Janiye suksam sareer ke kuch yese rahasy. जानिए! सूक्ष्म शरीर के कुछ ऐसे गूंण रहस्य जिन्हें आपने कभी नहीं जाना!

जानिए! सूक्ष्म शरीर के कुछ ऐसे गूंण रहस्य जिन्हें आपने कभी नहीं जाना! और यह भी जानिए कि अंगदान करना है कितना उचित? धर्मग्रंथों में क्यों की गयी है सन्मार्ग की चर्चा?

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     आस्तिव में जो कुछ भी स्थूल है, उसका एक सूक्ष्म रूप भी है। वही सूक्ष्म रूप, वही सूक्ष्म शरीर इस स्थूल जगत का कारक है। उस सूक्ष्म शरीर के पास ही इस भौतिक देह को निर्मित करने की निर्माणकारी शक्ति है, कहना चाहिए उसी के पास वह समाग्री होती है जिससे यह स्थूल शरीर बनता है। सभी प्रकार के सूक्ष्म शरीरों में इस निर्माणकारी शक्ति का बलाबल समान नहीं होता है। इसका बल किसी-किसी सूक्ष्म शरीर में बहुत अधिक मात्रा में होता है और किसी-किसी में यह बहुत अल्प मात्रा में होता है। यह जो सूक्ष्म शरीरों की निर्माणकारी शक्ति है, यह अधिकांश मनुष्यों में पुष्ट भी नहीं होती और न स्वास्थ होती है, अर्थात यह अस्वस्थ और बलहीन होती है,

      जिस व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर की निर्माणकारी शक्ति जितनी पुष्ट और स्वस्थ होती है वह उतना ही पुष्ट और स्वस्थ स्थूल देह निर्मित कर पाती है। पुष्ट और स्वस्थ निर्माणकारी शक्ति से भरे सूक्ष्म शरीर, जिस भौतिक शरीर को निर्मित करते हैं वह स्वस्थ एवं पुष्ट तो होता ही है और साथ-साथ ही वह धर्मी, पराक्रमी, और जीवों पर दया करने वाला भी होता है। इसके विपरीत जिसके सूक्ष्म शरीर के पास निर्माणकारी शक्ति का अभाव होता है या अस्वस्थ व बलहीन होती है, ऐसा सूक्ष्म शरीर जिस देह को बनाता है वह अस्वस्थ, बिमार और अनाकर्षक होती है, उसकी देह के अंग भी ठीक प्रकार से निर्मित नहीं हो पाते। यह जो कुछ मनुष्य जन्म से ही अंग-रहित पैदा होते हैं, या जो जन्मजात असाध्य रोगों को लेकर उत्पन्न होते हैं, उनका कारण यही निर्माणकारी शक्ति का अस्वस्थ व अपुष्ट होना ही होता है।

      यह जो हमारे सूक्ष्म शरीरों की निर्माणकारी शक्ति है, इसका बल कैसे खोता है, इसका पतन कैसे होता है, यह कैसे अस्वस्थ और बिमार होती है, अगर इसका ठीक-ठीक पता हो तो तमाम प्रकार के असाध्य रोगों से  निजात पायी जा सकती है। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि बहुत कम लोग ही इस विज्ञान से परिचित हैं। जबकि यह ज्ञान प्रत्येक के लिए जानना अनिवार्य है, क्योंकि इसकी जानकारी के अभाव में ही पाप होता है, अधर्म होता है, हिंसा होती है। अहिंसा परमोधर्मा, अहिंसा परमोधर्मा ऐसा शोरगुल मचाने से अहिंसा फलित नहीं होती, यदि ऐसा होता तो यह कब का हो चुका होता। क्योंकि दुनियां के सभी धर्म सदियों से इसी का प्रचार कर रहे हैं।

यह जो सूक्ष्म शरीरों की निर्माणकारी शक्ति है, इसका पतन कैसे होता है? कैसे यह अपना बल खोती है, जिसके कारण यह स्वस्थ व स्थूल शरीर नहीं बना पाती!

      जैसा अभी आपने जाना कि आस्तिव में जो कुछ भी स्थूल है, उसका एक सूक्ष्म रूप भी है। वही सूक्ष्म रूप, वही सूक्ष्म शरीर इस स्थूल जगत का कारक है। अब यह जो मैं कह रहा हूँ यह समझना जरा मुश्किल है। इसे ऐसा समझे कि जब यह स्थूल देह छूटती है तभी वह सूक्ष्म शरीर बनता है, और वह जो सूक्ष्म शरीर बनता है वह इसी भौतिक देह का ही प्रतिरूप होता है। अर्थात इसी स्थूल शरीर की 'स्कैनिंग कापी, होती है। समझ लो यदि आपका स्थूल शरीर अंगरहित, अस्वस्थ  अथवा रोगग्रस्त है तो वह जो मर्त्यु के उपरांत सूक्ष्म शरीर निर्मित होगा वह भी अंगहीन, अस्वस्थ व रोगग्रस्त ही निर्मित होगा। लेकिन अभी इस सूक्ष्म शरीर के नकारात्मक प्रभाव पता नहीं चलेंगे, यह पता तब चलेंगे जब यह किसी नए शरीर को ग्रहण करेगा। क्योंकि नया शरीर सूक्ष्म शरीर की 'स्कैनिंग कापी, होता है और यह क्रिया चक्र की भांति चलती रहती है 'संसार-चक्र, इसी क्रिया का प्रतीक है।

