JANIYE CHATH PARV KI MAHIMA. जानिए छठ पर्व की महिमा, यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सूर्य को जल देना लाभकारी है। समस्त जीवन का श्रोत सूर्य ही है, सूर्य सुख-समृद्धि और मान-सम्मान का कारक भी है। छठ पूजा विशेषकर सूर्य की पत्नी उषा को ही समर्पित है।

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      दीपावली के छ: दिन बाद, छठ पर्व, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल के अलावा लगभग सभी स्थानों पर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन बिहार में इसका महत्व कुछ अलग ही है, छठ पर्व जब आता तो सुख-समृद्धि के साथ-साथ और भी तमाम तरह के अवसर लाता है। इस पर्व का इन्तजार उन सुहागिनों और अविवाहित लड़कियों को भी खूब रहता है जिनका प्रीतम या प्रेमी उनसे दूर है, क्योंकि छठी मईया को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता कि उनका कोई भी भक्त उनके इस त्योहार को निराशा और उदासी में मनाए। इसलिए सैकड़ों-हजारों मील दूर प्रदेश में बसे लोग भी दौड़े-भागे अपने-अपने परिजनों व प्रेमियों के पास पहुंच जाते हैं।

      आपने कुंभ मेले के बाबत एक कहावत अवश्य ही सुनी होगी कि कुंभ की भीड़ में लोग बिछड़ जाते हैं, लेकिन ऐसी कोई कहावत नहीं है कि छठ की भीड़ में कोई बिछड़ गया हो। कुंभ पर्व का उद्देश्य है लोगों को अलग करना है, समाज से, परिवार से, मित्र से, प्रेमी से जुदा करना, कुंभ की कृपा से प्रेमी संन्यासी हो जाते हैं, सुहागिनों का सुहाग उजड़ जाता है। लेकिन छठी मईया की कृपा से उजड़ा हुआ सुहाग भी खिलखिलाने लगता है और हिमालय की गुफाओं में बैठे सन्यासी भी प्रेमी हो जाते हैं। प्रिय, ऐसी महिमा है छठी पर्व की, ऐसा भाव बहता है वहां जहां छठी मईया के गीत गाए जाते हैं। 

छठ पर्व की शुरुंआत कैसे हुई?

       जैसा कि सभी त्योहारों के संबंध में कोई न कोई कहानी प्रचलित है उसी तरह छठी पर्व की भी कई कहानियां प्रचलित हैं। पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार, राजा प्रियबंद और पत्नी मालिनी को कोई संतान नहीं हो रही थी, पुत्र प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने एक यज्ञ करवाया, लेकिन उस यज्ञ में एक भूल हो गई, जो 'अछत, यज्ञ में आहुति के लिए प्रयोग होने थे उन अछतों से बनी खीर राजा प्रियबंद की रानी मालिनी को खिला दी गई। इस भूल के कारण जो पुत्र प्राप्त हुआ वह मर्त अवस्था में पैदा हुआ। इस घटना से राजा बहुत आहत हुए और पुत्र-वियोग में पुत्र के साथ श्मशान में वे भी अपने प्रांणों का त्याग करने लगे। तभी ब्रह्म की छठी मानस शक्ति, देवसना प्रकट हुईं उन्होंने राजा को अपना परिचय देते हुए कहा कि वे मेरी आराधना करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। कहते हैं उसी दिन राजा ने छठ का व्रत रखा और पूजा-प्रार्थना की जिसके प्रभाव से उनका वह मर्त पुत्र पुन: जी गया। मान्यता है कि जिस दिन यह घटना हुई, वह दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी ही था। और तभी से यह छठ पूजा मनाई जाती है।

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      एक अन्य कथा है, जब राम और सीता चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे तब उन्होंने रावण-वध के पाप की वजह से राजसूर्य नामक यज्ञ करवाया। इस यज्ञ को मुग्दल ऋषि ने संपन्न कराया, मुग्दल ऋषि ने यज्ञ का जल झिड़ककर श्रीराम को रावण-वध के पाप से मुक्त किया और उन्होंने ही राम को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने के लिए कहा था, यह उपासना सीताजी ने भी मुग्दल ऋषि के आश्रम में छ: दिन निर्जल रह कर की थी। कहते हैं तभी से यह पर्व मनाया जाता है।

