AAKHIR KYON SANKRACHARY KO. एक राजकुमार के मर्त शरीर में प्रवेश करना पड़ा था?

आखिर शंकराचार्य को क्यों अपना शरीर त्यागकर एक राजकुमार के मर्त शरीर में प्रवेश करना पड़ा था?

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      बहुत अल्प आयु में ही वेदों की व्याख्या करने वाले आदिगुरू शंकराचार्य जी से सभी परिचित हैं, उन्हें जगतगुरू शंकराचार्य भी कहा जाता है। वे उन सौभाग्यशाली लोगों में से थे, जिन्हें उगते हुए सूर्य में ही ढलते हुए सूर्य के दर्शन हो जाते हैं, जिन्हें जन्म की खुशी में ही मर्त्यु का दुख दिखाई पड़ जाता है। उन्होंने ही अद्वैतवाद व 'ब्रह्मं-सत्यमं, जगत- मिथ्या' जैसे सूत्र दिए हैं, जिनका मतलब है कि यह दिखाई पड़ने वाला संसार स्वप्नवत है, और ब्रह्मा ही एकमात्र सत्य है। 

     शंकराचार्य के समय में शास्त्रार्थ हुआ करते थे, वाद-संवाद हुआ करते थे, धर्म-चर्चाएं होती थीं। आज भी यह सब होता है लेकिन आज वह वैसा ही है जैसे सांप निकलता है तो एक लकीर छूट जाती फिर कुछ लोग उस लकीर को पीटते रहते हैं फिर उनके बच्चे पूछतें हैं, क्या करते हैं तो बताते हैं कि हम सांप को पीट रहें हैं, सांप तो कब का जा चुका। आज जो चर्चा होती है वह सिर्फ लकीर को पीटना है।

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     शास्त्रार्थ के मामले में शंकराचार्य से पार पाना बड़ा ही कठिन कार्य था, उन्होंने काशी के तमाम प्रसिद्ध विद्वानों को परास्त कर दिया था। तभी उन्हें मिथिला के एक व्यक्ति 'मंडन मिश्र, का ख्याल आया। वह व्यक्ति भी बहुत बड़ा शास्त्रों का ज्ञाता था और कई बड़े विद्वानों को परास्त कर चुका था। मंडन मिश्र से 'अद्वैतवाद' के विषय पर शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ जो कई दिनों तक चला। इस शास्त्रार्थ की मध्यस्थता मंडन मिश्र की पत्नी भारती मिश्र के द्वारा ही की गई। इस शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र परास्त हो गए, किंतु भारती इस पराजय को स्वीकार न कर पायी। वह शंकराचार्य को चुनौती देती हुई बोली कि अभी आपने आधे मंडन मिश्र को ही पराजित किया है, यदि इन्हें पूर्ण रूप से परास्त करना है तो मैं इनकी अर्धांगिनी हूँ, मुझे भी परास्त करना होगा, अन्यथा आप पराजय स्वीकार कर लें।

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     जब शंकराचार्य ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली, तब उसने अपनी रणनीति के अनुसार शंकराचार्य से 'काम-भोग, के विषय पर शास्त्रार्थ करने के लिए कहा क्योंकि यह सभी जानते थे कि शंकराचार्य बचपन से ही इस विषय से विरक्त हैं। परिणामस्वरूप काम-सबंधी प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए शंकराचार्य ने कुछ दिनों का समय मांगा। इन्हीं दिनों के अवधिकाल में वे अपने शरीर को छोड़कर एक राजकुमार के शरीर में प्रविष्ट हुए थे, उनके प्रविष्ट होते ही वह मर्त राजकुमार जी उठा था। करीब छ: महीनों तक वे उसी राजकुमार के शरीर में रहे और उसी महल में रहकर उन्होंने स्त्री और पुरुष के अतरंग संबधों के उत्तर प्राप्त किये, जिनसे उन्होंने भारती को पराजित किया।

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     लेकिन इस घटना से शंकराचार्य के शरीर को बहुत हानि भी पहुंची थी और तभी से वे अस्वस्थ भी रहने लगे थे। यह घटना उनके जीवन पर इतनी भारी पड़ी थी कि युवा-अवस्था में ही उनकी मर्त्यु हो गई। उनके स्थान पर पर यदि आज के शंकराचार्य होते तो यह जोखिम कदापि न उठाते, लेकिन आदि-शंकराचार्य जिस स्थिति में थे उस स्थिति में मर्त्यु का मूल्य सिर्फ झींक आने के बराबर ही होता है।

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