सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! दूसरे मर्दों के साथ अब शादीशुदा महिलाएं भी मना सकेंगी रंगरलिंयां। Our great policies.

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! दूसरे मर्दों के साथ अब शादीशुदा महिलाएं भी मना सकेंगी रंगरलिंयां।
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     अभी तक शादीशुदा मर्द ही दूसरों की पत्नियों के साथ गुलझर्रे उड़ाते थे। लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह साफ कर दिया गया है कि अब शादीशुदा महिलाएं भी दूसरे मर्दों से खुल्लमखुल्ला रंगरलिंयां मना सकेंगी और सबसे बड़ी बात यह है कि अब इस तरह की गतिविधियों में लिप्त महिलाओं को व्यभिचारिणी (Adulteress) नहीं माना जायेगा।

     एक तरफ जहाँ चरित्रवान महिलाएं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को शादीशुदा जिंदगी के लिए नासूर मान रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने वाली युवतियों व महिलाओं का कहना है कि यह निर्णय उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

इससे पहले क्या था प्रावधान!

     158 वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कानून भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के नाम से जाना जाता है। इस नियम के मुताबिक यदि कोई शादीशुदा स्त्री किसी अन्य शादीशुदा मर्द से अपनी इच्छा से शारीरिक संबंध बनाती है तो ऐसा संबंध अपराधिक माना जाता था। सीधे लफ्जों में कहें तो एक शादीशुदा स्त्री यदि किसी पराए मर्द से प्रेम आदि करके जो शारीरिक संबंध बनाती है वह संबंध अपराध की श्रेणी में आता है। 

     मजे की बात तो यह है कि अंग्रेजों द्वारा बनाए इस नियम के अनुसार ऐसी स्त्री जो पराई स्त्री के पति को फंसा कर रखती थी, उसे धारा 497, में दोषी न मानकर वह जिस पुरूष से समागम करती थी उसे दोषी बताया गया है। 

     वह पुरूष जिसके साथ वह महिला शारीरिक संबंध बनाती थी उसके खिलाफ कार्यवाही करके उसे दंडित करने का प्रावधान भी धारा 497 में दर्ज है। जो स्त्री पराए पुरूष से संबंध निर्मित करती थी उसके खिलाफ जो कार्यवाही होती थी वह भी इसी संबंध निर्मित करने वाली महिला के पति द्वारा ही जाती थी। अन्य किसी को यह अधिकार नहीं था, यहाँ तक कि उस पति की पत्नी भी इस व्यभिचारिणी स्त्री के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पाती थी जिसके पति को वह अन्य स्त्री अपने चंगुल में फंसाए रहती थी।

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     अब इस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है, सुप्रीम कोर्ट की दलील है कि स्त्री कोई वस्तु नहीं है जिस पर मालकियत होने का दावा पेश किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीशों ने कहा कि जो स्त्री अपनी इच्छा से किसी पुरुष से काम संबंध बनाती है उसे अपराध नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से अब अविवाहित युवतियों की तरह विवाहित महिलाएं भी बिना किसी डर या संकोच के पराए मर्दों को अपना बाॅयफ्रैंड बना सकेंगी। 

टिप्पणी:

     धारा 497, 158 वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा पारित बताई जाती है। जिसमें 'व्यभिचारिणी, शादीशुदा स्त्री को तो राहत प्रदान की गई थी किंतु जिसके पति को वह फंसा कर रखती थी उस महिला की पीड़ा की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है और न ही व्यभिचारिणीं के पति के बारे में कोई ख्याल किया गया है। मेरा मानना है, धारा 497 के रहने से शादीशुदा लोगों में एक भय था जो उनकी परिवारिक जिंदगी को एकजुट बनाए रखने में सहायता करता था। सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय लिया है वह वर्तमान परिस्थितियों की दृष्टि से सही हो सकता है किंतु परिवारिक नजरिये से ठीक नहीं है। जिस देश के पुरूषों की मानसिकता ऐसी हो कि पत्नी गैर-मर्द को देखकर मुस्करा भी न पाए उस देश में शादीशुदा महिलाओं को यह स्वतंत्रता प्रांणलेवा हो सकती है। 

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     मेरे ख्याल से धारा 497 अपने में ही एक प्रकार से नीम का पेड़ थी, उसे हटाकर सुप्रीम कोर्ट ने उस पर करेले का पेड़ चढ़ाने का कार्य किया है। एक तो नीम वैसे ही कड़वी होती है और उस पर यदि करेले का पेड़  चढ़ जाए तो आप समझ सकते हैं क्या हालत होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर आपकी क्या राय है, हमें ज़रूर बताएं। 




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