SATY KI PUKAAR SWAMI VIVEKANAND. सत्य की पुकार, Swami Vivekanand.

     
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     समय की लहरों के साथ निरंतर उठते और गिरते जिंदगी के ज्वार भाटे के साथ साथ ये क्षणिक दृश्य एक पर एक आते-जाते हैं।

     आह! इस अप्रतिहत प्रवाह से कितनी थकान हो आई है, मुझे ये दृश्य बिल्कुल भी नहीं भाते हैं।

      यह अनवरत बहाव और पहुंचना कभी नहीं,
यहां तक कि तट की दूर की झलक भी मिलती नहीं, जन्म जन्मांतरों में उन द्वारों पर व्याकुल प्रतीक्षा की है मैंने, किंतु हाय वे नहीं खुले!

     प्रकाश की एक किरण भी पाने में असफल ये आंखें पथरा गई हैं, जीवन के ऊंचे और संकरे पुल पर खड़े होकर नीचे झांकता हूं, और देखता हूं! संघर्ष करते भागते और हंसते हुए लोगों को किस लिए कोई नहीं जानता।

     वह देखो सामने काल त्योरी चढ़ाए अड़ा है और कहता है आगे कदम ना रखो यही सीमा है, भाग्य को ललचाए मत, सहन करो, जितना कर सको! जाओ उन्हीं में मिल जाओ और यह जीवन का प्याला पीकर उन जैसे ही पागल बन जाओ! जो जानने का साहस करता है, दुख भोगता है! तब रुको और उन्हें के साथ ठहरो,

    आह! मुझे विश्राम भी नहीं है! यह बुलबुले सी भटकती धरती, इसका यह खोखला रूप, खोखला नाम, इसके खोखले जन्म मरण ये सब निरर्थक है मेरे लिए! पता नहीं नामरूप परतों के पार कब पहुंचूंगा! खोलो द्वार खोलो, मेरे लिए उन्हें खुलना ही होगा! ओ, मां प्रकाश के द्वार खोलो, मां तुम्हारा थका हुआ बालक हूं मैं, मैं घर आना चाहता हूं! घर आना चाहता हूं! अब मेरा खेल समाप्त हो चुका है। तुमने मुझे अंधेरे में खेलने को भेज दिया और भयानक आवरण ओढ़ लिया, तभी आशा ने भी संग छोड़ दिया, और भय ने आतंकित किया तभी से यह खेल एक कठिन कर्म बन गया।

    इधर से उधर लहरों के थपेड़े झेलना, उद्यम लालसाओं और गहन पीड़ाओं के उफनते हुए उत्ताप तरंगों से पूर्ण महासमुद्र में, सुखों की आशा में जहां जीवन मर्त्यु सा भयानक है, जहां मर्त्यु फिर नया जीवन देकर उसी समुद्र की लहरों में सुख-दुख के थपेड़े सहने के लिए ढकेल देती है।

     यहां बच्चे सुनंदर चमकीले स्वप्न देखते हैं, जो सिर्फ धूल में ही मिले हैं! जरा पीछे मुड़कर देखो, खोया हुआ जीवन जैसे जंग की ढेरी है,

     बहुत देर हो जाने पर उम्र को ज्ञान मिलता है, जब पहिया हमें बहुत दूर पटक देता है।

     नए स्फूर्त जीवन अपनी शक्तियाँ इस चक्र को पिला देते हैं, जो अनवरत चलता रहता है! दिन पर दिन, वर्ष पर वर्ष!

     यह माया है सिर्फ एक खिलौना! झूंठी आशाओं, इच्छाओं और सुख-दुख के आरों से बना यह पहिया!

     मैं भटका हूँ, पता नहीं कहाँ चला जाऊँ! मुझे इस आग से बचाओ, रक्षा करो! दयामयी माँ! इन इच्छाओं में बहने से बचाओ! अपना भयानक रौद्र रूप न दिखाओ माँ! मेरे लिए यह असहनीय है, मुझ पर कृपा करो, करो! माँ मेरे अपराधों को सहन करो।

     माँ मुझे उस तट पर पहुंचाओ, जहां संघर्ष न हो, इन पीड़ाओं, इन आंसुओं और इन भौतिक सुखों के पार, उस तट पर जिस तट की महिमा ये रवि, शशि, उड्डयन और विद्युत भी नहीं अभिव्यक्ति कर पाते, महज उसके प्रकाश का प्रतिबिंब ही लिए फिरते हैं।

     ओ, माँ मगृ-विपासा के समान मेरे ये स्वप्नों के आवरण तुम्हें देखने से मुझे न रोक सकेंगे।

     मेरा खेल अब खत्म हो रहा है, हे दयामयी माँ, अब ये श्रंखला की कड़ियाँ तोड़ो, मुक्त करो मां, मुक्त करो... मुक्त करो........!


आपका निरीह बालक 'नरेंद्र,    स्वामी विवेकानंद

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