"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"

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"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"

     जैसे हम कपडे़ पुराने हो जाने पर, फट जाने पर, उन्हें पहनना छोड़ देते हैं। ठीक उसी प्रकार यह शरीर पुराना हो जाने पर, बूढ़ा हो जाने पर, काम का न रह जाने पर आत्मा इसे छोड़ देती है।

     पहले तो गीता के संबंध में यह जान लें कि कृष्ण के द्वारा गीता में जो कुछ भी कहा गया है वह सब आत्मा के संबंध कहा गया है, मनुष्य के संबंध में नहीं। जीर्ण-शीर्ण हुए कपड़ों की भांति आत्मा इस देह को त्याग देती है, त्याग देती है, स्वेच्छा से, छोड़ देती है। इसमें उसे कोई पीड़ा या कष्ट नहीं होता है, इस प्रक्रिया को आत्मा का निर्णय भी कह सकते हैं। मनुष्य आत्मा के ठीक विपरीत खड़ा है। आत्मा के लिए जो सहज और स्वाभाविक है वही मनुष्य के लिए अस्वाभाविक व असंभव मालुम पड़ता है। मनुष्य व आत्मा एक दूसरे के विपरीत हैं, मनुष्य और आत्मा में बड़ा गहरा विरोधाभास है।

     जीर्ण-शीर्ण हुए शरीर को त्याग देना आत्मा के लिए बड़ा स्वभाविक मामला है, इससे आत्मा को कोई अड़चन नहीं होती। लेकिन मनुष्य के लिए यह बड़ा कठिन काम है, मनुष्य शरीर तो क्या एक अंग भी स्वेच्छा से, छोड़ने के लिए राजी नहीं होता। उसका शरीर कितना ही जरा-जीर्ण हो जाए, जर्जर हो जाए, कितना ही बड़ा रोगी हो जाय, देह में घाव हों जांए, चल-फिर भी न पाये फिर भी शरीर से चिपका रहता है। उसे छोड़ने का कोई ख्याल उसके भीतर उठता ही नहीं। अगर उठता भी है तो यही उठता है कि किसी तरह दवाई-दरमत करके इस शरीर को ठीक कर लिया जाय।

आत्मा और मनुष्य के बीच यह विरोधाभास क्यों है?

     यह हमारे ख्याल में नहीं है शायद! यह जो मनुष्य है यह आत्मा नहीं है। यह 'मन, है! मन निर्मित होता है वासनाओं से, कामनाओं से, इच्छाओं से, मनुष्य होना मन से संबंधित है आत्मा से नहीं। मन यानी 'मै, और यह 'मैं, सदियों से इसी भ्रम में जिए जा रहा है कि वह आत्मा है। कृष्ण भी अर्जुन को यही समझाये चले जाते हैं कि तू अमर है, अविनाशी है, तू पहले भी था आगे भी होगा। कृष्ण के द्वारा अर्जुन को यह कहना कि तू अमर है, अविनाशी है। यह सिर्फ आत्मा के प्रति अर्जुन के मन में आकर्षण पैदा करने के लिए कहा गया है। यह केवल आत्मा के प्रचार के लिए है, प्रचार में सदा चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। धर्म के संबंध में घूम-घूमकर जो लोग समझाते हैं उन्हें धर्म प्रचारक कहा जाता है।


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     कृष्ण आत्म प्रचारक हैं, वे अर्जुन को आत्मा की खूबियां बताते हैं। वे समझाते हैं आत्मा को जान लेने से क्या-क्या फायदे हैं। वे इस नश्वर शरीर की खामियों को भी गिनाते हैं। वे कहते जरूर हैं कि तू अमर है, अविनाशी है लेकिन कृष्ण यह भलीभांति जानते हैं कि अर्जुन कोई अजर, अमर, अविनाशी नहीं है। फिर भी उनके द्वारा ऐसी बातें कही गईं। वे सिर्फ इसलिए कि अर्जुन तो नहीं है अजन्मा, अविनाशी और न ही वह कभी जान सकेगा कि वह अजन्मा, अविनाशी है लेकिन इन वक्तव्यों को सुनकर वह उस तत्व को अवश्य ही जानना चाहेगा जो अजन्मा है, अविनाशी है जिसका न जन्म है, न मर्त्यु है। इसी उद्देश्य से गीता में ऐसे बहुत से वचनों को कहा गया है जोकि सत्य नहीं हैं और जो सत्य नहीं हैं हम उन्हें ही सत्य माने बैठे हैं।

     गीता में जो कुछ भी कहा गया है वह सब आत्म-केंद्रित है, वह सब आत्मा के संबंध में है। वह हमारे 'मैं, के संबंध में नहीं है। मैं तो मरेगा ही, उसे बचाया नहीं जा सकता और न ही इन जरा-जीर्ण वस्त्रों को ही नया किया जा सकता है। 'क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी, के लिए भी इन वस्त्रों को नया कर पाना एक सपने जैसा है। पुराने वस्त्रों की भांति आत्मा इस देह को छोड़ देती है। आत्मा के लिए यह बड़ी साधारण सी घटना है। हमारी भूल यह है कि जब हम सुनते हैं कि आत्मा अमर है, अविनाशी है तो हम समझ लेते हैं कि हम ही हैं आत्मा, हम अमर हैं, हमारी तो कोई मर्त्यु है नहीं, हम नित-नूतन हैं, हम तो सत्य-सनातन हैं।

     बस यहीं से भटकाव की धारा बहनी प्रारंभ हो जाती है। फिर यह सिलसिला अनंतकाल तक चलता रहता है। और मनुष्य स्वयं को आत्मा मानकर जिए चला जाता है लेकिन इस मानने से वह आत्मा नहीं हो जाता और न ही वह अपनी इच्छा से इस देह को ही त्याग पाता है। यह जो कृष्ण ने कहा है कि जरा-जीर्ण हुए वस्त्रों की भांति आत्मा शरीरों को त्याग देती है। यह तो एक उदाहरण है, यह सिर्फ सूचक है, यह सिर्फ यह समझाने की कोशिश है कि आत्मा के लिए मर्त्यु कोई गंभीरता का मसला नहीं है, वह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है, उससे कोई आत्मा की हानि नहीं होती।

हानि हमारी होती है, मरते हम हैं, मिटते हम हैं, बर्बाद हम होते हैं। क्योंकि हम अजर, अमर, अविनाशी नहीं हैं हम मरणधर्मा हैं। और हम निश्चित ही मरने वाले हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि किसी की मर्त्यु पर रोओ मत, छाती न पीटो यह न कहो कि बेचारा मर गया। यह उस मरने वाले का अपमान है। बेचारा मर गया, यह कहने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो न भी मरता हो, जिसके लिए मर्त्यु समाप्त हो गई हो, जो बुद्ध हो गया हो, जिसके भीतर यह क्षमता उपलब्ध हो गयी हो कि वह जरा-जीर्ण होने पर वस्त्रों की भांति इस देह को त्याग दे।


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"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"

     जैसे हम कपडे़ पुराने हो जाने पर, फट जाने पर, उन्हें पहनना छोड़ देते हैं। ठीक उसी प्रकार यह शरीर पुराना हो जाने पर, बूढ़ा हो जाने पर, काम का न रह जाने पर आत्मा इसे छोड़ देती है। श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक मनुष्य के लिए एक कसौटी है। मैं आत्मा हूँ अथवा आत्मा नहीं हूँ! यह इस कसौटी पर परखा जा सकता है। और अपने भ्रम को तोड़ा जा सकता है।


   
   

         
          
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