Kundlini sakti Bhag-3 जानिए मनुष्य के पास स्थूल शरीर के अलावा और कितने शरीर होते हैं!

पहले के अध्याय में आप जान चुकें हैं कि यह भौतिक शरीर ही हमारा अकेला शरीर नहीं है, इसके अलावा और भी न दिखाई देने वाले सूक्ष्म शरीर हैं। 

     यहां हम एक-एक करके उन शरीरों व उनके चक्रों के विकासक्रम के बाबत जानेंगें! सबसे पहले जानेंगें कि उन सात शरीरों के नाम क्या हैं? और उनका विकास न होने की स्थिति में क्या-क्या लक्षण प्रकट होते हैं? 

https://www.paltuji.com
Practical life 
     पहला शरीरभौतिक शरीर, यह पहला व मूल शरीर है, जिसे हम 'फिजिकल बाॅडी, भी कहते हैं। यह शरीर हमें जन्म के साथ ही मिलता है लेकिन यह पहला शरीर ही सभी मनुष्यों में ठीक से विकसित नहीं हो पाता है। यदि यह ठीक प्रकार से विकसित हो जाय तो ही इस शरीर से सुखांनुभव किया जा सकता है। हमारा परिचय सबसे पहले इसी भौतिक शरीर से ही होता है। बहुत से मनुष्य इस भौतिक शरीर पर ही अटक जाते हैं, उनके जीवन का अर्थ सिर्फ इंद्रियों के भोग के अलावा और कुछ भी नहीं होता है। 

     दूसरा शरीर: हमारा जो है, वह 'भाव, शरीर है, इसे इथरिक बाॅडी के नाम से भी जाना जाता है। यह शरीर भावनाओं से बना होता है, यदि यह शरीर ठीक से न विकसित हो तो व्यक्ति भावनाओं के जगत से अनभिज्ञ ही रह जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी में हम ऐसे तमाम लोगों से परिचित होते हैं जिन्हें दूसरे के सुख-दुख का कोई बोध नहीं होता है, उनके इस बर्ताव का कारण यही होता है कि उनका भाव शरीर विकसित नहीं हो पाता। अध्यात्म के मार्ग पर गति करने के लिए इस शरीर का विकसित होना अत्यंत आवश्यक है। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
     तीसरा शरीर: सूक्ष्म शरीर है, भौतिक शरीर के बाद, यह सर्वाधिक उपयोग में लाया जाने वाला शरीर है, इसे ही अंग्रेजी में एस्ट्रल बाॅडी कहा जाता है। यह शरीर हमारी बुद्धि, तर्क, और विचार शक्ति से संबंधित है। जिन मनुष्यों में विचार शक्ति की कमी होती है या जो बुद्धि से निर्बल होते हैं उनका यह तीसरा शरीर सक्रिय नहीं हो पाता है। यह सक्रिय तभी होगा जब पहले के दो शरीर सक्रिय हो चुकें हों, जो पहले या दूसरे पर ही अटक गये हैं उनका यह तीसरा शरीर कभी भी नहीं विकसित हो पायेगा। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
     चौथा शरीर: हमारा मनस शरीर है! अर्थात 'साइकिक बाॅडी, है। यह शरीर पूर्णरूपेण मानसिक शक्तियों अथवा मन से संबंधित है। कल्पनाओं को साकार करना, नई-नई चीजों को ईजाद करना, इसी शरीर की सक्रियता से संभव हो पाता है। तीसरा शरीर सक्रिय होने के बाद चौथा शरीर स्वत: ही विकसित होने लगता है, जब बुद्धि अपना शिखर प्राप्त कर लेती है, जब विचार करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता है तब मजबूरी में उसकी कल्पना करनी पड़ती है जो बुद्धि से परे है। यह जो विज्ञान चौथे आयाम की कल्पना कर पा रहा है, यह बुद्धि की मजबूरी है। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
चौथे शरीर के बाद एक सीमा रेखा आ जाती है। अब इसके बाद जो जगत आयेगा उसे समझने में कठिनाई होगी, जैसे कोई पूछे कि चौथे आयाम की कल्पना सत्य होने के बाद क्या करिएगा, तो बड़ी कठिनाई होगी। बड़ी से बड़ी कल्पना भी चौथे तक ही जाती है उसके बाद दुनियां का वजूद ही समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो जगत प्रारंभ होता है वह देव-योनियों से संबंधित है। 

     पांचवां शरीर: पांचवें नंबर का यह शरीर अध्यात्म शरीर अथवा 'स्पुरिचुअल बाॅडी, कहलाता है। जब चौथे आयाम की कल्पना साकार हो जायेगी तब जो ख्याल आयेगा वह पांचवें शरीर से ही आयेगा। तब यह होगा कि वैराग्य पकड़ लेगा, अनासक्ति का भाव पकड़ लेगा! फिर न कुछ करना रहेगा और न ही कुछ सोंचना रहेगा, सिर्फ बैठे रहेंगे, टकटकी लगाए देखते रहेंगे। फिर 'सिजोफ्रेनिया, के मरीज जैसी स्थिति हो जायेगी। तब अगर कोई पूंछेगा भी बैठे क्यों हैं तो वही कहेंगे जो मलूकदास कहते थे। मलूकदास कहते थे, 'अजगर करै न चाकरी, पंक्षी करै न काम, यह पांचवें अविकसित शरीर की अभिव्यक्ति है। विकसित होने के बाद ऐसी चेतना देवत्व को उपलब्ध हो जाती है। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
     छठा शरीर: यह शरीर अतींद्रिंय अनुभूति के द्वार खोलने वाला होता है, इसे शिव शरीर, लौकिक शरीर, ब्रह्म शरीर आदि नामों व अंग्रेजी में इसे 'काॅस्मिक बाॅडी, के नाम से जाना जाता है। पांचवें शरीर का विकास होने के बाद और देवत्व प्राप्त होने के बाद यदि कोई जीव और आगे जाना चाहे तो वह छठे शरीर अर्थात ब्रह्म-शरीर को भी विकसित कर सकता है और भगवान, ईश्वर और खुदा आदि बन सकता है। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
     सातवाँ शरीर: यह निर्वांण शरीर है, अर्थात मोक्ष शरीर या शून्य शरीर है, इसे हम 'बाॅडी लेस बाॅडी, भी कह सकते! यह शरीर कुछ विरले लोगों में ही विकसित हो पाता है। जो छठा शरीर विकसित कर चुके हैं और ईश्वर की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं उनके लिए भी अभी आगे मार्ग शेष है, वे ईश्वर होने से आगे भी जा सकते हैं और इस अंतिम, निंर्वाण शरीर में लीन हो सकते हैं। भगवान बुद्ध, कबीर, रैदास, जैसी चेतनाएं इस निंर्वाण देह विलीन हो चुकीं हैं। 

https://www.paltuji.com
https://www.paltuji.com 
     यह जो सात शरीर हैं यह चौबिस घंटे मनुष्य को प्रभावित करते रहते हैं। कभी वह भोगी बन जाता है, कभी त्यागी बन जाता है, कभी वैराग्य पकड़ लेता है। लेकिन स्थाई कुछ भी नहीं रहता है, सिर्फ झलकें मिलती हैं। और यह जो झलकें हैं यही सहारा बनती हैं, यही प्रोत्साहित करतीं हैं, यही आगे का मार्ग प्रशस्त करती हैं। 



     

Previous
Next Post »