'ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या, 'simulation theory, यह जगत किसी महामूर्ख द्वारा गढ़ी एक कहानी है।

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जब मैं सड़क पर निकलता हूं, देखता हूँ, दौड़ते-भागते लोगों को, उनके चेहरे बड़े गंभीर दिखाई पड़ते हैं। एक सांझ मैंनें एक व्यक्ति से पूंछा भाई कहां भागे जा रहे हो बड़े गंभीर मालुम पड़ते हैं। 

          उसने कहा मैं अपने घर जा रहा हूँ। मैं हैरान हुआ, लोग इस जमीन को अपना घर समझे बैठे हैं और जो वास्तव में अपना घर है उसे भुलाए बैठे हैं। यह जमीन किसी का घर हो भी कैसे सकती है, यह तो एक मुसाफिर खाना है, यह एक 'वेटिंग रूम, एक प्रतिक्षालय है जैसे रेलवे स्टेशन पर होता है। हम जिसे रहना कहते हैं, वह रहना नहीं है। वह सिर्फ प्रतिक्षा है, वह सिर्फ इंतजार है। यमराज मर्त्यु की गाड़ी लेकर आता ही होगा और हमें चढ़ना होगा।

कबीर ने कहा है।
         रहना नहीं देशवा बिराना है। यह देश हमारा नहीं है, यह जीवन हमारा नहीं है। शायद हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है या यूं कहें हम स्वयं ही एक धोखा हैं। हम कहीं दूर के वासी हैं, हम किसी दूसरे ही लोक के मालिक हैं। हमारे दुख:, हमारी पीड़ाएं, हमारा संताप, हमारी बैचैनी, हमारा असंतोष छाती पीट-पीटकर गवाही दे रहा है कि हम वह नहीं जो हमें होना चाहिए। हमारा वह लोक हमें पुकारता है, हमें चिठ्ठियों पर चिठ्ठियां भेजता है, हमें संदेस दिए चला जाता है। लेकिन हम उसकी चिठ्ठियों को उसके संदेशों को भुलाए चले जाते हैं।

         अब तो विज्ञान भी इस बात से राजी होने लगा है, विज्ञान को भी शक होने लगा है। बुद्ध पुरूषों की वाणीं अब सत्य सिद्ध होने लगी है। अब सच्चाई प्रकट होने लगी है। अब सुगबुगाहट मिलने लगी है कि मनुष्य इस पृथ्वी का प्रांणी नहीं है वह किसी दूसरी ही दुनियां का मालुम पड़ता है लेकिन वह दूसरी दुनियां कहां है विज्ञान इसकी व्याख्या अभी स्पष्ट करने में असमर्थ है। लेकिन वैचारिक खोजबीनों एवं सैद्धांतिक उहापोहों और कुछ जैविक प्रमाणों से यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य इस ग्रह का मूल निवासी नहीं है।

          वे दलीलें, वे सिद्धांत क्या हैं जिनके बल पर जो बुद्ध पुरूष सदियों से समझाते आए हैं विज्ञान वह स्वीकार करने पर विवश हो गया है। विज्ञान की पहली दलील है कि पृथ्वी पर जितने भी जीव-जन्तु हैं उनकी सबकी अपनी-अपनी प्रजातियां हैं लेकिन मनुष्य इस पृथ्वी पर ऐसा अकेला प्राणीं है जिसकी कोई प्रजाति नहीं है। ऐसा कैसे संभव है? दूसरा तर्क भी है, पृथ्वी के वातावरण में प्रत्येक जीव स्यमं को बदलते मौसम के साथ ढाल लेता है जबकि मनुष्य के लिए कोई भी परिस्थिति, पृथ्वी का कोई भी मौसम अनुकूल नहीं है। उसे पृथ्वी का कोई भी वातावरण स्वीकार नहीं है। ऐसा क्यों है?

