AJAR -AMAR HONE KA VARDAAN BHOOL KAR BHEE NA MANGNA अमरता भूल कर भी न माँगना वार्ना हो सकती मुसीबत।

अमरता की बातें सभी को बड़ी प्रीतकर लगती हैं, ऐसा इंसान खोजना मुश्किल है जो अमर होना नहीं चाहता है। लेकिन क्या आपको पता है कि अमरता वरदान नहीं बल्कि अभिशाप है? 

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      सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि अमरता का कोई भी संबध इस भौतिक शरीर से नहीं है। अमरता की घटना जब भी घटती है, जहां भी घटती है, तो वह सूक्ष्म शरीर में ही घटती है। इतिहास में ऐसी कोई भी घटना का जिक्र नहीं है जहां यह भौतिक देह अमर हो गई हो। और यदि ऐसी कोई घटना सुनी भी होगी तो समझ लेना वह कपोल-कल्पित ही होगी। यह अवश्य हुआ है कि लोग सामान्य जीवन से अधिक जिएं हैं और आज भी जी सकते हैं, सैकड़ों नहीं हजारों वर्षों तक इस भौतिक शरीर को जीवित अवस्था में रखा जा सकता है, इसमें बहुत कठिनाई नहीं है, बस टेक्नोलॉजी को विकसित भर करने की बात है।

      भारत में ऐसे अनेकों देवी-देवताओं के संबंध में कहानियां प्रचलित हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है और वे देवी-देवता समय-समय पर अपने भक्तों की मनोकामनाएं भी पूर्ण करतें हैं। किन्तु यह कहानियां सत्य हैं या सत्य नहीं हैं, यह इस विषय के संबंध में चर्चा नहीं है और न ही मैं यह कह रहा हूँ कि अमरता का सिद्धांत झूठा है। हम यहाँ सिर्फ यह बता रहे हैं कि यदि जीवन में अमर होने और अमर न होने के बीच चुनाव करने का अवसर मिले तो कदापि अमरता का चयन न करना अन्यथा बहुत बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं। और यह अवसर कब मिल जाय इसकी कोई दिन-तारीख निश्चित नहीं है। यह मौका बुद्ध, महावीर, कबीर, रैदास जैसी महान आत्माओं को भी मिला था, लेकिन उन्होंने अमरता को नहीं चुना था, उन्होंनें संबोधि को चुना था, उन्होंने निर्वाण को चुना था। बुद्ध के जीवित रहते, बहुत दफे यह प्रश्न लोगों द्वारा पूछा गया कि मर्त्यु के बाद आप किस रूप में होंगे? किस योनि में होंगे? अमर होकर आप किस लोक-लोकांतर में भ्रमण करेंगें उस संबंध में कुछ समझायें। इस प्रश्न के उत्तर में बुद्ध सदा यही कहते थे कि मैं अब कहीं भी नहीं रहूंगा, जैसे 'दिया, बुझ जाने पर उसकी लौ खो जाती है, ऐसे ही मैं खो जाऊँगा, ऐसे ही खो जाने को भगवान बुद्ध ने निर्वाण कहा है, जो भी निर्वाण को उपलब्ध होता है वह दिए की लौ की भांति इस अनंत में खो जाता है।

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अमरता की घटना फलित होने पर क्या-क्या मुश्किलें होती हैं।

      अमर होने वाले लोगों के संबंध में या देवी-देवताओं के संबंध में जब भी हम ख्याल करते हैं तब हमारे जहन में सूक्ष्म शरीर या अशरीरी चेतना का ही विचार आता है।  भौतिक शरीर की अमरता के संबंध में हम कभी भी नहीं सोंच पाते हैं, इसलिए यह भलीभांति जान लें कि भौतिक शरीर अमर होने वाले शरीरों में नहीं है जो अमर होता है, जिसे अमरता का वरदान मिलता है वह सूक्ष्म शरीर है, और उस सूक्ष्म शरीर को इस भौतिक शरीर के प्रथक होने पर ही जाना जा सकता है। इस रहस्य का विस्तृत वर्णन लगभग सभी प्रमाणित धर्मग्रंथों व योगग्रंथों में किया गया है। और यह भी समझाया गया है कि यह स्थूल शरीर 'पंचमहाभूतों, से निर्मित है। मर्त्यु के समय में जल व पृथ्वी तत्व यहीं छूट जातें हैं और तीन तत्वों अग्नि, वायु, आकाश को लेकर सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से अलग हो जाता है।

