DHANTERAS KYON MNAAI JAATI HAI. धनतेरस क्यों मनाई जाती है? क्या इस दिन नई वस्तुएं खरीदने से होता है लाभ?


धनतेरस क्यों मनाई जाती है? क्या इस दिन नई वस्तुएं खरीदने से होता है लाभ? किस धातु के बर्तन खरीदने से मिलता है संतोष? जानिए धनतेरस की कुछ रोचक बातें!

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      धनतेरस का नाम, भगवान 'धन्वंतरि, के नाम से जुड़ा है। भगवान धन्वंतरि को औषधियों का देवता भी माना जाता है, जिन्हें दवाईयों से जल्दी लाभ न मिलता हो या स्वास्थ्य बहुत अधिक खराब रहता हो तो वे यदि  औषधियों के साथ-साथ भगवान धन्वंतरि की भी पूजा-अर्चना करेंगे तो शीघ्रता से लाभ होगा। इस दिन लोग भगवान धन्वंतरि से स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना भी करते हैं।

नयी वस्तुएं क्यों खरीदी जाती हैं?

     इस प्रथा के पीछे मान्यता यह है, कि जब भगवान धन्वंतरि का अवतरण हुआ तब उनके हांथ में एक  'कलश, था, चूंकि- यह कलश एक बर्तन था। इसी मान्यता के आधार पर नये बर्तन खरीदने का विधान है। लेकिन लोग इस दिन अन्य वस्तुएं भी खरीदते हैं, इसके संबंध में कहा यह जाता है कि इस दिन नई वस्तुएं खरीदने से धन-धान्य तेरह-गुना बढ़ जाता है। चांदी के बर्तनों व आभूषणों की खरीदारी भी खूब की जाती है, क्योंकि चांदी, चंद्रमा की पसंदीदा धातु है, ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा मनुष्यों के 'मन, का अधिपति होता है, चांदी धारण करने व खरीदने से मन शांत रहता है। धनतेरस के दिन महिलाओं को विशेषकर यह स्वतंत्रता रहती है कि वे स्यमं ही दुकानों पर जाकर अपनी पसंद की वस्तुएं खरीदें!

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     जिस दिन धनतेरस होती है, उस दिन सांझ को घर के मुख्य दरवाजे और आंगन में दिए जलाने की भी परंपरा है, इन दीपों के पीछे भी एक कथा है। कथा यह है कि 'हेमंत, नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे उनके कोई संतान न थी, बड़े प्रयासों व देवी-देवताओं की कृपा से उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ। राजा ने पुत्र के भविष्य को जानने की जिज्ञासा से कुछ विद्वान ज्योतिषियों को महल में बुलवाया, ज्योतिषियों द्वारा जब बालक की कुंडली का अध्ययन किया गया तो पता चला कि यह बालक मांगलिक है और विवाह संपन्न होने के आठ दिन बाद ही इसकी मर्त्यु होने की संभावना है। राजा हेमंत यह जानकर बहुत दुखी हुए उन्होंने सीने पर पत्थर रखकर उस नन्हें बालक को बहुत दूर एक आश्रम में छोड़ आये। लेकिन कहते हैं न कि 'लिखी विधाता की न मिटिहै, चाहे लाख धरौ औतार, जो विधि ने लिख दिया, जो नसीब में अंकित हो गया वह अमिट है, वह मिटने वाला नहीं है, चाहे कितने ही बहाने खड़े करो!

      वह बालक भी एक दिन युवा बन गया, एक दिन जब आश्रम में कोई न था तब एक सौंदर्य की राजकुमारी उधर से निकली, उसे देखकर उस युवा राजकुमार के ह्रदय में बिजली सी कौंध गई और वह उस रूपसी पर मोहित हो गया, वह युवती भी उसके प्रेम में बंध गयी। थोड़े दिन बीत जाने के बाद उन दोनों ने आश्रम में ही प्रेम-विवाह कर लिया। लेकिन कुंडली में मरण दोष होने के कारण विवाह के ठीक आठ दिन बाद संध्या उस बालक की मर्त्यु हो गई। मर्त्यु के पश्चात जब यमराज के दूत उसके प्राण लेकर जा रहे थे तब उन्होंने सुना कि उसकी विधवा पत्नी बहुत विलख रही है, विलाप कर रही थी। उसका विलाप सुनकर यमदूत बहुत भावुक हो गये, उन्होंने यमराज से पूछा कि प्रभु क्या कोई ऐसा मार्ग नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मर्त्यु या ग्रहों के कालचक्र से मुक्त हो सके, यमराज ने कहा कालचक्र, मर्त्यु अथवा अकाल मृत्यु यह सब विधि का विधान है।

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      इससे बचने का सबसे आसान तरीका यह है कि कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी वाली रात संध्या को दक्षिण दिशा में जो प्राणी मेरे अर्थात यमराज के नाम से पूजा-अर्चना करके दीप जलायेगा, उसे अकाल मर्त्यु और कालचक्र कभी नहीं भयभीत कर सकेगा। पृथ्वी का दक्षिणी कोंण मर्त्यु का प्रतीक है, इस दिशा में सिरहाना करके सोने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाती है और न सकारात्मक ऊर्जा भीतर ही प्रवेश कर पाती है, व्यक्ति जैसे थका-मांद रात सोता है, वैसा ही सुबह वह जागता है, कोई ताजगी, कोई स्फूर्ति उसके जागने पर नहीं मिलती। मर्त्यु के समय में जब प्राण ऊर्जा शरीर से बाहर निकलती है तो वह दक्षिण दिशा में ही भागती है, यमराज का मार्ग, दक्षिण मार्ग ही है। भगवान धन्वंतरि व धनतेरस की पूजा व्यक्ति को दक्षिण मार्ग की अशुभता से बचाती है। 

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