PREMI. प्रेमी क्यों जानना चाहते हैं, अपनी प्रेयसी के सारे 'राज, पढ़िए, दुनियाँ की सबसे अनूठी प्रेम कथा!

प्रेमी क्यों जानना चाहते हैं, अपनी प्रेयसी के सारे 'राज, पढ़िए, दुनियाँ की सबसे अनूठी प्रेम कथा!


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     दोस्तों, इस जगत के प्रेमियों की सबसे बड़ी पीड़ा, सबसे बड़ा दुुुःख, सबसे बड़ी बेचैनी यही है  कि वे जिसे प्रेम करते हैं या जो उनकी प्रेयसी है, वे उसके सारे 'राज, जान लेना चाहते हैं। ऐसी कोई भी लड़की व लड़का न होगा जो अपने प्रेम के बारे में सब-कुछ न जान लेना चाहता हो! जब भी किसी ह्रदय के द्वार पर कोई पहली दफे प्रेम की सौगात लेकर दस्तक देेता है, तो मन अनायास ही पूंछ बैठता है! कौंन हैं आप? जब-तक वह अपना परिचय नहीं बता देता, तब-तक किसी का भी ह्रदय उसे दहलीज़ के इस तरफ आने की इजाजत नहीं देता है।
   
     फिर वह अपनी सारी जानकारी दर्ज करवाकर ह्रदय के भीतर प्रवेश करती है और उसे अपना घर समझकर चुप हो जाती है। मन बार-बार उसकी चुप्पी को तोड़ता है और उसे अपने संबंध में और अधिक बताने के लिए कहता है, फिर वह अपने सारे राज बता देती है! बचपन से लेकर अब तक का सारा लेखा-जोखा उसे सौंप देती है, परन्तु फिर भी मन संतुष्ट नहीं होता, वह और जानना चाहता है, वह उसके विषय में सब-कुछ जानना चाहता है।

     प्रेम की कसौटी, प्रेम की परख भी यही है। जब कोई ह्रदय तुम्हारे संबंध में बहुत कुछ जानने के लिए आतुर हो जाए तो तुम तत्क्षण ही समझ जाना कि अवश्य ही वह ह्रदय तुम्हारे आलिंगन का विपासु है। 


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उर्वशी और पुरूरवा का अनूठा प्रेम:

     हिन्दू ग्रंथों में एक बड़ी ही अनूठी कथा वर्णित है, कथा है कि इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी के ह्रदय में एक दिन अचानक प्रेम-भावनाएं उमड़ी, वह किसी पुरूष के प्रेम व आलिंगन के लिए तड़फड़ाने लगी! स्वर्ग में प्रेम की अनुपस्थिति के कारण वह देवराज इंद्र के समक्ष उपस्थित हुई, उसने इंद्र से अपनी व्यथा कही और पृथ्वी पर जाकर किसी पुरूष से प्रेम करने की अनुमति मांगी। इंद्र ने उसे आज्ञा तो देदी, लेकिन बड़ी चतुराई से उन्होंने उस आज्ञा में एक शर्त भी जोड़ दी! शर्त के अनुसार इंद्र ने उर्वशी से कहा कि तुम जिस युवक से प्रेम करना कदापि उसे कभी अपना परिचय न बताना, जिस क्षण तुम अपने बारे में पृथ्वी पर मौजूद किसी प्रांणी से कहोगी उसी क्षण तुम्हें पृथ्वी त्यागनी पड़ेगी। 

