जानिए! शिक्षा का परिणाम: Know the of education. PRACTICAL LIFE

जानिए! शिक्षा का परिणाम: Know the of education.

      किसी कार्य की निष्पत्ति ही कसौटी है, परिणाम ही परख है, कहते हैं - अंत भला, तो सब भला! मार्ग की सफलता का मूल्य नहीं है! मंजिल पर पहुंचना ही उपलब्धि है!
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      जब मैं देखता हूँ, सुबह की भोर में दुधमुंहें बच्चों को शिक्षा के नाम पर स्कूलों की तरफ़ घसीटते हुए अविभावकों को, समाज को, शिक्षकों को, तो मन कौतूहल से भर जाता है!

    अगर विशेषज्ञों से पूँछगें तो वे सिद्ध कर देंगे, वे समझा देंगे कि शिक्षा बचपन से ही अनिवार्य है अन्यथा बच्चे बिगड़ जाते हैं! उनके तर्क सभी की समझ पर भारी पड़ रहें हैं! मैं जो कह रहा हूँ, वह शिक्षा के विरोध में नहीं है, वह शिक्षा के नाम पर हम जो मासूमों को यातनाएं दे रहे हैं उसके विरोध में है! शिक्षा तो प्रत्येक को मिलनी ही चाहिए वह बुनियादी ढांचा है लेकिन शिक्षा के नाम पर जो शोषण हो रहा है वह नहीं होना चाहिए वह जहर समान है।

     दुनियां में जितने भी प्रतिभाशाली व्यक्ति हुए हैं, उनमें से किसी ने भी कक्षा एक से नीचे की पढ़ाई नहीं की है! क्योंकि वे सब सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे! सरकारी स्कूलों में कक्षाएं सदा एक से ही शुरूं होती रहीं हैं। अभी भी सरकारी स्कूलों में वह व्यवस्था नहीं है जहां शून्य से ही बच्चों को शिक्षा दी जा सके, बहस हुई है खूब, लेकिन हर बार सवाल यह खड़ा हो जाता है कि उन दुधमुंहे बच्चों की देखभाल कौन करेगा? कौन उनकी गंदगी साफ करेगा? क्योंकि सरकारी शिक्षक स्वयं ही बच्चों से गंदगी साफ करवाते रहें हैं! इसलिए कोई निर्णय नहीं हो पा रहा है!

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       आप यह भली-भांति जान लें, इस तरह की शिक्षा से कोई किसी तरह की प्रतिभा का उदय नहीं होता, इस तरह की शिक्षा सिर्फ अजीविका जुटाने के लिए सहयोगी है! दुनियां में कितनी शिक्षा दी जा रही है, कितना स्कूलों में शोर मचता है! लेकिन परिणाम क्या होता है? आप शायद जानते नहीं होंगे, बगदादी ने जब हजारों यजीदी महिलाओं को बंधक बनाया और विश्व भर के युवाओं को न्योता दिया कि आओ और मौज-मस्ती करो तो पूरे विश्व के युवाओं में भगदड़ मच गई! और दुनिया भर से इतनी बड़ी फौज वहं युवाओं की इकठ्ठी हो गई कि अमेरिका व रूस जैसे देश सालों से उस फौज से लड़ रहे हैं! उनमें से कोई भी अशिक्षित नहीं था!

       वास्तव में शिक्षा का कोई भी संबंध प्रतिभा से, सफलता से, बुद्धिमत्ता से नहीं है! अपढ़ आदमी भी सफल हो सकता है, बुद्धिमान हो सकता है! कबीर साहब का वचन है, "काकद मसी छुओ न हांथ" काकज और स्याही कभी हांथ से भी नहीं छुई, फिर भी जो कह गए उसको आज भी लोग समझ रहें हैं! तो फिर प्रश्न उठता है, यह जो मुहिम चल रही है, जो आन्दोलन चल रहा है, जो उत्साह भरा जा रहा है शिक्षा के लिए वह किस लिए है! वह मेरी समझ में, बेरोजगारी है, बेगारी है, सरकारों की नाकामी है! बुद्धिजीवियों की मूढ़तापूर्ण नीतियों का परिणाम है! लेकिन यह दिखाई नहीं पड़ता "जीसस" ने कहा है लोगों को अपनी आंख का लट्ठ नहीं दिखाई पड़ता लेकिन दूसरों की आंख का तिनका खरकता है!
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कहते हैं, शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती है! फिर क्यों इतनी कम उम्र में ही घसीटा जाता है स्कूलों तरफ!