      शायद आपके ख्याल में नहीं है कि दुनियां में जितने भी धर्म हैं, उन सभी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा है, उन्होंने यही समझाया है कि किसी का अहित न करो, हिंसा न करो, जीवों पर दया करो। यह जो समझाया गया है, यह अकारण नहीं है। यह और बात है कि इससे लोग अहिंसक नहीं हूए। लेकिन उनके समझने के पीछे जो विज्ञान है वह यही है कि जितना आप इस देह से, इस शरीर से दूसरों का अहित करोगो, दूसरों की पीड़ा बढ़ाओगे, दूसरों को कष्ट पहुंचाओगे उतना ही आपके मरणोपरांत जो आपका सूक्ष्म शरीर होगा वह अस्वस्थ और अपुष्ट ही निर्मित होगा जो आपके अगले नए शरीर के लिए बाधक बनेगा।

      धर्मीं लोगों द्वारा सदा ही बुराई का मार्ग त्याग-कर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दी जाती रही है। वह भी इसीलिए दी जाती है। जब आप सन्मार्ग पर चलते हुए जीवन का निर्वहन करते हैं, जब आप दूसरों को पीड़ा व कष्ट देने से बचते हैं, तब आपकी मर्त्यु के पश्चात आपका जो सूक्ष्म शरीर बनता है वह बहुत ही स्वस्थ और पुष्ट बनता है। वह आगे की गति में जिस गर्भ में भी प्रवेश करके एक स्थूल देह की रचना करेगा, वह स्थूल देह सब भांति स्वास्थ्य-संपन्न होगी, उसके सभी अंग ठीक प्रकार से कार्य करने में कुशल होंगे।

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इस बात के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ भी हैं।

      समझ लो! जब आप दाहिने हांथ से किसी को चोट पहुंचाते हैं, जोकि उचित नहीं है। तब तत्क्षण ही आपके दाहिने हांथ की ऊर्जा में व्यवधान पैदा हो जात है और वह अस्त-व्यस्त हो जाती है। जब आप क्रोध में भरकर किसी को अपशब्द कहतें हैं तब आपके सारे शरीर में क्रोध की ग्रंथियां अपना जहर उगल देती हैं। और शरीर में जहां-जहां ऐसे व्यवधान, ऐसी ग्रंथियां सक्रिय हो चुकी हैं वहां-वहां के अंगों की निर्माणकारी शक्ति निर्बल हो जाती है। फिर जब मर्त्यु के समय में, या उसके कुछ घड़ी बाद यह निर्माणकारी शक्ति सूक्ष्म शरीर का गठन करेगी तब यह व्यवधान और ग्रंथियों के स्थान भी अस्वस्थ और निर्बल हो जायेंगें। 

      इस जगत के संबंध में कुछ सत्य ऐसे भी हैं जोकि जैसे वे हैं यदि उन्हें वैसा ही प्रस्तुत कर दिया जाए तो यह जो मनुष्यों द्वारा निर्मित ढांचा है यह सारा का सारा अस्त-व्यस्त हो जाएगा। अब यह जो मैं कह रहा हूँ, अगर इसकी 'थ्योरी, को और गहराई से समझें तो यह जो हम अंगदान करते हैं, यह करते तो सेवाभाव एवं दूसरों के भले के लिए हैं। लेकिन यह कौंन प्रमाणित करेगा कि जो अंग आपने मर्त्यु से पहले अपने शरीर से अलग करवा दिया उससे आपका कोई नुकसान नहीं होगा। जबकि यह वैज्ञानिक ढंग से भी सिद्ध हो चुका है कि यह शरीर ही अंतिम शरीर नहीं है, यह यात्रा ही कोई अंतिम यात्रा नहीं है, इसके बाद भी सूक्ष्म शरीर है, जो एक नई यात्रा पर निकलेगा, उसके बाबत हम कुछ भी नहीं विचार करते।

टिप्पणी:-

      आज दुनियां में जितने नेत्रहीन लोगों की संख्या है उतनी तब नहीं थी जब नेत्रदान का कोई उपाय न था। कोई नहीं जानता कि मर्त्यु के पूर्व ही जब हमारे शरीर का कोई अंग निकल जाता है, तब वह जो निर्माणकारी शक्ति  है या आत्मा है या परमात्मा है उसके द्वारा कैसे एक स्वस्थ्य सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है। कोई नहीं जानता कि जो लोग जन्म से ही अंगहीन पैदा होते हैं उनका जैविकी के अलावा भी कोई अन्य कारण है। कोई नहीं जानता कि दुनियां में हिंसा की इतनी हिंसात्मक व्याख्या क्यों है।

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