      छठी पर्व के संबंध में एक किवदंती महाभारत में भी वर्णित है। मान्यता है कि छठ पूजा की शुरुंआत कर्ण द्वारा की गई थी, कर्ण सूर्य के परम उपासक थे वे घंटों गंगा नदी की धार में कमर तक अपने शरीर को जल में डुबाए सूर्य उपासना करते रहते थे। कर्ण पर सूर्य भगवान की विशेष कृपा थी, सूर्य की कृपा से ही कर्ण महान योद्धा बने थे। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएं में हार गए थे तब द्रौपदी ने भी राजपाट वापस पाने के लिए छठ का व्रत किया था। इसी व्रत की वजह से पांडवों को राजपाट पुनः प्राप्त हुआ था। छठी मईया के पावन पर्व में सूर्य उपासना का प्रभाव और महत्व बहुत अधिक माना गया है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सूर्य को जल देना लाभकारी है। समस्त जीवन का श्रोत सूर्य ही है, सूर्य सुख-समृद्धि और मान-सम्मान का कारक भी है। छठ पूजा विशेषकर सूर्य की पत्नी उषा को ही समर्पित है।

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छठ पर्व कैसे मनाया जाता है? 

पहला दिन, नहाय-खाय:-

      छठ पर्व की शुरुआंत 'भैय्या-दूज, के तीसरे दिन यानी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से प्रारंभ हो जाती है, जिसे 'नहाय-खाय, के नाम से भी जाना जाता है। इस पूजा में स्नान आदि करने के उपरांत नये वस्त्र धारण किए जाते हैं और साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जाता है और तामसिक वस्तुएं, जैसे लहसुन, प्याज, अचार, खटाई आदि का सेवन नहीं किया जाता है। पहले दिन कद्दू की सब्जी और घी से बना अरवा चावल का 'भात, और चना-दाल प्रसाद के रूप में खाने की परंपरा है, लेकिन सफेद नमक का सेवन वर्जित माना जाता है, उसके स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग किया जाता है। 

दूसरा दिन, खरना:-

      पंचमी के दिन, अर्थात दूसरे दिन जो व्रत रखने वाले व्रति होते हैं वे अन्न-जल त्यागकर उपवास करते हैं, जिसे 'खरना, कहा जाता है, खरना का अर्थ है, पानी की एक बूंद भी गले से नीचे नहीं उतरने देना। संध्या के समय पूजा-प्रार्थना करने के बाद चावल और गुड़ की बनी 'खीर, का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके अलावा चावल का पिठ्ठा और घी से चुपड़ी रोटी का भी सेवन किया जाता है। और इस भोजन को प्रसाद के रूप में अन्य लोगों में भी बांटने का विधान है। 

संध्या पूंजन:-

      छठ का तीसरा दिन यह छठी माई का मुख्य दिन भी होता है, यह दिन बहुत ही व्यस्त रहता है, क्योंकि इस दिन तमाम प्रकार की तैयारियाँ करनी रहती हैं। इस दिन प्रसाद के रूप में चावल के लड्डू बनाये जाते हैं, डूबते हुए सूर्य को दूध अर्पण किया जाता है। संध्या के समय बांस की टोकरी को प्रसाद व फल-फूलों से सजाया जाता है। घर के सभी सदस्य और व्रति महिलाएं इस टोकरी को लेकर नदी व तलाबों के तटों व घाटों पर जाती हैं। पूजन विधि के अनुसार व्रति महिलाएं स्नान करके जल में खड़ी होकर स्वच्छ मन से पूजा-प्रार्थना करके सूर्य को अर्घ्यदान करती हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना भी करतीं हैं। 

सूर्य की पत्नी उषा का पूंजन:-

      यह पूजा की समाप्ति का दिन माना जाता है। यह इस पावन पर्व का चौथा दिन सप्तमी के दिन आता है। इस दिन व्रति महिलाएं अपने समस्त परिवार के साथ उगते हुए सूर्य को प्रणाम करतीं हैं और पूजा-विधि करने के बाद पुन: अर्ध्य-दान करतीं हैं, और छठी मईया के गीत गाती और प्रसाद वितरित करती हुई इस व्रत का समापन करती हैं। 








  




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