      यह जो सूक्ष्म शरीर अलग हो गया है, यह सामान्यतः निष्क्रिय अवस्था में ही रहता है, यह चेतन अवस्था में नहीं रहता है। जो लोग अमर हो जाते हैं अथवा जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त हो जाता है ऐसे लोगों का सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर की भांति ही मर्त्यु के पश्चात भी सक्रिय और चेतन रहता है, इसलिए वे इस जगत के लोगों के साथ संवाद भी कर पाते हैं। निष्क्रिय अवस्था वाले सूक्ष्म शरीरों को एक सुविधा यह होती है कि उन्हें पुनः गर्भ धारण करने में कुछ विशेष कठिनाई नहीं झेलनी पड़ती। जबकि सक्रिय और चेतन अवस्था के सूक्ष्म शरीरों को पुनः गर्भ प्राप्त करने और जन्म लेने में बड़ी बाधाएं आती हैं। सूक्ष्म शरीर के संबंध में यह भी जान लेना जरूरी है कि उसकी आगे कोई गति नहीं है, वह सिर्फ उस योनि में रहने के लिए अमर है, आगे गति करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। और अमरता कोई मंजिल भी नहीं है सिर्फ एक सुविधा है, मंजिल तो निर्वाण ही है, मंजिल दिए का बुझ जाना ही है।

      आगे गति न होने के कारण, आगे मार्ग न होने के कारण प्रत्येक सूक्ष्म शरीर को गर्भ धारण करके इस पृथ्वी पर आना ही पड़ता है, जो सूक्ष्म शरीर अमर होते हैं, सक्रिय होते हैं, चेतन होते हैं उनकी मुश्किल यह होती है कि उस जगत में उनके लिए समय जैसा कोई भी मापदंड नहीं है। उस शरीर के सुखद अनुभवों में वे इतना लीन होते हैं कि उन्हें यह भी बोध नहीं रहता कि उन्हें पृथ्वी पर भी लौटना है। जब तक वहाँ उनके सुखद अनुभवों से मुक्ति मिलती है और बोध जागता है तब तक यहां पृथ्वी पर हजारों लाखों वर्ष व्यतीत हो चुके होते हैं और पृथ्वी का वातावरण भी बदल चुका होता है, मनुष्य की सभ्यता, संस्कृति और शारीरीरिक संरचना भी वैसी नहीं रहती, शरीर के तमाम रसायन भी परिवर्तित हो चुके होते हैं। इतने युग-युगांतर व्यतीत होने के बाद अगर कोई सूक्ष्म शरीर किसी गर्भ में प्रवेश पाना भी चाहे तो वह सहजता से नहीं पा पाता उसे बड़ी कठिनाई और पीड़ा होती है। लेकिन वह कठिनाई और पीड़ा हमारी समझ से परे है।

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      उस कठिनाई और पीड़ा को समझने के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा। हम सब जानते हैं कि हनुमानजी को वरदान प्राप्त है कि वे सदा अमर रहेंगें, लेकिन जब वे पृथ्वी पर मौजूद थे तब से लेकर अब तक इस पृथ्वी पर बहुत कुछ बदल गया है, ग्रहों व उपग्रहों की गति में भी अंतर पड़ गया है, और सबसे बड़ी बाधा यह है कि उनके 'डीएनए, से मिलते-जुलते सभी प्रांणी भी खो चुके हैं, इस स्थिति में यदि हम उन्हें इस पृथ्वी पर सशरीर आमंत्रित करना भी चाहें तो उनके लिए गर्भ खोजना बड़ा मुश्किल हो जायेगा। ऐसे अमर हुए जो भी सूक्ष्म शरीर हैं जो इस पृथ्वी पर पहले से ही भौतिक शरीर के साथ मौजूद थे उन्हें अवश्य ही इस पृथ्वी पर लौटना पड़ेगा, क्योंकि वह सूक्ष्म शरीर भी इसी भौतिक शरीर की ऊर्जा का संगठित परिणाम है, अर्थात बहुत गहरे में वह भौतिक ही है।




     

      
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