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         आदि शंकराचार्य का संपूर्ण जीवन 'ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या, इसी एक अनुभव की धुरी पर घूमता रहा और वे जीवन भर लोगों को यही समझाते भी रहे परंतु लोगों को नहीं समझाया जा सका। अब विज्ञान शंकराचार्य की बातों से सहमत हुआ प्रतीत होता है। विज्ञान की 'simulation theory, शंकराचार्य के ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या का ही परिष्कृत रूप है। जिसे समझना बहुत कठिन नहीं है। simulation theory के हिसाब से यह जगत किसी और के हाथों की कठपुतली है और मनुष्य होना एक भ्रामक अवस्था है। शंकराचार्य से किसी ने पूछा था इस जगत के बाबत, यह जगत क्या है उन्होंनें कहा था यह जगत किसी महामूर्ख द्वारा गढ़ी एक कहानी है।

         मनुष्य इस ग्रह का प्रांणी नहीं है यह तो तय हो गया है लेकिन वह कहां से आया, किस ग्रह, किस उपग्रह से आया है यह जानने के लिए आधुनिक विज्ञान बहुत गंभीरता से उत्सुक है। लेकिन वह जिस दिशा में मनुष्य का ठिकाना तलाश रहा है वह उसे मिल सकेगा यह कहना जरा मुश्किल है। वह अगर मिल भी जायेगा तो वह सिर्फ उसकी भौतिक देह का निर्माण स्थल ही होगा, जैसे अभी यह पृथ्वी है। वह उसका वास्तविक ठिकाना नहीं होगा।

        मनुष्य का वास्तविक ठिकाना, वास्तविक घर तो वही है जिसे कबीर ने कहा है! "सखी वह घर सबसे न्यारा, जहां पूरन पुरूष हमारा" उसी घर के लिए मीरा रोती है, उसी घर की तलाश है। वह जब-तक नहीं मिलेगा तब-तक यह दुख: नहीं कटेगा, तब-तक यह संताप, यह पीड़ा, यह बैचैनी, यह चिंता से छुटकारा असंभव है। इस जमीन पर बनाये हुए घरों की नींवों में हम कितने ही मोटे-मोटे सरिया क्यों न डालें सब व्यर्थ है। यह पृथ्वी भरोसे योग्य नहीं है, यह दलदल है, दलदल में आशियाने बनाना मूर्खतापूर्ण है।

        जीसस से किसी ने पूछा प्रभु तेरा घर कहां है, तू कहां से आता है तो जीसस ने उत्तर में कहा कि पृथ्वी पर सियार और लोमड़ियों के भांठ होते, गड्ढे होते हैं परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिए यहां घर नहीं है। घर सिर्फ उसी के लिए है जिसकी बुद्धि सियार और लोमड़ी से ज्यादा नहीं है। समझदार यहां रहते जरूर हैं लेकिन वे जानते हैं कि यह पृथ्वी हमारा घर नहीं है। और जो नहीं जानते उन्हें भी देर-सबेर इसका अहसास होने ही लगता है। जवानी में न सही बुढ़ापे में, सफलता में न सही असफलता में, चुनाव जीतने पर न सही, चुनाव हारने पर! इस मुसाफ़िर खाने के कर्मचारी जगाने लगते हैं, पानी के छींटे मारने लगते हैं। कफ, वात, पित्त और नाना प्रकार की बिमारियां हैं, वे सब कर्मचारी हैं वे इस बात का प्रमाण हैं कि यह सिर्फ सराय है। और अगर सराय नहीं है घर है तो हमारे घर में इन बिमारियों का क्या काम है भला! ये यहां नहीं होनी चाहिए।

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        सुना है हमारे देश में न बिमारियां हैं, न बुढ़ापा है, न त्रिदोष है, न मर्त्यु है, न दुख: है, न संताप है, न पीड़ा है, न असफलता है, वहां सिर्फ प्रेम है, सत्य है, आनंद है, शास्वता है। उसी के लिए रोती है मीरा, उसी के लिए बुद्ध भागे थे जंगल, उसी के लिए रमण ने अपनी गर्दन दबा ली थी, उसी के लिए महावीर नग्न हो गये थे, ये आंसू उसी के लिए बहते हैं। हम यहाँ हैं जरूर लेकिन यहाँ के वासी नहीं हैं हमारे आधार कार्ड पर दर्ज हमारे संबंध में जो भी जानकारी है वह झूठी है, उसे सत्य समझने की भूल मत करना। यह पृथ्वी एक प्लेटफार्म है, एक माध्यम है हमारे वास्तविक घर तक पहुंचा देने का एक जरिया है। यह घर नहीं है।

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