KYA AAP JANTE HAIN LOG SEVA. क्या आप जानते हैं लोग सेवा क्यों करना चाहते हैं।

KYA AAP JANTE HAIN LOG SEVA KARNA KYON CHAHTE HAIN. क्या आप जानते हैं लोग सेवा क्यों करना चाहते हैं।

      महाभारत में एक कथा आती है, जब युद्ध समाप्त हो गया और पाँडवों हिमालय की ओर प्रस्थान करने लगे रास्ते में एक जंगल पड़ता था वहाँ उन्हें श्रीकृष्ण मिल गए। श्रीकृष्ण को देखकर पाँडवों के मन में एक प्रश्न आया उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा! वासुदेव आप कहते हैं कलयुग आने वाला है, यदि यह सत्य है तो कृपया बताईये कलयुग को लोग कैसे पहचानेंगे, उसके लक्ष्ण क्या होंगे? क्या ऋतुओं की भांति कलयुग को भी मनुष्य पहचान सकेंगे? कृष्ण ने पाँडवों से कहा कि कुछ समय के लिए आप सभी जंगल में चले जांए और वहां जो कुछ भी द्रश्य हो वह आकर कहें, तत्पश्चात मैं आपके प्रश्न का उत्तर दूंगा। कृष्ण के कहने पर सभी पाँडव जंगल चले गए, वहां वे अलग-अलग दिशाओं में घूमने-फिरने लगे।

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       वहां उनमें से एक पाँडव ने एक ऐसी गाय देखी जो अपने बछड़े को चाँट रही थी और जहाँ-जहाँ वह चाँट रही थी वहाँ-वहाँ बछड़े के शरीर पर घाव हो जा रहे थे और उन घावों से खून की धाराएं बह रही थीं। दूसरे पाँडव ने एक ऐसा पक्षी देखा जोकि माँसाहारी था किंतु उसके पंखों पर वेदमंत्र लिखे हुए थे और वह दूसरे पक्षी का माँस खा रहा था, ऐसी ही अजीबोगरीब घटनाएं उन सभी पाँडवों ने देखीं, ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ देखकर पाँडव बहुत हैरान भी थे। वे श्रीकृष्ण के पास लौटे, और इन घटनाओं का मर्म पूछा! कृष्ण ने कहा यह घटनाएं कलयुग के आगमन का प्रतीक हैं, कलयुग में लोग ऐसे ही वर्ताव करेंगें, वह जो गाय है, जो अपने बछड़े को स्नेह से जीभ से सहला रही थी वह 'सेवाभाव, की प्रतीक है और वह जो पक्षी है, वह है तो माँसाहारी परंतु उसकी पीठ पर वेदमंत्र खुदे हैं वह 'धर्म, का प्रतीक है यह समस्त घटनाएं कलयुग की पहचान हैं।


       सो, देखते हैं! कलयुग की सेवा कितनी आग्रहपूर्णं है, लोग करते तो सेवा हैं, स्नेह हैं किन्तु वह जिसकी सेवा करते हैं, जिससे प्रेम करते हैं उसकी देह घावों से भर देते हैं और खून की धाराएं बहने लगती हैं किन्तु सेवकों को जरा भी रहम नहीं आता है वह अपनी सेवा जारी रखते हैं और लोगों को चांटते रहते हैं, लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं लेकिन उनकी पीड़ा कोई नहीं सुनता है। सेवा करने के लिए लोग एक-दूसरे के गले काट रहे हैं, सारी दुनियां में और खासकर भारत में सेवा करने की भावना लोंगो के भीतर बहुत तेजी से उबल रही है कोई भी सेवा करने का अवसर हाँथ से नहीं फिसलने देना चाहता है।

यह क्यों होता है? क्यों कुछ लोग दूसरों की इतनी सेवा करने के लिए उत्सुक दिखाई पड़ते हैं? पानी-पूरी वाले से लेकर, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक, सब क्यों कहते हैं कि 'एक बार सेवा का अवसर अवश्य दें,! आइये इसका मनोविश्लेषण करतें हैं और जानते हैं कि यह क्यों होता है, क्यों लोग दूसरों की सेवा करने के लिए इतना उतावले रहते हैं!

       सेवा की भावना प्रत्येक के ह्रदय में थोड़ी-बहुत मात्रा में प्राकृतिक रूप से विद्यमान ही रहती है, इसी सेवा की भावना से प्रेरित होकर लोग दूसरों के हित के लिए बहुत से कार्य करते हैं। पुराने समय में जो सक्षम होते थे वे राहगीरों के लिए सराय, मुसाफिरखाने, कुंए, तालाबों, बावड़ियों आदि का निर्माण करवाते थे। ऐसे वैद्य व हकीम होते थे जो सिर्फ सेवा की भावना से ही लोगों की दवाई-दरमत कर दिया करते थे और बदले में वे एक पाई भी नहीं लेते थे, जैसे सुषेन वैद्य थे, लुकमान थे, वात्स्यायन थे और अनेकों इसी प्रकार के व्यक्ति थे जो सिर्फ लोगों की भलाई के लिए ही समर्पित थे, सेवा के लिए उनका कोई आग्रह नहीं था।

झूंठी सेवाभावना:

