Samay yatra karne ke liye. समय यात्रा करने के लिए सूक्ष्म शरीर सबसे सटीक और भरोसेमंद माध्यम है।

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समय यात्रा करने के लिए सूक्ष्म शरीर सबसे सटीक और भरोसेमंद माध्यम है। जानिए कैसे? 

      सूक्ष्म शरीर इस भौतिक देह की तरह अभिव्यक्ति का विषय नहीं है। लेकिन कुछ साधनाओं एवं अभ्यासों के माध्यम से उसे अनुभूत किया जा सकता है। भारत में हजारों वर्षों से मनीषी और योगी सूक्ष्म शरीर पर काम करते आए हैं और इसके माध्यम से ब्रह्मांड के तमाम ऐसे रहस्यों को भी उजागर करते रहे हैं जिन्हें विज्ञान अभी भी ठीक से समझने में असमर्थ है।

      आधुनिक विज्ञान सूक्ष्म शरीर और 'एस्ट्रल ट्रैवलिंग, जैसे सिद्धांतों पर विश्वास नहीं करता था, लेकिन अंतरिक्ष की खोजबीनों ने आधुनिक विज्ञान को मनुष्य की सूक्ष्म शक्तियों पर भरोसा करने के लिए विवश कर दिया है। कुछ वैज्ञानिक बड़ी उत्सुकता से इस विषय की सत्यता को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने में संलग्न हैं और बहुत हद तक वे सफल भी हुए हैं। अभी तक पश्चिमी लोंगों में यह मान्यता थी कि यही शरीर सबकुछ है, इस शरीर की समाप्ति के बाद आत्मा जैसा कुछ भी नहीं शेष बचता है। किन्तु ऊर्जा की आधुनिक व्याख्याओं और सिद्धांतों ने इस मान्यता को धूमिल कर दिया है, अब यह मान्यता टूटती जा रही है, अब धीरे-धीरे पश्चिम भी सूक्ष्म शरीर और आत्मा के आस्तिव पर शक करने लगा है।

      वैज्ञानिकों के पास अब बाहर के जगत में खोजबीन करने के लिए बहुत कुछ शेष नहीं रह गया है। पदार्थ के टूटने के बाद, अब एक पूर्णविराम सा लग गया है। अब अधिकतर वैज्ञानिकों की उत्सुकता सूक्ष्म शरीर, आत्मा, एस्ट्रल ट्रैवलिंग, परकाया प्रवेश जैसे विषयों में अधिक है। किन्तु यह विषय बड़े जटिल हैं, जहां बाहरी जगत के विज्ञान को समझना प्रत्येक के लिए सुगम है वहां इस अंतरजगत के विज्ञान को समझना उतना ही कठिन है। इस जगत में ऐसी अनगिनत घटनाएँ घटती रहीं हैं जिन्हें जानने की जिज्ञासा प्रत्येक को होती है। लेकिन बिना किसी सटीक वैज्ञानिक व्याख्या के उन घटनाओं को नहीं समझा जा सका है।

सूक्ष्म शरीर से संबंधित जिज्ञासुओं की जिज्ञासा की शान्ति के लिए सूक्ष्म शरीर की कुछ संक्षिप्त जानकारी यहां प्रस्तुत है।


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      सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार के साथ-साथ ही पांच तन्मांत्रांएं, पांच क्रमेंद्रियां, तथा पांच ज्ञानद्रिंयां से मिलकर बना है। इनमें से मन, बुद्धि, अहंकार तथा पांच ज्ञानद्रिंयां ज्ञान शक्ति का प्रतीक हैं, और पांच तन्मांत्रांएं एवं पांच क्रमेंद्रियां, जैसे कान, स्पर्श, रूप, गंध, रस यह क्रमेंद्रियां हैं, इन्हीं क्रमेंद्रियों और ज्ञानद्रिंयों के इकठ्ठा गठजोड़ को सूक्ष्म शरीर समझ सकते हैं। यह दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे की परिपूरक हैं, एक के बिना दूसरे के आस्तिव की साधारण परिस्थितियों में कल्पना नहीं हो सकती, इसी वजह से साधारणत: यह सूक्ष्म शरीर हमारी पकड़ से बाहर रह जाता है। उसे हम आत्मा कहें, परमात्मा कहें, आस्तिव कहें या ऊर्जा कहें, वह सर्वव्यापी तत्व कहीं भी गति नहीं करता है और न ही यह स्थूल शरीर ही कहीं आता-जाता है। 

      आने-जाने और यात्रा करने का अनुभव सिर्फ सूक्ष्म शरीर को ही होता है और वह जो 'है, उसके यात्रा न करने का कारण एक यह भी है कि जब यह आस्तिव अनंत ही है तो यात्रा हो भी कैसे सकती है, क्योंकि सब यात्राएं किसी न किसी मंजिल की तरफ इशारा करतीं हैं, और अनंत में कोई मंजिल नहीं है, जहां मंजिल आ जाती हो उसे अनंत कहना भी व्यर्थ है। सूक्ष्म शरीर को यह अनुभव इसलिए होता है, क्योंकि वह सदा लक्ष्य के साथ बंधा  रहता है, उसकी मंजिल है, उसे कहीं पहुंचना है, उसके साथ वासनाएं हैं, कामनाएं हैं, कर्म हैं, संस्कार हैं उनकी पूर्ति करनी है। 

