Amrapali: One such woman. आम्रपाली एक ऐसी स्त्री जिसे वेश्या होने का फरमान सुनाया गया!

आम्रपाली: एक ऐसी स्त्री जिसे वेश्या होने का  फरमान सुनाया गया था!

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     तुम कितनी खूबसूरत हो, इसका जवाब तुम्हारे आइने के पास नहीं है, यह यदि मालुम करना है, तो अपने इर्दगिर्द मड़राते अपने चाहने वालों की गिनती करो, कि उनकी तादाद कितनी है। सिर्फ इस कारण स्यमं को खूबसूरत न समझो कि कोई एक शख्स अपनी जान से भी ज्यादा तुम्हें चाहता है। एक को मानकर यह निर्णय करना कि मैं खूबसूरत हूँ, गलत होगा।

     निराश मत होइए, मैं यहाँ सौंदर्य पर बात कर रहा हूं! 'प्रेम, पर नहीं! प्रेम का फूल तो एक के साथ ही खिलता है, प्रेम तो एक को ही खोजता है, फिर वह चाहे पति हो, पत्नी हो, प्रेमी हो, प्रेयसी हो या फिर परमात्मा हो। जितना एकांत और अकेलापन होगा प्रेम के फूल से उतनी ही सुगंध बिखरेगी। सौंदर्य और प्रेम को कभी एक न समझो, सौंदर्य मनुष्य व प्राकृति का जलवा है, प्रेम परमात्मा का प्रसाद है। प्रेम का बीज प्रत्येक अपने ह्रदय में लेकर ही जन्मता है, सुन्दरता का खिताब किसी-किसी को ही मिलता है। इस जगत में सौंदर्य की बड़ी प्रतियोगिताएं होती हैं, प्रतिस्पर्धाएं होती हैं, परन्तु बड़ी सोंचने वाली बात है कि प्रेम की कहीं प्रतियोगिताएं, प्रतिस्पर्धाएं नहीं होती हैं, कहीं कोई अखबारों में भी नहीं छपता कि फलां आदमी प्रेम में आगे निकल गया और सब पिछड़ गए।
     गीत अवश्य ही गाए गये हैं, गीत तो सभी गाते हैं! जब भी किसी के ह्रदय में पहली दफे प्रेम की वीणा बजती है तो सभी को यही लगता है कि हमारा प्रेम दूसरों से जुदा है, न कि जुदा है, बल्कि लैला-मजनू का प्रेम भी हमारे प्रेम के आगे फीका है!

     सौंदर्य जीता है, भीड़ में, बाजार में, क्योंकि भीड़ सौंदर्य को निखारने का कार्य करती है! सौंदर्य का संबंध प्राकृति से है अर्थात शारीरिक है! सौंदर्य के दीवानों की पकड़ बहुत गहरी नहीं होती है, उनकी दीवानगी सिर्फ सौंदर्य अर्थात शरीर तक ही सीमित रहती है, सौंदर्य के विदा होते ही वह दीवानगी और दीवाने दोनों ही नदारद हो जाते हैं।
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     यह ऐसे ही सौंदर्य की कहानी है जिसके चाहने वालों की संख्या एक या दो नहीं बल्कि हजारों में थी। दूर-दूर तक उसकी खूबसूरती की ख्याति थी! उसका एक नजर दीदार करने के लिए उसके महल के सामने पुरूषों का जमवाड़ा लगा रहता था, बडे़-बडे़ राजा-महाराजा भी उसे दूर से ही देखकर लौट जाया करते थे। वह जहां-जहां से गुजरती थी वहां-वहां के युवाओं को उसके यौवन को निहारने की 'लत, लग जाती थी। वह जब चली जाती थी तब वही युवा उसके पदचिन्हों की धूल बटोर लिया करते थे और जब उसके दर्शन नहीं होते तो वे उस धूल को ही देखकर मन में संत्तावना भर लेते थे।

     उसके सौंदर्य का नशा ऐसा था कि घरों में त्राहि-मांम मची हुई थी! अनेक पुरूषों के घर बर्बाद हो चुके थे और युवाओं का भी किसी काम में मन नहीं लगता था। इसका विपरीत प्रभाव सर्वाधिक महिलाओं व बच्चों पर ही पड़ रहा था। वह पुरूषों का नसीब बन चुकी थी, वे बड़े किस्मत वाले माने जाते थे जिन्हें उसके नाजुक बदन को छेड़ने की इजाजत मिल जाती थी। और यह इजाजत वह स्यमं ही देती थी! आज रात किसके साथ बितानी है, इसका निर्णय करने का अधिकार सिर्फ उसी को था, उसके ऊपर किसी का जोर-दबाव नहीं चलता था। वह उस नगर में सबसे आलीशान महल में रहती थी, वह नगरवधु होने के बावजूद भी किसी सम्राट से कम नहीं थी।

आम्रपाली : एक ऐसी स्त्री जिसे वेश्या होने का फरमान सुनाया गया था!