     दोस्तों, ह्रदय में घुमड़ते प्रेम के बादलों की गड़गड़ाहट में वह इंद्र की चतुराई को न समझ सकी! आज्ञा मिलते ही वह किसी पिंजड़े से मुक्त हुई मैंना की भांति स्वर्ग से उड़कर पृथ्वी पर आ गई। पृथ्वी पर वह कई दिनों तक किसी विरहिन की भांति भटकती रही, परन्तु उसे वह पुरूष न मिल सका जो उसकी प्रेम की क्षुधा को आलिंगन कर लेता! आशा का दामन ओढ़े एक दिन वह एक दरख्त की ओट लिए बैठी थी, तभी वहां से एक युवक निकला, वह देखने में बहुत ही आकर्षक व शांत स्वभाव का प्रतीत होता था, कहानी में इस युवक का नाम 'पुरूरवा, बताया गया है। उर्वशी को देखकर वह ठिठका, जैसे ही उसने उर्वशी से कुछ कहने के लिए अपना मुख खोला, वैसे ही दौड़कर उर्वशी ने अपने कोमल हांथ पुरूरवा के मुख पर रख दिए, और यह 'वचन, कहकर उससे लिपट गई कि वह उससे यह कभी न पूंछे कि वह कौंन है? 


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     उर्वशी के हांथों की छुअन और उसकी नाजुक देह से आ रही गंध ने पुरूरवा को हैरत में डाल दिया। ऐसी गंध, ऐसी कोमलता उसने पृथ्वी पर किसी जन्म में भी न अनुभव की थी। पुरूरवा और उर्वशी का यह मिलन इस पृथ्वी पर बड़ा अनूठा था, क्योंकि यहां दो दिलों के साथ-साथ ही दो आयामों का भी मिलन हो रहा था। उर्वशी के प्रेम व यौवन ने पुरूरवा के ह्रदय में स्थान तो पा लिया था परंतु उसका मुख बन्द करके उसने उसके मस्तिष्क में संदेह का बीज भी आरोपित कर दिया था। शनैः शनैः उन दोनों का प्रेम और भी घनिष्ठ होता चला गया।

     उर्वशी ने पुरूरवा को इतना प्रेम से सराबोर कर दिया कि उसने उसकी कही हुई बात ही बिसार दी! अब वह स्यमं ही उर्वशी को इतना चाहने लगा था कि उससे अलग होने के ख्याल मात्र से ही उसके प्रांण सूखने लगते थे। भरोसा इतना था कि अब अगर वह पूंछ भी ले कि वह कौंन है तो भी कोई हानि नहीं होने वाली थी। किंतु: शायद! इंद्र मनुष्यों के स्वभाव से अधिक अवगत रहे होंगे, वे जानते रहे होंगे कि मनुष्य अन्य किसी के संबंध में भले ही न जानना चाहे, परन्तु जिसे वह प्रेम करता है उसके विषय में वह अवश्य ही जानना चाहेगा! 

पुरूरवा को छोड़कर उर्वशी का जाना :

     परिणाम स्वरूप एक रात की भोर में, जब उर्वशी के मादक नेत्र अपनी पलकों की पंखुड़ियों को खोल रहे थे और उसके हांथ अंगड़ाई लेने की इच्छा से पुरूरवा के बाहुपाश से स्यमं को मुक्त करने की चेष्टा कर रहे थे। तभी अचानक पुरूरवा ने उर्वशी के मुलायम जिस्म को अपनी मजबूत बाहों से जकड़ लिया और उसके केशों को सहलाते हुआ पूंछ बैठा! जैसे ही उसने कहा, हे प्रिये, मेरा मन तुम्हारे संबंध में जानने के लिए आतुर है, वैसे ही उर्वशी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और वह उदास मन से पुरूरवा को छोड़कर स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गई। 


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     उड़ते समय पुरूरवा ने उसका आंचल पकड़ लिया था, उर्वशी ने वह आंचल पुरूरवा के हांथ में ही छोड़ दिया था, कहते हैं, वह आंचल लिए पुरूरवा आज भी उर्वशी की बाट जोह रहा है, इस आशा में कि शायद वह पुन: लौट आए। मित्रों, यदि पुरूरवा कहीं मिले तो उससे कहना कि इस जगत में पुनरावर्ति असंभव है। 

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