      जन्म-मरण के समस्त संस्कार, सारे अनुभव, सारी भावनाएं, सारा लेखा-जोखा इसी सूक्ष्म शरीर में संग्रहित रहता है, सूक्ष्म शरीर मनुष्य के समस्त संस्कारों एवं क्रियाकलापों का 'मस्तिष्क, है। लेकिन यह स्थूल देह पाने पर ही सक्रिय होता है अन्यथा यह निस्क्रिय ही रहता है, उसे छूना हो, उसे स्पर्श करना हो तो इस भौतिक शरीर को छूकर या स्पर्श करके ही किया जा सकता है अन्य कोई मार्ग नहीं है। 


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     आधुनिक विज्ञान चौथे आयाम और समय यात्रा को समझने में बहुत गंभीरता से उत्सुक है। लेकिन चौथे आयाम में प्रवेश करने के लिए या समय यात्रा में जाने के लिए कोई माध्यम नहीं मिल रहा है। विज्ञान की परिकल्पना के मुताबिक यदि ऐसा कोई वाहन या ऐसी कोई मशीन निर्मित हो सके जो प्रकाश की गति से भी ज्यादा गति से दौड़ सके तो समय में यात्रा संभव हो जायेगी, उस वाहन को ही उन्होंने 'टाईम मशीन, कहा है। सूक्ष्म शरीर के माध्यम से भारत के ऋषि, मुनियों, के अलावा दुनियां के और भी तमाम व्यक्ति समय यात्रा करते रहें हैं। और उनके माध्यम से तमाम जानकारियां भी प्राप्त हुई हैं, जो साधारणत: संभव नहीं थीं। आज भी ऐसे तमाम साक्ष्य और लोग मौजूद हैं जिनका दावा है कि वे समय यात्रा करते हैं। लंदन में, सन् 1921 में एक किताब प्रकाशित की गई थी, जिसका नाम था 'द प्रोजेक्शन आॅफ द एस्ट्रल बाॅडी, यह पुस्तक बहुत प्रसिद्ध हुई थी, यह दो लेखकों द्वारा लिखी गई थी। उनमें से एक थे, इंग्लैंड के कैरिंग्टन और एक थे अमेरिका के मुलडून इन दोनों लेखकों का दावा था कि वे अक्सर सूक्ष्म शरीरों के माध्यम से एस्ट्रल ट्रैवलिंग करते हैं। और वे कहते थे कि कोई भी इंसान इसे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर कर सकता है। 


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       कैरिंग्टन बताते हैं कि कुछ लोगों का सूक्ष्म शरीर अकस्मातिक ढंग से भी बाहर निकल जाता है और कुछ अपनी इच्छा से भी इसे बाहर निकाल लेते हैं। जिन लोगों का अकस्मातिक ढंग से सूक्ष्म शरीर बाहर निकल जाता है उसे वे 'अनैच्छिक प्रक्षेपण, कहते हैं और जो अपनी इच्छा से यह क्रिया करते हैं उसे उन्होंने 'ऐच्छिक प्रक्षेपण, कहा है। उनका यह भी कहना है कि गहरी नींद की अवस्था में सूक्ष्म शरीर भौतिक देह के ऊपर ही मंड़राता रहता है, वह एक रजत-रज्जु एक अत्यंत श्वेत धागे के साथ इस भौतिक शरीर की नाभि से जुड़ा रहता है जिससे प्राणवायु संचारित होती रहती है। 

       उन दोनों लेखकों ने अपनी बातों की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए अपनी सूक्ष्म शरीर की यात्राओं के संबंध में भी बताया है। कैरिंग्टन ने बताया है कि दस-बारह वर्ष की आयु से ही वे सूक्ष्म शरीर के माध्यम से यात्राएं करते आये हैं। उनके अनुभव के मुताबिक सूक्ष्म शरीर पहले शरीर के ऊपर गोलाकार घूमता है और फिर धीरे-धीरे ऊपर ऊठने लगता है, एक निश्चित सीमा पर जाकर यह स्वतंत्र हो जाता है और फिर अपनी इच्छा से यह कहीं भी घूम-फिर सकता है। और सूक्ष्म शरीर की इस यात्रा में न समय का बंधन है, न ही कोई यातायात के नियम हैं, पुलिस प्रशासन से भी कोई खतरा नहीं है, आप कहीं भी जाकर कुछ भी मजे से कर सकते हैं, अनुकूल परिस्थितियों के मिलने पर किसी मृत शरीर में भी प्रवेश कर सकते हैं, वहाँ भी कोई बाधा खड़ी करने वाला नहीं है।


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