     आम्रपाली के माता-पिता कौंन थे? इसका कोई प्रमाणित उत्तर नहीं है। लेकिन नाम के आधार पर यह बताया जाता है कि आम्रपाली, वैशाली के एक बूढ़े किसान दम्पति को आम के पेड़ के नीचे नवजात बच्ची के रूप मिली थी! उन्होंने ही उसका पालन-पोषण किया था। प्रायः यह देखा गया है कि इस तरह से उत्पन्न बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा अधिक ही प्रतिभावान होते हैं! चूंकि - आम्रपाली एक स्त्री थी, इसलिए उसकी प्रतिभा सौंदर्य बनकर प्रकट हुई थी।
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      उसने जब यौवन की दहलीज़ पर कदम रखा तो वह सभी की आंखों में खरकने लगी, पुरूष उसकी तरफ आकर्षित होने लगे और महिलाएं ईष्या से जलने लगीं। इस वजह से उसे अपने उमड़ते यौवन को घर की चारदीवारी में ही कैद करके रखना पड़ा। परंतु इससे भी कुछ समाधान न हुआ, अब पुरुष उसके घर के बाहर ही चक्कर काटने लगे थे। धीरे-धीरे उसके सौंदर्य की महक आस-पड़ोस के गांवों में भी फैलने लगी थी, लोग अन्य गांवों से भी उसे देखने आने लगे थे। शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भांति दिन-प्रतिदिन उसका सौंदर्य जवान हो रहा था, जो युवाओं के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं था।  जब वह भरपूर यौवन के शिखर पर पहुंच गई, तब पुरूषों में एक नई प्रतिस्पर्धा पैदा हो गई और वह प्रतिस्पर्धा आम्रपाली से विवाह करने की थी। प्रत्येक उसे पाने का इच्छुक था। क्योंकि किसी को उसकी जाति-धर्म के संबंध में नहीं मालुम था कि वह कौंन है? जो दंपति उसे उठाकर लाए थे, वे भी अब इस दुनियां में नहीं थे। इसलिए प्रत्येक उसे अपनी बिरादरी का कहकर एक तर्कबद्ध दलील पेश कर रहा था। 

      धीरे-धीरे यह प्रतिस्पर्धा खूनी संघर्ष में परिवर्तित होने लगी थी! और इस संघर्ष में अब बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और सम्मानित लोग भी शामिल हो चुके थे, अंतत: नगर के सभापति द्वारा एक सभा बुलाई गई। सभा में आम्रपाली के विषय पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया। लेकिन उसका आकर्षण ऐसा था कि कोई भी पुरूष उसे किसी अन्य की बाहों में जाते हुए नहीं देखना चाहता था, प्रत्येक उसे अपनी ही दुल्हन बनाने के लिए अड़ा था। मामले को सुलझाने की मंशा से सभापति को एक ऐसा निर्णय लेना पड़ा जो सभी नीति-नियमों से परे था। आम्रपाली को 'नगरवधु, घोषित कर दिया गया। 
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      नगरवधु का अर्थ यह है कि अब वह किसी एक की पत्नी नहीं बन सकती, अब उस पर प्रत्येक का बराबरी का अधिकार है। लेकिन सभा की सहमति से उसे यह विशेष स्वतंत्रता दे दी गई थी कि कोई भी पुरूष उसकी सहमति के बिना उसे स्पर्श तक नहीं करेगा! उसकी सहमति पाने के लिए अब लोग उसके लिए कुछ भी करने के लिए राजी थे, जिस आलीशान महल में वह रहती थी वह भी एक बहुत बड़े नगर-सेंठ ने उसे खुश करने के लिए भेंट-स्वरूप बनवाकर दिया था, उसके ठाठ-बाट किसी महारानी से कम नहीं थे। बावजूद इसके उसे जो किरदार मिला था उसे वह बड़ी लगन और इमानदारी से निभाती थी, जो भी उसके दरबार में आता था वह उसे खुश करने का भरपूर प्रयास करती थी। करीब चार वर्षों तक वह इसी तरह लोगों की इच्छाओं को तृप्त करती रही। 

बुद्ध की गरिमा के आगे, आम्रपाली का हुश्न भी पड़ गया था फीका! जब हुआ था वैशाली में बुद्ध का आगमन:
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यह घटना उसी समय की है जब भगवान बुद्ध को संबोधि प्राप्त हो चुकी थी। जहां एक तरफ आम्रपाली के हुश्न चर्चे आम थे, वहीं बुद्ध का जलवा भी कुछ कम न था। अब नियंता को देखना यह था कि इस बुद्धत्व और हुश्न की लड़ाई में जीत किसकी होनी है। 

