Devi aur devtavon ko parsann karne ke liye. देवी और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जरुरी नहीं बलि देना।

क्या देवी और देवताओं को प्रसन्न करने लिए बलि देना जरूरी है? क्या देवी और देवताओं में बुद्धि नहीं होती है जो तमाम निरीह बेजुबानो की हत्याएँ करवाते हैं।

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प्रैक्टिकल 
     जिसे हम बुद्धि या बुद्धिमत्ता कहते हैं, उसकी पहुंच बहुत दूर तक नहीं है। हमारी बुद्धि भी भौतिक ही होती है, यदि कोई यह समझता है कि मर्त्यु के बाद यह सोंच-विचार करने वाली बुद्धि भी संग-साथ रहेगी तो वह समझ गलत है। देवता हो या मनुष्य प्राकृति के नियमों का सभी के ऊपर समान प्रभाव पड़ता है, प्राकृति किसी से भेद-भाव नहीं करती, प्राकृति की मंडी में सभी का एक ही भाव लगाया जाता है, राजा हो या रंक वहां सब एक ही दाम में बिकते हैं।

    जो प्रकृति से निर्मित है, जिसमें भी भौतिकता की गंध है, जिसमें भी मिट्टी की मिलावट है वह सब प्राकृति के पास ही छूट जाता है। बुद्धि भी यहीं छूट जाती है, मन स्यमं को संत्तावना देने के लिए यह सोंच सकता है कि हम वहाँ भी सोंच-विचार कर सकेंगे, लेकिन यह साधारणत: संभव नहीं है क्योंकि यह मन भी भौतिक है, यह भी बहुत दूर तक साथ नहीं जाने वाला है।

अगर मन भी नहीं, बुद्धि भी नहीं तो फिर मरने के बाद क्या होगा? कौंन सा तत्व संग-साथ जायेगा?

    मर्त्यु के समय में 'भाव, के बाद जितने भी तत्व विकसित होंते हैं वे सभी इसी शरीर के विदा होने के साथ ही विदा हो जाते हैं, लेकिन जो हमारी भावनाएं हैं वे मर्त्यु के बाद भी हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ यात्रा करती हैं, जन्म के समय में भावनाएं ही हमारे साथ होती हैं और मर्त्यु में भी भावनाएं ही हमारे सांथ जाती हैं। और यह नियम उनके ऊपर भी लागू होता है जिन्हें हम देवी या देवता कहते हैं।

    आप सदा ही यह कारण खोजते होंगे कि देवी-देवता 'बलि, देने व स्तुति करने पर क्यों प्रश्न होते हैं? उसका भी कारण यही है कि वे यह विचार ही नहीं कर पाते कि क्या पाप है? क्या पाप नहीं है? किससे कल्याण होगा? किससे कल्याण नहीं होगा। वे सिर्फ भावनाओं को ही पकड़ पाते हैं। इसलिए आप हैरान होंगें जानकर कि पापी से पापी मनुष्य भी देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं और शायद शीघ्रता से कर लेते हैं। क्योंकि पापी जितनी प्रबल भावना से स्तुति कर पाता है, गिड़गिड़ा पाता है, उतनी प्रबल भावना से जो पापी नहीं है वह कभी नहीं गिड़गिड़ा पाता।


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practical life 


    और इससे कभी-कभी आशीर्वाद देने वाले भगवानों  को भी अड़चन हो जाती है। आपने सुनी होगी 'भस्मासुर, की कथा, वह दानव था, राछस था, लेकिन उसने शिव से वरदान प्राप्त कर लिया। वह वरदान भी कोई साधारण नहीं था, वह वरदान यह था कि भस्मासुर जिसके भी 'सर, पर हांथ रखेगा वह भस्म हो जायेगा, राख हो जायेगा। स्वभावत: उसने शिव को ही समाप्त करने की योजना बना डाली, वह शिव को समाप्त करके देवी पार्वती को हासिल करना चाहता था।

    लेकिन जब गलत भावना लेकर शिव की तरफ दौड़ा तो शिव उससे बचने के लिए भाग खड़े हुए, वे कब तक भागे, कहां तक भागे शास्त्रों में इसका कोई उल्लेख नहीं है। अंतत: विष्णुजी ने बड़ी मुश्किल से भस्मासुर पर नियंत्रण पाया, वे मोहिनी का रूप बनाकर उसके सामने आये और उसे अपना एक हांथ कमर पर और एक हांथ सिर पर रखकर नाचने के लिए कहा, और यह तो हम सभी का अनुभव है कि यदि कोई मोहिनी विष भी पीने के लिए कहे तो उस पर भी जल्दी कोई सवाल नहीं उठता, और इस तरह भस्मासुर अपने ही सिर पर हांथ रखकर समाप्त हो गया।

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   अब जो शिव भक्त हैं वे कहेंगे यह तो उनका भोलापन है, वे सभी को आशीर्वाद देते हैं, चाहे पापी हो, चाहे पापी न हो जो उनके दरबार में जाता है, खाली हांथ नहीं आता, और उनका नाम भी भोला है। तो मैं कहूंगा कि 'भोला, शब्द भी बुद्धि की अनुपस्थिति में ही प्रयुक्त होता है। जिसके पास बुद्धि है उसे भोला कहना व्यर्थ है, जब छोटा बच्चा प्रेम से मांगने पर अपना खिलौना दे देता है तब हम कहते हैं, बेचारा भोला है! क्योंकि वह भाव को जानता है आपकी नियति का उसे कुछ भी पता नहीं है।

     जब मैं कहता हूँ कि देवी-देवताओं में बुद्धि नहीं होती, तब मैं उनका अनादर या अपमान कर रहा हूं ऐसा नहीं है। तब मैं यही कह रहा हूँ कि वे बच्चे की भांति हैं, उन्हें तुम्हारी मंशा का, तुम्हारी नियति का कुछ पता नहीं है, वे सिर्फ तुम्हारी भावनाएं पकड़ते हैं और इसीलिए वे सभी को आशीर्वाद भी दे पाते हैं, बुद्धि के भीतर कभी सर्वमंगल की कामना नहीं होती, बुद्धि अगर देती भी है तो पच्चीस दफे सोंच-विचार करती है।

    इसलिए यदि हम चाहें तो बिना पशुओं का कत्ल करे ही, बिना किसी की बलि चढ़ाए ही देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, इसमें कोई अड़चन नहीं है और न ही धर्म के नाम पर इतना हो-हल्ला करने की जरूरत है। सिर्फ यह भाव कि परमात्मा मेरा भला करे, पर्याप्त है, आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। 

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