Kundlini sakti kya hai? कुंडलिनी जागरण क्यों जरूरी है? कुंडलिनी जागरण के प्राथमिक संकेत क्या हैं?

कुंडलिनी शक्ति क्या? किन-किन व्यक्तियों में कुंडलिनी जागरण की संभावना अधिक होती है? कुंडलिनी जागरण क्यों जरूरी है? कुंडलिनी जागरण के प्राथमिक संकेत क्या हैं? 

https://www.paltuji.com
Practical life 
      इस जगत में जितने भी प्रतिभाशाली व्यक्ति हुए हैं, वे चाहे बुद्ध हों, महावीर हों, रामकृष्ण हों, या फिर हिटलर हो या स्टैलिन, गांधी हो या अंबेडकर, सभी की कुंडलिनी शक्ति जाग्रत थी। आप शायद सोंचते होंगे कि कुंडलिनी सिर्फ धार्मिक लोगों की जाग्रत होती है तो ऐसा नहीं है, कुंडलिनी का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, न ही पापी और गैर-पापी से मतलब है।

   दरअसल जीवन में रोटी, कपड़ा और मकान के अतिरिक्त कुछ भी जो महत्वपूर्ण है, उसे प्राप्त करना हो तो वगैर कुंडलिनी शक्ति जाग्रत हुए नहीं प्राप्त  किया जा सकता। साधारण ऊर्जा से हम सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान की ही पूर्ति कर पाते हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ सूझता भी नहीं है। लेकिन जब कुंडलिनी जाग्रत होती है तब यह रोटी, कपड़ा और मकान महत्वपूर्ण नहीं दिखाई पड़ता, फिर इनके लिए समय गंवाना पागलपन दिखाई पड़ता है और वे लोग भी पागल मालुम पड़ते हैं जो केवल रोटी, कपड़ा और मकान की ही पूर्ति में बड़ी गंभीरता से संघर्षरत हैं। और यह सारा जगत सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति में ही संलग्न है। गांव से लेकर शहर तक सिवाय मकान बनाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हो रहा है। और यह मालुम नहीं कि मकान कहां बना रहे हैं, यह पृथ्वी क्या है? कहां है? सिर्फ अंधों की भांति जुटे हैं। 

      कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होंने के बाद पहली दफे आंख खुलती है। व्यक्ति रोजमर्रा के विचारों से मुक्त होता है। फिर वह जिस क्षेत्र में भी, जो कुछ भी करता है, वह उसका किया हुआ अनूठा और अलग हो जाता है, फिर वह अगर हिंसा भी करता है तो वह भी साधारण नहीं होती, वह असाधारण होती है, फिर वह ऐसी लड़ाई भी नहीं करता जैसी हम करते हैं। उसका प्रेम भी असाधारण हो जाता है,अभी तो हमारा प्रेम भी झिझला है और झगड़ा भी कुंजड़ों जैसा है। अभी हमारी हिंसा भी व्यक्तिगत है और प्रेम भी व्यक्तिगत है। कुंडलिनी जागरण के बाद यह तल ही परिवर्तित हो जाता है, फिर न प्रेम व्यक्तिगत रहता है और न ही हिंसा, वह सब सामूहिक हो जाता है, उसका पैमाना बड़ा हो जाता है। हिटलर की हिंसा व्यक्तिगत नहीं है और कृष्ण का प्रेम भी व्यक्तिगत नहीं है। 

https://www.paltuji.com
Practical life 
कुंडलिनी जागरण के अनुभव:

      कुंडलिनी जागरण का सबसे पहला अनुभव यही होता है कि व्यक्तित्व पर खतरा मड़राने लगता है। कुंडलिनी व्यक्तिगत भावनाओं को मिटाती है, वह जाति, नाम, मजहब से मुक्त करती है, समाज से, स्थान से, समय से तोड़ती है। वह तत्काल तुम्हारे स्वाभाविक मार्ग पर ऊर्जा उड़ेलना प्रारंभ कर देती है। अगर किसी की कुंडलिनी तब जाग्रत हो जाती है जब उसका किसी से प्रेम वगैरह चल रहा हो तो बहुत संभावना है कि वह मंजनूं बन जाए, या प्रेम असफल होने पर मुजरिम बन जाए। उसकी निर्णय क्षमता और संकल्प क्षमता बहुत तीव्र हो जाती है। प्राथमिक दौर में प्रेम भावनाएं बहुत प्रगाढ़ हो जाती हैं, ममत्तव की कोई सीमा नहीं रहती, मोह जकड़ लेता है। क्रोध आने पर संपूर्ण जगत का नाश कर देने का विचार आता है, और प्रेम आने पर संपूर्ण जगत की पीड़ा दिखाई पड़ती है। 

      कुंडलिनी जागरण करना 'लिंग-परिवर्तन, कराने जैसी सर्जरी है। बिना अभ्यास के यह खतरनाक हो सकता है, वैसे तो यह कहा जाता कि यह प्रयोग किसी योग्य गुरु के सनिध्य में ही करना चाहिए। लेकिन मैं इसे आवश्यक नहीं मानता, क्योंकि योग्य गुरू का मिलना आजकल गूलर के फूल जैसा है, कहाँ खोजेंगे? और यदि मिल भी जायेगा तो कौंन निर्णय करेगा कि यही योग्य गुरु है। इसलिए गुरू की फिक्र में न पड़े, अपनी संभावनाओं को साक्षी मानकर प्रयोग शुरूं करें। 

https://www.paltuji.com
Practical life 
"सदा नगांरा कूच का, बाजै आठो धाम! 
रहिमन यह जग आइके, को करि रहा मुकाम"!! 

      जब कुंडलिनी जाग्रत होगी तभी यह रहिमन का सूत्र भी समझ में आयेगा। तभी जगत का आसार दिखाई देगा, तभी सौंदर्य की क्षण-भंगुरता का बोध होगा। तब भीतर से जानोगो कि यहाँ रहना नहीं है, यह घर-द्वार सब माया है। अभी तो सब उल्टा है, अभी सिर्फ बाहर-बाहर ही दोहराते हैं, एक-दूसरे से बातचीत करते हैं कि यह जग माया है, यहां तो सभी की मर्त्यु निश्चित है लेकिन भीतर हम जानते हैं कि माया कुछ भी नहीं है, सब जगह-जमीन अपनी ही है। एक-एक इंच जमीन के लिए लोग एक-दूसरे के गले काट रहे हैं और बाहर यह भी कहते हैं कि जग माया है। 

      कुंडलिनी जागरण के बाद यह दोगलापन न चलेगा फिर तुम्हारी कथनी और करनी में एक सामंजस्य होगा, एक बल होगा, तुम्हारे संकल्प का मूल्य होगा, फिर उतना ही बोलोगे जितना जरूरी होगा, फिजूल की बकवास फिर न कर सकोगे! और न फिजूल लोगों का संग-साथ ही कर सकोगे, क्योंकि अब तुम स्वयं के ही संगी हो, स्यमं के ही साथी हो, इसलिए मित्र भी छूटेंगें, रिश्ते-नाते भी टूटेंगें, कुंडलिनी जाग्रत करनी हो तो इस सब की तैयारी जुटा लेना, इस सब के लिए राजी हो जाना अन्यथा मुश्किल हो सकती है। इस विषय के संबंध में हम आगे और जानेंगे......! 

अगला भाग पढ़ने के लिए इस पट्टी पर क्लिक करें!  https://www.paltuji.com/2018/11/kundlini-jagran-bhaag-2.html?m=1

https://www.paltuji.com
Practice life

https://www.paltuji.com

      
Previous
Next Post »