     बुद्ध अपने सैकड़ों भिक्षुओं के साथ वैशाली में पधारे, एक जमींदार ने अपने बगीचे में उनके ठहरने की सुविधा जुटाई थी और निवेदन किया था कि कुछ दिन रूककर हम पर अनुकंपा करें! बुद्ध के भिक्षु सुबह भिक्षांटन के लिए निकल जाते और नियम था कि एक भिक्षु सिर्फ एक घर में ही भिक्षा मांगेगा, मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो दुबारा उस घर में भिक्षा नहीं मांगी जायेगी। इस तरह जब सारे घरों में भिक्षा मांग ली जाती थी तब वह कारवां अन्य गांवों की तरफ कूच कर जाता था। बुद्ध इसी ढंग से लोगों को देशना दिया करते थे।

     सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही एक भिक्षु ने आम्रपाली का द्वार खटखटाया! आम्रपाली ने द्वार खोला तो देखा सामने एक युवा भिक्षु हांथ में पात्र लिए शांत चित्त अवस्था में खड़ा है। उसके मुखमंडल पर किसी और ही लोक की आभा थी, यह शायद पहला पुरूष था जिसकी द्रष्टि उसके जिस्म की भूखी नहीं थी। आम्रपाली ने उस भिक्षु की आंखों में देखा तो लगा जैसे वे कह रही हैं कि अब तुम थक गयी हो, अब तुम्हें विश्राम की आवश्यकता है, वह भी इस काम से बुरी तरह ऊब चुकी थी। अपने खूबसूरत यौवन और मादक नेत्रों से हजारों मर्दों को घायल कर चुकी आम्रपाली, आज स्यमं ही जख्मी हो चुकी थी। उसने भिक्षु से कहा कि जिस सुख को प्राप्त करने के लिए मर्द आपस में ही संघर्षरत रहते हैं, वह सुख मैं आप पर लुटाना चाहती हूँ! अत: आपसे निवेदन है कि इस चातुर्मास आप मेरे महल में मेहमान बनकर रहें। 

बुद्धों की परंपरा में 'चातुर्मास, के चार महीने भिक्षु किसी न किसी घर में मेहमान बनकर समय व्यतीत करते थे। जो लोग उन्हें निमंत्रित करते थे, उन्हें वे बुद्ध के मार्ग की शिक्षा देते थे। 

      भिक्षु ने बड़े ही सरल स्वभाव से कहा, देवी, मैं यह निर्णय करने का अधिकारी नहीं हूँ, मेरे गुरू के आदेश से मैं यहाँ आया था, मेरा अब मुझमें कुछ भी नहीं है। रात मुझे कितनी दफे करवट बदलनी है, यह भी मैं अपने गुरु के आदेश से ही करता हूं। अतः आपका निवेदन भी गुरू की इच्छा से ही संभव होगा। यह कहकर भिक्षु वहां से चला गया, वह तो चला गया, परन्तु आम्रपाली के पांव वहीं जम गए, वह एक शिला की भांति वहीं खड़ी उसे एकटक देखती रही। उधर दूसरे भिक्षुओं में भी यह खबर फैल गई थी कि आम्रपाली ने उस भिक्षु को चातुर्मास में न्योता दिया है, और वह उस वेश्या के महल में चार मास बिताने वाला है। 
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     ईष्र्यावश उन्होंने बुद्ध से इसकी शिकायत कर दी, बुद्ध ने कहा चिन्तित न होओ, मैंने उसे अनुमति देदी है! तुम सिर्फ उसे देखते हो, परंतु मैं जानता हूँ! इस  चातुर्मास यह निर्णय हो जायेगा कि शरीर का सौंदर्य सत्य के सौंदर्य को कितना आकर्षित कर पाता है। यदि शरीर का सौंदर्य जीता तो समझो वह भिक्षु नहीं लौटेगा और यदि सत्य का सौंदर्य जीता तो वह अपने साथ एक भिक्षुणी भी लाएगा। 

     और मित्रों, चातुर्मास बीतते-बीतते आम्रपाली पूरी तरह बदल चुकी थी! जब भिक्षु घर से विदा हुआ तो साथ आम्रपाली भी सब ऐशो-आराम त्यागकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ी, और जाकर बुद्ध के चरणों में अपना सिर रखकर रोने लगी। उसने बुद्ध से कहा आपने नाहक ही इतनी प्रतीक्षा क्यों करवाई। आप पहले आ जाते तो मुझ पर यह नगरवधु होने का लांछन नहीं लगता। बुद्ध ने उसे दीक्षित किया और अपने संघ में सम्मिलित कर लिया। वह भी गेरूए वस्त्र पहनकर बुद्ध के संघ में बहुत आनंदित थी। 

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