इसलिए झेलनी पड़ती है महिलाओं को मासिक धर्म की पीड़ा! PRACTICAL LIFE.

इसलिए झेलनी पड़ती है महिलाओं को मासिक धर्म की पीड़ा!

      इस जगत में घटने वाली प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक व अवैज्ञानिक कारण अवश्य ही होता है, अकारण इस जगत में कुछ भी संभव नहीं है। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान जिस पीड़ा से गुजरना पड़ता है उसका भी एक कारण है जो भगवत पुराण में वर्णित है। इस कथा के अनुसार किसी अज्ञात कारणों से देवताओं के गुरु बृहस्पति देवराज इंद्र से बहुत नाराज हो गए। फलस्वरूप उनके शिष्यों ने देवराज इंद्र के साम्राज्य पर चढ़ाई कर दी।
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      अपने प्राणों की रक्षा के लिए इन्द्र को अपना राज-पाट त्याग कर भागना पड़ा। बृहस्पति के क्रोधित शिष्य उनका पीछा करते रहे, उनसे पीछा छोड़ाने के लिए वे सृष्टि के सृजनकृता ब्रह्मजी के पास पहुंचे और उनसे मदद की गुहार लगाने लगे। ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र से कहा कि इनके क्रोध से बचने के लिए और अपना खोया हुआ राज-पाट पुनः प्राप्त करने के लिए तुम्हें किसी ब्रह्मज्ञानी की सेवा करनी पडे़गी। यदि वह ज्ञानी तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हुए तो निश्चित ही तुम्हें तुम्हारा खोया हुआ राज-पाट मिल जायेगा और गुरू बृहस्पति का क्रोध भी शान्त हो जायेगा।

      ब्रह्माजी की आज्ञानुसार इन्द्र देव एक ब्रह्मज्ञानी की सेवा में लीन हो गए, परंतु उन्हें यह बात नहीं मालुम थी कि जिस ब्रह्मज्ञानी की सेवा में वे रत हैं वह एक असुर  कुल की स्त्री की संतान है! इसी कारण उस ब्रह्मज्ञानी के मन में असुरों के प्रति बड़ा गहरा व अटूट लगाव भी था। इन्द्रदेव जो भी समाग्री ब्रह्मज्ञानी को प्रसन्न करने के लिए अर्पित करते थे उसे वह तत्क्षण अपनी माता को भेंट कर देता। जब यह बात इन्द्र को मालुम पड़ी तो वे गुस्से से आगबबूला हो गए और उस ब्रह्मज्ञानी की हत्या कर दी।
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      क्रोध में आकर इन्द्र ने ब्रह्मज्ञानी की हत्या तो कर दी किन्तु उन पर अपने गुरू की हत्या करने का पाप लग गया जो बहुत भयानक था और वह पाप एक राछस के रूप में इंद्रदेव का पीछा करने लगा। जब इंद्रदेव को कुछ न सूझा तब उन्होंने स्यमं को एक फूल के भीतर छुपा लिया और उसी फूल में बन्द होकर एक लाख वर्षों तक भगवान विष्णु की आराधना करते रहे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाप से मुक्त होने के लिए एक उपाय बताया।

      भगवान विष्णु द्वारा बताए गए उपाय के अनुसार इंद्रदेव को अपने पाप को चार भागों में बांटकर क्रमशः पृथ्वी, पेड़, जल स्त्री को देना था। इन्द्रदेव ने उन चारों से निवेदन किया, इंद्र की बात पर चारों सहमत तो हो गए परंतु उन्होंने एक शर्त भी रख दी। उस शर्त के अनुसार इंद्रदेव को पृथ्वी, पेड़, जल व स्त्री को बदले में एक-एक वरदान देना था। इस प्रकार इन्द्र ने अपने पाप का एक चौथाई हिस्सा पृथ्वी को दे दिया और बदले में पृथ्वी को यह वरदान दिया कि उस पर आई हुई कोई भी चोट स्वत: ही भर जायेगी! दूसरा चौथाई हिस्सा पेड़ को दिया, पेड़ को वरदान मिला कि वह यदि चाहे तो स्वयं को अपने आप ही जीवित कर सकता है। जल को पाप के बदले में वरदान मिला कि वह किसी वस्तु या स्थान को पवित्र कर सकता है, इसी वरदान के फलस्वरूप किसी भी वस्तु या स्थान को पवित्र करना हो तो जल झिड़का जाता है।
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      अब बारी थी स्त्री की, कथा के अनुसार स्त्रियों को जो प्रतिमाह मासिक धर्म की पीड़ा होती है वह इंद्र द्वारा दिए हुए पाप के फलस्वरूप ही होती है। बचा हुआ पाप का चौथाई भाग इंद्र ने स्त्री को दे दिया और यह वरदान दिया कि कामभोग के क्षण में स्त्री पुरूषों की तुलना में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेगी। इसलिए स्त्रियाँ कामभोग के समय में पुरूषों से ज्यादा आनंद प्राप्त कर पाती हैं।

      इंद्र द्वारा दिए गए गुरूहत्या के पाप के कारण ही स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान अपवित्र माना जाता है और इसी दोष की वजह से उन्हें धार्मिक स्थलों मंदिरों आदि में जाने के लिए प्रतिबंधित किया जाता रहा है। किन्तु अब उन पौराणिक कथाओं का कोई मूल्य नहीं रह गया है। आधुनिक युग में स्त्री-पुरुष को बराबरी का अधिकार मिला हुआ है, अब स्त्रियाँ किसी भी धार्मिक स्थल पर बिना किसी संकोच के जा सकतीं हैं। 

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