क्या है? नार्को टेस्ट! जानिए यह प्रयोग कैसे और किन लोगों पर किया जाता है? PRACTICAL LIFE.

क्या है? नार्को टेस्ट! जानिए यह प्रयोग कैसे और किन लोगों पर किया जाता है?
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      नार्को टेस्ट के बारे में आप सभी ने जरूर सुना होगा! इस टेस्ट की जरूर तब पड़ती है जब कोई व्यक्ति जो हम जानना चाहते हैं उसे या तो याद नहीं कर पाता है या फिर जानबूझकर जो हम जानना चाहते हैं उसे बताना नहीं चाहता है। ऐसी परिस्थितियों में नार्को टेस्ट का सहारा लिया जाता है। नार्को टेस्ट अधिकांश असमान्य अभियुक्तों पर ही किया जाता है, सामान्य श्रेणी के अभियुक्त डंडे के बल ही गहरे से गहरे राज उगल देते हैं।

      नार्को टेस्ट से प्राप्त परिणाम जरूरी नहीं है कि सभी मौकों पर सही ही पाए जाते हैं, संभावना यह भी रहती है कि नार्को टेस्ट के दौरान भी व्यक्ति सही-सही जानकारी जानबूझकर न दे, यह प्रक्रिया मुख्यतः व्यक्ति की चेतना की मूर्छा व अमूर्छा पर निर्भर होती है। इसलिए तमाम देशों में इस टेस्ट को अभी भी मुख्य धारा से नहीं जोड़ा गया है।

नार्को टेस्ट एक तरह का सम्मोहन होता है।

      करीब-करीब नार्को टेस्ट सम्मोहन जैसा ही होता है। सम्मोहन की प्रक्रिया में जो होता है वही इस टेस्ट की प्रक्रिया में भी होता है। सम्मोहन व नार्को में अंतर सिर्फ इतना है कि सम्मोहन व्यक्ति की इच्छा से होता है और नार्को जबरदस्ती भी संभव हो जाता है। जितनी भी माइंड रिग्रेशन थैरेपियां हैं वे सब सम्मोहन पर ही निर्भर हैं।
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नार्को टेस्ट से प्राप्त परिणामों की परख!

      नार्को टेस्ट से प्राप्त परिणाम सत्य हैं या असत्य हैं इसकी परख करना भी होता है मुश्किल! टेस्ट के दौरान व्यक्ति जो बातें अभिव्यक्ति कर रहा होता है वे सही हैं या गलत यह सिर्फ बाहरी जगत की घटनाओं व परिस्थितियों से मेल करने पर ही सत्य सिद्ध होती हैं। यदि टेस्ट के दौरान व्यक्ति ऐसी बातों को बोलता है जो बोले हुए के अनुसार बाहरी जगत की वास्तविकता से न मेल खाएं तो उसका बोला हुआ असत्य सिद्ध हो जाएगा और फिर वह व्यक्ति पकड़ में नहीं आयेगा।

यह टेस्ट कैसे होता है?

      इस प्रक्रिया में एक विषेश प्रकार का 'एनेस्थीसिया, व्यक्ति के शरीर में इंजेक्शन द्वारा इजेक्ट किया जाता है जो खून में मिलकर मस्तिष्क की उन स्नायुओं को अचेत कर देता है जो बाहरी उहापोह व तर्क-वितर्क करने वाले मन का प्रतिनिधित्व करती हैं। बाहरी 'मन, के अचेत होने के साथ ही चेतना भीतरी अन्तर्मन से संबंधित हो जाती है। इस अवस्था में व्यक्ति से जो कुछ भी पूछा जाता है वह उसका उत्तर एक निर्दोष बच्चे की भांति सही-सही देता है। क्योंकि उसका इन्कार करने वाला मन उस 'डोज, की वजह से पूरी तरह सुप्त अवस्था में जा चुका होता है। उसके उत्तरों को नोट कर लिया जाता है और फिर बाहरी घटनाओं से मिलान किया जाता है।
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      किन्तु जैसा मैंने कहा कि यह टेस्ट सभी मनुष्यों पर कारगर नहीं साबित होने वाला है। जिन मनुष्यों पर नार्को टेस्ट का प्रभाव न पड़ने की संभावना होती है, उन मनुष्यों में एक तो वे हो सकते हैं जो बड़े ही जिद्दी किस्म के होते हैं और दूसरे वे जो ध्यान साधना के प्रयोग से गुजर चुके हैं। नार्को टेस्ट का मुख्य हथियार व्यक्ति के ऊपरी मन को सुला देना होता है। ऐसे व्यक्ति जो ध्यान की गहराइयों में उतर चुके हैं या बड़े संकल्पवान अथवा जिद्दी हैं उनका ऊपरी मन इस तरह के इंजेक्शन से भी मूर्छित नहीं होता है। बहुत संभावना यह रहती है कि ऐसा व्यक्ति जानबूझकर इस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए और जो पूछा जा रहा है उसका उत्तर वह स्यमं के अनुकूल ही देने लग जाय। इसी खतरे को देखते हुए नार्को टेस्ट को अंतिम निर्णय के रूप में न प्रयोग करके एक सहयोगी के रूप में प्रयोग किया जाता है।
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