KUNDLINI JAGRAN BHAAG-2, कुंडलिनी शक्ति और 'सात, की संख्या का क्या संबंध है?

कुंडलिनी शक्ति और 'सात, की संख्या का क्या संबंध है? क्या नाम, रूप, जाति, धर्म, गांव, शहर, देश आदि सत्य नहीं है।  


      कुंडलिनी शक्ति के संबंध इससे पहले आप जान चुके हैं कि यह किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित घटना नहीं है, सभी मनुष्य इसके लिए पात्र हैं और सभी जीवों में यह विद्यमान रहती है। कुंडलिनी को सक्रिय किए बिना कोई भी मनुष्य इस जगत की वास्तविकता को नहीं जान सकता। दुनियां में जितने भी लोगों ने इस जगत की वास्तविकता को पहचाना है उनकी सभी की कुंडलिनी अवश्य ही जाग्रत हुई है। भले ही उन्हें इसके बाबत पता हो या न हो, प्राकृति की जो भी शक्तियां या नियम हैं वे मनुष्य की जानकारी पर निर्भर नहीं हैं। जो नहीं जानतें हैं गुरूत्वकषणं के संबंध में वे भी उससे बंधे हैं और जो जानते हैं वे भी बंधे हैं।

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कुंडलिनी शक्ति और 'सात, की संख्या का महत्व:-

      आस्तिव की इस लीला में 'सात, की संख्या का बहुत महत्व है, सात स्वर्ग और सात नर्कों की कल्पना के साथ-साथ ही सात जन्मों की भी बात कही गई है। हिंदू धर्म में सात फेरों का बहुत मूल्य है, बिना सात फेरे पूर्ण हुए वर व वधु के विवाह को संपन्न नहीं माना जाता है। गांव के घरों में जो सीढ़ी होती है उसमें सात डंडों का ही प्रयोग किया जाता है, और मरने पर जो अर्थी बनती है वह भी सात डंडों से ही बनती है। और भी तमाम रीति-रिवाज हैं जहां सात की संख्या का उपयोग होता है।

      यह जो हमारे व्योहारिक जीवन में सात की संख्या का उपयोग है यह कुंडलिनी शक्ति के सात चक्रों का ही प्रतीक है। हमारा यह दिखाई पड़ने वाला भौतिक शरीर ही अकेला शरीर नहीं है, इस शरीर के बाद भी और छः शरीर हैं। लेकिन साधारणत: उनका हमें कोई बोध नहीं होता, उनका बोध तभी होता है जब यह भौतिक शरीर पूरी तरह जान लिया जाता है, लेकिन अधिकांश लोग इस शरीर को नहीं जान पाते, जीवन से लेकर मर्त्यु तक इसी में उलझे रहते हैं, इसलिए अन्य शरीरों के संबंध में जानना बड़ा कठिन हो जाता है। इस शरीर को जानने से, मेरा मतलब है कि जो भी जानकारी हम इस शरीर के बाबत रखते हैं वह सब झूंठी है, वह सत्य नहीं है।

      जैसे हमारा नाम है, रूप है, जाति है, धर्म है, गांव है, शहर है, देश है आदि यह कुछ भी सत्य नहीं है। कुंडलिनी जागरण की दिशा में यदि आगे बढ़ना है तो यह भाव स्यमं के भीतर प्रगाढ़ करना पड़ेगा। क्योंकि यह सारे लेबल हैं और यह लेबल कुंडलिनी शक्ति की अमृत बूंदें पड़ने पर धुल जाने वाले हैं, यह तभी तक चिपके हैं जब तक शक्ति की वर्षा नहीं हो रही है। और यह भाव आपका अभ्यास भी हो जाने वाला है, आप इस भाव को जितना हो सके उतना गति दें और जानें कि यह शरीर मरणधर्मा है, यह बहुत देर टिकने वाला नहीं है, यह जीवन भी कोई जीवन नहीं है। मित्रों, वैराग्य ऐसी औषधि है जो सारे संसारिक झमेंलों से मुक्त कर देती है।

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