pachaas varsh kee umr mein bhee rahenge yuaa. बृद्धावस्था के कष्ट से बचने का उपाय:

पचास वर्ष की उम्र में भी रहेंगे 'युवा, अगर करेंगे यह काम! जानिए, क्यों दिया जाता है शांति का संदेश! 

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     प्रिय मित्रों, इस जगत में सभी कुछ अनित्य व परिवर्तनशील है। अभी तक इस अनंत आस्तिव में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं मिला है जो स्थिर हो, प्रत्येक वस्तु यहां परिवर्तनशील है, यह हमारा शरीर भी स्थिर नहीं है, यह भी प्रतिपल बदल रहा है, रोज करोड़ों-करोड़ों तंतु टूटते और बनते हैं। लेकिन कभी हमें इसका आभास नहीं होता है। हम यह भी नहीं जान पाते कि कब हम बचपन से जवानी में पहुंच गए और कब जवानी बुढ़ापे की तरफ सरक गई, फिर वह दिन भी आता है जब एक-एक कदम उठाने के लिए भी विचार करना पड़ता है, प्रयास करना पड़ता है, हिम्मत जुटानी पड़ती है तब जाकर उस दरवाजे तक पहुंच पाते हैं जहां पच्चीस दफे दौड़-दौड़कर हांथ धोया करते थे। 

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     न जवानी का पता चलता है, न बुढ़ापे का! अतीत में झांककर देखते हैं तो जो गुजर गया है वह सिर्फ एक सपने जैसा लगता है। और जो बृद्ध हैं वे सिर्फ सपने ही देखते हैं और सपने भी उसी के देखते हैं जो बीत गया है, उनको कभी भविष्य के स्वप्न नहीं आते हैं, बृद्धावस्था में जिन्हें भविष्य के सपने आते हों तो समझ लेना वे अभी बृद्ध नहीं हुए हैं, उनकी मर्त्यु अभी दूर है। बृद्धावस्था का सबसे गहरा दुख: यही है कि भविष्य समाप्त हो जाता है, और भविष्य का समाप्त हो जाना ही मर्त्यु है। बृद्धावस्था में सारी चेतना, सारी ऊर्जा वर्तमान में इकठ्ठी हो जाती है। चेतना तभी तक बाहर दौड़ती है जब तक देह स्वस्थ है, जरा सा देह में काँटा गड़ा कि भविष्य की फिकर मिट जाती है। बृद्धावस्था इस जीवन का सबसे बड़ा कांटा है, यह जिसके चुभा है, उसको ही इस चुभन की पीड़ा का, इस कष्ट का पता चलता है। 

     बालपन और बृद्धापन दोनों ही असहाय अवस्थाएं हैं। लेकिन बालपन की असहायता में भविष्य है, भविष्य की आशांए हैं, उम्मीदें हैं, इसलिए बालपन की असहायता अखरती नहीं है। किन्तु बृद्धावस्था की असहायता में न भविष्य है, न ही भविष्य में कोई आशा है न ही उम्मीद है। इतनी भी आशा नहीं है कि आज किसी का हांथ पकड़कर दो पग चल लिए हैं तो कल स्यमं ही उठकर चल-फिर लेंगें। दोस्तों प्रैक्टिकल लाइफ में जो परिवर्तनशीलता की गति है उसे तो रोकना असंभव है। लेकिन इस परिवर्तन की गति को हम धीमा जरूर कर सकते हैं। 

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बृद्धावस्था के कष्ट से बचने का उपाय:

     इसी विकल्प का उपयोग करके योगीजन इस पृथ्वी पर बिना बृद्धावस्था के कष्ट को उपलब्ध हुए अपनी पूर्ण आयु जिया करते थे। इस तथ्य के वैज्ञानिकों के पास प्रमाण भी मौजूद हैं, खोजकर्ताओं को ऐसे तमाम लोगों के कंकाल मिले हैं जिन्हें देखकर लगता था कि मर्त्यु के समय उनकी आयु तीस-पैतिंस वर्ष से ज्यादा नहीं रही होगी। लेकिन जब उनकी साफ-सफाई करके आधुनिक यंत्रों से जांच-पड़ताल की गयी तो मालुम पड़ा कि उन्होंने सौ वर्ष से भी अधिक का जीवन जिया होगा। 

     मित्रों, जैसी आज प्रतिस्पर्धा सिर्फ धन संग्रह के लिए होती है, जैसी मारामारी रोजी-रोटी के होती है, ऐसी ही प्रतिस्पर्धा और मरामारी कभी ध्यान, धर्म और पवित्रता के लिए हुआ करती थी, तब रोजी-रोटी का उतना बड़ा प्रश्न नहीं था। तब लोग धन संग्रह करते थे धर्म के लिए, अब धर्म करते हैं इसलिए ताकि धन जमा कर सकें। धर्म की प्राथमिकता थी, पहले धर्म कमाया जाता था फिर पीछे समय रहता था तो धन कमाया जाता है। अभी उसका उल्टा नियम है, वे लोग हमसे ज्यादा बुद्धिमान थे, क्योंकि वे जानते थे कि धर्म की दौड़ में जो शामिल हैं वे अवश्य ही पहुँचेगे और जो धन की दौड़ में शामिल हैं वे कभी नहीं पहुंच सकते, धन की यात्रा कभी भी पूरी नहीं होती है। 

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     यदि आप चाहते हैं कि बिना बृद्धावस्था के कष्ट झेले अपनी आयु पूर्ण कर लें, तो आज से ही ध्यान का शुभारंभ कर दें! एक चादर और चटाई अलग कर लें, उसे रोजमर्रा के कपड़ों में न शामिल करें। सुबह की भोर में आधा घंटा और संध्या के समय भोजन से पहले आधा घंटा प्रतिदिन बुद्धासन में बैठें, कुछ करें न सिर्फ बैठें, शान्त होकर, मौन होकर आप जितना ही शान्त और मौन होंगें उतना वह परिवर्तन भी शान्त और धीमा होगा। यह शायद शांति का संदेश देने वाले लोगों को पता है या नहीं लेकिन जो यह शांति का संदेश दिया जाता है यह इसीलिए दिया कि आप जितना शांत होते हैं उतनी ही धीमी गति से आपके जीवाणु, आपके हार्मोन परिवर्तित होते हैं। अशांत व्यक्ति अपनी आयु से पूर्व ही बृद्धावस्था को उपलब्ध हो जाता है। 

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