चाह उनकी और भी अधिक बलवती हो गई, आठों पहर अहिल्या का रूप उन्हें सताने लगा। वह एक दफे अहिल्या को भोग लेना चाहते थे। इसी वजह से जब अहिल्या विवाह के पश्चात अपने पति गौतम ऋषि की कुटिया में रहने चली गई तब इंद्र प्रतिदिन उसे देखने उसकी कुटिया के पास जाया करते थे। इस तरह इंद्र उसकी ताकझांक करके अपने मन को सांत्वना दिया करते थे। इंद्र द्वारा की जा रही ताकझांक से गौतम ऋषि बिल्कुल ही अनजान थे, किंतु इंद्र ने उनके बारे में बहुत कुछ जान लिया था। उनका स्वभाव कैसा था, उनकी दिनचर्या क्या थी, इंद्र ने सब भली-भांति समझ लिया था।

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     पूर्व के काल में भोर (सुबह) का समय ज्ञात करने के लिए लोग घरों में मुर्गा पाला करते थे, वह ठीक पांच बजे जब रात विदा हो रही होती है और दिन आने की तैयारी कर रहा होता है तब बांग (आवाज) दे दिया करता था। गौतम ऋषि की कुटिया में एक मुर्गा था जो उन्हें पांच बजते ही उठा दिया करता था और वे गंगा स्नान के लिए प्रस्थान कर जाते थे। अपनी वासना को तृप्त करने के लिए इंद्र ने इसी मुर्गे का सहारा लिया था। कथा के अनुसार उन्होंने मुर्गे का रूप बनाकर नियमित समय से एक घंटा पूर्व ही बांग देकर गौतम ऋषि को जगा दिया था और फिर गौतम ऋषि का भेष बनाकर अहिल्या के कक्ष में प्रवेश कर गए थे।

     कहते हैं! अहिल्या ने इतनी शीघ्र स्नान करके लौटे पति गौतम के भेष में छुपे इंद्र को पहचान लिया था। किंतु उसे इस बात का घमंड हो गया था कि देवराज इंद्र उससे काम संबंध स्थापित करना चाहते हैं। क्योंकि वह इंद्र के वैभव व साम्राज्य के संबंध में जान चुकी थी। इसी कारण से उसने इंद्र का विरोध नहीं किया था। उधर गौतम ऋषि को सुबह का वातावरण देखकर शंका होने लगी थी। वे भी स्नान करके बड़ी शीघ्रता से कुटिया की तरफ लौटने लगे थे। अभी वह कुटिया के बाहर ही पहुँचे थे कि उन्होेंने इंद्र को कुटिया से निकलकर भागते हुए देखा, और पीछे अहिल्या संदिग्ध अवस्था में खड़ी थी। यह सब देखकर गौतम ऋषि आगबबूला हो गये। क्रोध में आकर बिना कोई प्रश्न पूछे ही उन्होंने अहिल्या को पत्थर होने का श्राप दे दिया। कालांतर में श्रीराम के चरण स्पर्श से उसका उद्धार हुआ था और वह पुनः स्त्री रूप को प्राप्त हुई थी। 

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टिप्पणी:

     अहिल्या की कथा सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि पौराणिक काल में स्त्रियों की दशा वर्तमान से भी ज्यादा दयनीय थी। उन्हें यह भी स्वतंत्रता नहीं थी कि वह अपनी इच्छा से वर का चुनाव कर सकें। यदि यह स्वतंत्रता अहिल्या को उपलब्ध होती तो इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वह इंद्रदेव से ही विवाह कर लेती। और शायद वह इंद्रदेव के प्रति प्रेम से भरी रही होगी इसीलिए वह विवाह के बाद भी उसे देखने उसकी कुटिया में आते रहें होंगे। यह मामला एकतरफा नहीं प्रतीत होता है। मेरी निगाह में अहिल्या का कोई दोष नहीं है, दोष गौतम ऋषि का है, जब नारदजी ने गौतम ऋषि को इसका पात्र बनाया था तभी उन्हें इंकार कर देना चाहिए था किंतु वे जानते हुए कि वह एक कुटिया में रहने वाले ऋषि हैं फिर भी उन्होंने अहिल्या से विवाह रचाया।

     अभी तक अहिल्या की कथा लिखने वालों ने अहिल्या को एक चरित्रहीन और धोखेबाज स्त्री बनाकर प्रस्तुत किया है किंतु मुझे अहिल्या में कोई दोष नहीं नजर आता है, किंतु वह एक पवित्रतम स्त्री थी, उसे नाहक ही पत्थर बनने का श्राप दिया गया। हिंदू धर्म ग्रंथों में अहिल्या को पंच-कन्याओं की श्रेणी में गिना जाता है। मान्यता है प्रातः काल में पंच-कन्याओं का स्वमरण और पूजन मनुष्य के तमाम दोषों को नष्ट करता है।


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