      जब कोई मनुष्य स्वाभाविक सेवा भाव से किसी की सेवा करता है तब अपेक्षा नहीं होती है और न ही कोई आग्रह होता है। परंतु जब सेवा करने के लिए आग्रह होने लगे, मार-काट होने लगे, प्रतिस्पर्धा होने लगे तब समझना कि यह स्वाभाविक सेवा नहीं है, तब यह सेवा के नाम पर शोषण है! जैसा अभी हो रहा है, अभी जो सेवक हैं वे जबरदस्ती सेवा कर रहे हैं! यदि कोई सेवा करवाने के लिए राजी नहीं है तो उसे लोभ-लालच देकर राजी किया जा रहा है। यह सेवा वैसी ही है जैसी वह गाय अपने बछड़े की कर रही थी, वह गाय और बछड़ा तो प्रतीक है वास्तविक नहीं है, वास्तविक यह कलयुग के सेवक हैं।

सेवा करने के लिए सेवक मजबूर हैं, स्वतंत्र नहीं हैं!

      दुनियाभर में दिन-प्रतिदिन सेवकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और जिन मुल्कों में बेरोजगारी अधिक है वहां इन सेवकों की संख्या में बड़ी तेजी से इजाफा हो रहा है। कारण सेवा-भाव नहीं है, कारण बेरोजगारी है, भुखमरी है, जहां ज्यादा भुखमरी है, गरीबी है वहां की सरकारें गरीबों के लिए गरीब-कल्याण योजनाएं चलाती हैं और अरबों-खरबों रुपये उन योजनाओं पर खर्च करती हैं ताकि गरीबों को थोड़ी-बहुत सहायता मिल सके। यह सहायता पाने का ताना-बाना इतना जटिल होता है कि बिना किसी सेवक की मदत लिए कोई भी गरीब इसका लाभ नहीं उठा सकता है।

     लेहाज वह किसी न किसी सेवक की शरण में जाता है, यह सेवक कोई भी हो सकता है, दलाल कहें, बिचौलिया कहें, मुखिया कहें या जमींदार व शाहूकार कहें नाम कुछ भी देदें, नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता है। वह जो सेवक है कसूर उसका भी नहीं है क्योंकि उसकी भी अपनी वासनाएं हैं, इच्छाएँ हैं जिनकी पूर्ति उसे करनी है और उनकी पूर्ति के लिए धन चाहिए और धन कहीं आसमान से तो बरसता नहीं है वह तो पैदा करना पड़ता है, उपजाना पड़ता है। धन पैदा करने के लिए शक्ति चाहिए, सामर्थ्य चाहिए, आधुनिकता चाहिए, कारखाने चाहिए, मशीनरी चाहिए वह तो सभी के पास उपलब्ध नहीं है। जो उपलब्ध है उसी का उपयोग करते हैं, जुगाड़ करने की क्षमता है सो करते हैं।

       किसी भी मुल्क के उत्थान के लिए, उसकी प्रगति के लिए उस मुल्क की निर्माण शक्ति ही 'रीढ़, होती है। निर्माण शक्ति जितनी मजबूत होगी मुल्क उतनी ही त्वरा से आगे गति कर सकेगा। जिनके पास निर्माण करने के लिए, बेचने के लिए सिर्फ मुर्तियां और बातें ही होती हैं वे बाजार में खाली ही बैठे रहते हैं! जैसे मैं खाली बैठा हूँ! अब मेरे पास कोई भी ग्राहक नहीं आने वाला है, क्योंकि बेचने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है क्योंकि मेरे पास कुछ भी निर्माण करने की क्षमता नहीं है। अब यदि मुझे अपनी वासनाएं पूरी करनी हैं तो निश्चित ही मुझे किसी न किसी की सेवा करनी पडे़गी अर्थात शोषण करना पडे़गा अन्य कोई उपाय नहीं है, लेकिन मुझे अपनी वासनाएं नहीं पूरी करनी हैं क्योंकि मैं जानता हूँ कि वासनाएं मेरी नहीं हैं वे प्रकृतिक हैं किन्तु जो मैं जानता हूँ यह दूसरे भी जानते हैं यह जरूरी नहीं है।
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        इसलिए आज जो चल रहा है सेवा के नाम पर वह सेवा नहीं है, वह शोषण है, सेवा की आड़ में शोषण का खेल खेला जा रहा है! जैसे मछली पकड़ते हैं तो कांटे के ऊपर आटा लगा लेते हैं, मछलियां भूखी होती हैं और भूख अंधी होती है और जब पेट भूखा होता है तब सोंचने-समझने की शक्ति भी नहीं रहती है, भूखी मछलियां आटे के लालच कांटा निगल जाती हैं और फिर जो उनका पेट भरने आया था वही उन्हें निगल जाता है। इसी तरह शोषण के कांटे पर सेवा का आटा लगाया जाता है और एक दफे सेवक के चक्कर में फंस गए तो शोषण होना तय है, फिर उस शोषण से कोई भी नहीं बचा सकता है, और गरीब, मजबूर, मजदूर, भूखे बेचारे सेवकों के चंगुल में फंस ही जाते हैं, अपने भूखे पेट की वजह से, अतः जो शोषण के खिलाफ हैं उनसे मैं कहूंगा कि इन सेवकों को सेवा करने से रोको, इनसे कहो थोड़ा रहम करें, शोषण स्वत: ही मुरझा जायेगा।




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