अगर घर में है छोटा बच्चा तो यह आपको अवश्य ही जानना चाहिए।

इस अध्याय में हम जानेंगे! नजर दोष क्या है? नजर किसकी खराब होती है? क्या दुधमुंहे बच्चों को लग जाती है नजर? नजर लगने के क्या हैं कारण? नजर से कैसे होता है नुकसान?

     इस संबंध में दो-तीन बातें समझ लेनी आवश्यक हैं। दुनियां भर के कवियों ने, गीतकारों ने, कहानीकारों ने अपनी कविताओं में, अपने गीतों में, अपनी कहानियों में नजर को 'तीर, कहकर भी संबोधित किया है। उनका मानना है कि वार और प्रहार सिर्फ तीर और तलवारों से ही नहीं होता है, नजरों से भी होता है। और शायद तीर व तलवारों से किया हुआ 'वार, उतना घातक नहीं है जितना नजरों से किया हुआ है। दूसरी बात जिसके द्वारा नजर से वार होता है उसके खिलाफ कुछ किया भी नहीं जा सकता। क्योंकि आपको पता ही नहीं चलता कि हमलावर कौंन है? ठीक से समझें तो यह भी एक क्राइम है, एक जुर्म है। लेकिन दुनियां की किसी भी अदालत में इस तरह के मुजरिम के लिए कोई किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।

वैज्ञानिक अर्थों में नजर दोष क्या है?

      कुछ पेड़-पौधों, के फल अथवा फूल इतने कोमल होते हैं कि सिर्फ उनकी तरफ उंगली उठाने मात्र से ही उनके भीतर बहती प्राण ऊर्जा तिरोहित हो जाती है और वे मुरझा जाते हैं। यह बड़ी विचारणीय बात है कि इंसानों की उंगलियों में ऐसा क्या है जो वर्क्षों के फल-फूलों के लिए प्राणघातक सिद्ध हो जाता है।

"हिंया कुम्हाण कोउ बतिया नाहीं! 
जे तर्जनी देखि मरि जाहीं"!! 
भावार्थ:- मैं कोई कुम्हाण की बतिया की तरह नाजुक नहीं हूँ जो सिर्फ उंगली देखने से ही मुरझा जाती है। 

      कुम्हाण एक बेल-वर्क्ष  जैसा पौधा है कहते हैं! यदि कोई इंसान उसकी तरफ उंगली करके इशारा करे तो इससे उसकी 'फली, मुरझा जाती है, उसके भीतर की प्राणवायु सूख जाती है। कुछ पक्षियों के अंडे भी ऐसे ही होते हैं जो सिर्फ इंसान की नजर पड़ने से ही दूषित हो जाते हैं और उनके भीतर जीवन की संभावना समाप्त हो जाती है। और वे अंडे बेकार हो जाते हैं और फिर उन अंडों से कभी भी बच्चे पैदा नहीं हो पाते। इसलिए ऐसे पक्षी बहुत संवेदनशील होते हैं वे ऐसे स्थानों को, ऐसे वर्क्षों को घोसला बनाने के लिए चुनते हैं जो इंसानों की पहुंच से दूर होते हैं।

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यह सब होता कैसे है।

    इंसानों के ऊपर हूए वैज्ञानिक अनुसंधानों व खोजों से यह पता चला है कि इंसानों की अंगलियों और आंखों में ही सबसे अधिक ऊर्जा का प्रवाह होता है। वह अपने जीवन की पचास फीसदी से भी अधिक ऊर्जा का खर्च अपने हाथों व आंखों के माध्यम से ही करता है। जैसे पदार्थ के छोटे से छोटे कण से प्रतिपल ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है ठीक वैसे ही हमारी आंखों से भी प्रतिपल ऊर्जा बाहर फिंकती रहती है। कई दफे इस ऊर्जा का प्रवाह इतना अधिक हो जाता है कि सामने वाले के लिए यह नुकसानदेह बन जाता है। चौथे डायमेंसन में, या कहें चौथी दुनियां में या कहें काली दुनियां में जीने वाले अथवा काम करने वाले लोग इसी ऊर्जा का उपयोग करते हैं। तंत्र-मंत्र और जादू-टोने से जुड़ी समस्त साधनाओं में इसी ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है।

     त्राटक सिद्ध साधना का साधक अपनी द्रष्टि से ही वह सब कर पाता है जो सामान्यतः भौतिक जगत के लिए असंभव मालुम पड़ता है। यह जो सामने बिजली का बोड है अगर मुझे इसका बटन दबाकर बल्ब जलाना है तो मुझे उठकर उस बोड तक जाना पड़ेगा और बटन दबाना पड़ेगा तभी यह बल्ब जल सकेगा। लेकिन यह बल्ब आंखों की ऊर्जा से भी जलाया जा सकता है, यह बटन बिना बिजली के बोर्ड को छुए ही दबाया जा सकता है इसमें बहुत ज्यादा कठिनाई नहीं है।