     सन् 2002 में भारत सरकार की तरफ से एक मुहिम चलाई गई थी जिसमें बूढ़े लोगों को भी शिक्षित करने की योजना शामिल थी। इस अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में आठवीं पास युवक-युवतियों का चयन किया गया था, वे गांवों के बूढ़े-बुर्जग लोगों को एक स्थान पर इकठ्ठा करके 'कखग, सिखाते थे।

      जो लोग समझते हैं कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं है, सीखने का अंत नहीं है, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि शिक्षा की भी एक आयु है, समय है! एक समय होता है जब मस्तिष्क विचारों को ग्रहण करता है! भिन्न-भिन्न विषयों को आत्मसात करने के लिए भिन्न-भिन्न अनुकूल परिस्थितियां हैं, समय है, आयु है। नर्सरी से लेकर कक्षा एक तक जो बच्चों को सिखाया जाता है वह उस उम्र में बिल्कुल ही गैर-जरुरी है। अभी से बच्चों को स्कूलों की तरफ इतनी गंभीरता से घसीटना उनके भले के लिए नहीं है! हमारी अजीविका के लिए है, यह लोगों की रोजी-रोटी के साधन के लिए है, व्यवसाय के लिए है! और व्यवसाय किसी के भले के लिए नहीं होता!

      इसलिए देखते हो निजी स्कूल बिल्कुल निर्भर हैं लूट-घसोट पर, जरा भी रहम नहीं है, और लोग खूब गद्गद होते हैं! क्योंकि उनकी कुछ समय के लिए झंझट मिट जाती है, बच्चा घर में रहेगा तो कुछ न कुछ उपद्रव करेगा, कुछ सामान वगैरह इधर-उधर पटकेगा। बच्चे के न रहने पर अभिभावकों को भी सुविधा मिलती है।

      मेरा निवेदन है, स्कूल संचालकों से, अभिभावकों से, अध्यापकों से, शिक्षकों से, थोड़ा रहम करें, थोड़ा नरम रहें! इन ऩन्हें-मुन्ने निर्दोषों पर थोड़ी दया करें! नहीं तो ये तुम्हें कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे! इन्होंने अपना बचपन कुर्बान कर दिया है, तुम्हारी बेरोजगारी के कारण! तुम्हारी बेगारी इन्हें ममता के सन्निध्य में नहीं रहने देती!

अच्छी माँ, वह नहीं है जो कहती है बेटा धूल में न खेलो क्योंकि कपडे़ गंदे हो जायेंगे, अच्छी माँ, वह है जो कहती बेटा जी भरकर खेलो ताकि तुम्हारे गंदे कपड़े साफ करने का मुझे अवसर मिले!

   आपने सुना होगा कृष्ण बाल्यावस्था में बड़े ही नटखट थे! रोज किसी न किसी मटकी से दही निकालकर खा जाते थे, माता यशोदा को रोज उल्हाने सुनने पड़ते थे, परन्तु वे कृष्ण की इन हरकतों से नाराज नहीं होतीं थीं दूसरों को दिखाने के लिए वे कृष्ण को डांटती-डपटती अवश्य थीं किंतु मन ही मन वे प्रसन्न होती थीं क्योंकि इसी बहाने उन्हें कृष्ण को नहलाने-धुलाने और उनके वस्त्र साफ करने का अवसर मिल जाता था। जिस दिन कृष्ण कोई उपद्रव न करते उस दिन माता यशोदा का मन दुखी हो जाता। धन्य है वह माता, जिसे अपनी संतान की स्वतंत्रता प्रिय है।

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