कुत्रिम गर्भाधान! इस तकनीक से बिना किसी पुरुष से संभोग किए ही स्त्री बन जाती माँ!


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      मां बनने का सुख किसी भी स्त्री के लिए सबसे बड़ा सुख होता है, जिस स्त्री में मां बनने की संभावनाएँ नहीं होती हैं उनकी परिवार में तो उपेक्षा होती ही है और समाज भी उन्हें सदा टेढ़ी नजर से ही देखता है। होना नहीं चाहिए यह! परन्तु यह होता है। मनुष्य की बुद्धि कितनी ही विकसित क्यों न हो जाये, किन्तु जो संस्कार सदियों-सदियों से सींचे गये हैं उन्हें  इतनी आसानी से नहीं सुखाया जा सकता है।

      बुराई चाहे हमारे भीतर चित्त में हो या बाहर समाज में, उसे यदि समाप्त करना है तो बिना तकनीक का सहारा लिये सिर्फ धार्मिक बकवास और आध्यात्मिक प्रवचनों व उपदेशों के बल पर नहीं समाप्त किया जा सकता। यह जो तकनीक है, कुत्रिम गर्भाधान की! यह महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
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       इस तकनीक का प्रयोग विशेषकर उन महिलाओं पर किया जाता है जिनके गर्भाशय में अंडे या तो बनते ही नहीं हैं या फिर अंडवाही नालियां किसी कारणवश बंद हो जाती हैं। कभी-कभार पुरुष के कमजोर शुक्राणुओं की वजह से भी इस तकनीक को प्रयोग में लाया जाता है क्योंकि कमजोर शुक्राणु स्त्री के अंडाशय तक पहुंच ही नहीं पाते हैं।

कैसे होता है कुत्रिम गर्भाधान? इस तकनीक का प्रयोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में, अलग-अलग तरीकों से किया जाता है।

गर्भ-नालिकांऐं बंद होने पर! जब महिला की गर्भ-नालिकाऐं बंद हो जाती हैं और पुरूष का वीर्य महिला के अंडाशय तक नहीं पहुंच पाता है तब इस तकनीक द्वारा महिला के अंडे को अंडाशय से निकलकर बाहर एक कुत्रिम पात्र में पुरुष के वीर्य से मिलाप कराया जाता है! जब पुरुष के शुक्राणुं अंडे में प्रविष्ट हो जाते हैं और निषेचन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है तब उस अंडे को महिला के गर्भ में स्थापित कर दिया जाता है, जिससे वह महिला एक स्वस्थ बच्चे की मां बन जाती है। कुत्रिम गर्भाधान की तकनीक में यह विधि सबसे ज्यादा कारगर मानी जाती है।
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अंडाशय में अंडे न बनने पर! जब महिला के अंडाशय में अंडे बनने की प्रक्रिया बन्द हो जाती है या जन्म से ही अंडे नहीं बनते हैं, तब इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में किसी अन्य महिला से अंडे दान में लिए जाते हैं और उन अंडों को इच्छित महिला जिसे कि बच्चे की आवश्यकता होती है उसके पति के वीर्य से उपरोक्त प्रक्रिया द्वारा निषेचित कराया जाता है और फिर उस इच्छुक महिला के गर्भ में रख दिया जाता है। इस प्रक्रिया से वह महिला भी मां बन जाती है जिसके भीतर अंडे नहीं बनते हैं।

      कई मामलों में दम्पति अर्थात पति व पत्नी दोनों ही किसी असाध्य रोगों के कारण सक्षम होते हुए भी बच्चा जनने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि संभावना यह रहती है कि जो बच्चा पैदा कर रहे हैं, उनका रोग उस पैदा हुए नवजात को भी लग सकता है! ऐसी परिस्थितियों में भी कुत्रिम गर्भाधान से बच्चा उत्पन्न किया जाता है, और उस दम्पत्ति को संतान सुख उपलब्ध कराया जाता है।

      वर्तमान समय में तो यह तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि अब इस क्षेत्र के बाजारों में बीज रूप में 'वीर्य, भी उपलब्ध है! जैसे हम उन्नत फसलों के लिए बाजार से अच्छा बीज खरीदते हैं उसी प्रकार एक स्वस्थ बच्चे के लिए अच्छा स्पर्म भी उपलब्ध है।

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