      रूस में एक लड़की थी 'Nelya Mikhailova, कभी-कभी उसकी आंखों से इतनी अधिक मात्रा में ऊर्जा प्रवाहित होती थी कि उससे घर में, किचन में रखा समान भी इधर-उधर सरकने लगता था। इससे वह बहुत परेशान भी थी। बाद में तो परेशानी इतनी बढ़ गई कि उसे एक गंभीर और खतरनाक बिमारी समझा जाने लगा और उसका इलाज शुरूं करवाना पड़ा। डाक्टर सरजेव ने नेल्या की समस्या पर सर्वाधिक कार्य किया लेकिन वे भी उसे इस समस्या से निजात न दिला सके। रूस में इसे बिमारी समझा गया लेकिन भारत में इसे दिव्यता कहा जाता है। अगर यह महिला भारत में पैदा होती तो इसे देवी समझा जाता और उसके भक्त उसके मरने के बाद एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाते और फिर शरूं हो जाती नेल्या देवी की पूजा। यह जो तैंतिस करोड़ देवी-देवताओं की चर्चा भारत में चलती है, नेल्या इन्हीं देवी-देवताओं में से एक होनी चाहिए वह भूल-चूक अथवा किसी पाप के कारण रूस में पैदा हो गई वहां उसका तिरस्कार हुआ उसे कोई सम्मान नहीं मिला उसे सारी जिंदगी प्रसाद और भोग के स्थान पर दवाइयां ही खानी पड़ीं।

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     यह जो ऊर्जा का अतिरेक है, यह जो आंखों के माध्यम से बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा का बाहर निकलना है इसे ही नजर दोष या नजर का लगना कहा जाता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि सभी मौकों पर यह अशुभ ही होता है। यह शुभ भी हो सकता है, यह हमारी भावनाओं से नियंत्रित व परिवर्तित होता रहता है। जब हम किसी शुभ भावों से भरे व्यक्ति के संपर्क में होते हैं तो यह शुभ हो जाता है और जब किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में होते हैं जो हमारे लिए अपने मन में शुभ भावनाएं नहीं रखता है तो यह हमारे लिए अशुभ फलदायी हो जाता है। और सौ में निन्यानवे मौकों पर हम सभी एक-दूसरे के प्रति अशुभ भावनाओं से ही भरे रहते हैं। इसलिए कभी-कभी मामला इतना करीबी हो जाता है कि हमें कठिनाई मालुम पड़ने लगती है।

      छोटे बच्चे का जीवन बहुत नाजुक होता है, उसकी चेतना अभी शुभ व अशुभ के बीच भेद कर पाने में सक्षम नहीं है, वह अभी शुद्ध-बुद्ध चैतन्य है, वस्तुतः अभी वह बुद्ध ही है, ठीक से समझें तो अभी वह परमात्मा है और परमात्मा के साथ अगर कोई बुरा भी करना चाहे तो मजे से कर सकता है, वह उसकी भी स्वतंत्रता देता है। विरोध न करना, संघर्ष न करना यह परमात्मा का पहला गुंण है। 
     और वह छोटे बच्चे की चेतना इसलिए भी विरोध नहीं करती क्योंकि चेतना की द्रष्टि में न कुछ भला होता है और न ही कुछ बुरा होता है। इसलिए वह अभी सिर्फ ग्रहण करता है, चाहे शुभ हो या अशुभ हो। जैसे-जैसे वह बुद्धि विकसित होगी जो शुभ व अशुभ का भेद बताती वैसे-वैसे यह भी इन्कार करने लगेगा और अपनी सुरक्षा स्यमं ही करने लगेगा। जब-तक उसकी  वह बुद्धि नहीं विकसित होती, तब-तक उसकी सुरक्षा का जिम्मा उसके माता-पिता के ही कंधों पर होता है। इसलिए इस मामले में माता-पिता को ही बहुत सजग रहने की जरूरत पड़ती है। 

द्रष्टि बाधा व नजर दोष से बचने के उपाय:

     जैसा मैंने कहा कि यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसकी आप थाने में जाकर रिपोर्ट दर्ज कराएं और जो दोषी है उसे सजा दिलवांए। इसका निदान हम स्यमं ही कर सकते हैं। लेकिन जानकारी के अभाव में लोग व्यर्थ ही पीर-पेगम्बरों और तमाम प्रकार के ओझाओं एवं तंत्र - मंत्रविदों के चक्कर में पड़े रहते हैं। अभी मैंने कहा यह ऊर्जा हमारी भावनाओं से संचालित व परिवर्तित होती है। इसलिए इससे बचने के लिए आप अपने मन में इस तरह के विचार संग्रहित करें, इस तरह की भावनाओं को जन्म दें जो दूसरे की अशुभ भावनाओं को अस्वीकार कर दें। आप यह स्वीकार ही कर लें कि कोई भी आपका या आपके परिवार का अहित नहीं कर सकता।

      निरंतर ऐसे विचार, ऐसी भावनाएं अपने भीतर संग्रहित होने से चित्त इतना पुष्ट हो जाता है कि फिर वह दूसरे की तरफ से आने वाली अशुभ ऊर्जा को भी  रूपान्तरित करने में सक्षम हो जाता है। आप शायद ही यह जानते होंगे कि कुछ विशेष स्थानों पर, मजारों-मंदिरों व दरगाहों पर जाने से भूत-बाधा, टोना-टोटका नजर दोष स्वत: ही ठीक हो जाता है उसे ठीक नहीं करवाना पड़ता। उसका राज भी इसी सिद्धांत पर काम करता है। उन विशेष स्थानों पर, उन मंदिर-मजारों पर शुभ भावनाओं व शुभ विचारों की ऊर्जा इतनी अधिक सघन होती है कि बहुत अधिक प्रबल अशुभ ऊर्जा भी इन स्थानों पर आकर रूपांतरित हो जाती है और यह सब यंत्रवत होता रहता है। यह कोई देवी-देवताओं की कृपा से नहीं होता है।

      आप भी अपने आस-पास इतनी शुभ-भावनाएं, इतने शुभ-विचार संग्रहित कर सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति की अशुभ भावनाओं को रूपांतरित कर सकते हैं। और अपने घर में ही मंदिर जैसा वातावरण तैयार कर सकते हैं, आपको अन्य स्थानों पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर किसी की बुरी नजर आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगी।


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