Jugaad is our inability and not achievement! जुगाड़ हम करते हैं, इसलिए! क्योंकि 'मूल' को हम निर्मित करने में असमर्थ हैं!

     
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   "जुगाड़" हमारी असमर्थता है न कि उपलब्धि! प्रत्येक के जीवन की मंजिल की तरफ़ दो मार्ग जाते हैं, एक वह जो लम्बा है, सीधा है, साफ है, सुरक्षित है, जो थोड़ा देर से पहुंचाता है! और दूसरा वह जो शॉटकट है, जो आड़ा टेढ़ा है, जो जोखिम भरा है, जो असुरक्षित है, वो थोड़ा जल्दी पहुंचाता है!

       कुछ हैं, जो सीधे रास्ते पर चलना पसन्द करते हैं! और कुछ हैं, जिन्हें शॉटकट ही अधिक पसन्द है! लेकिन जो शॉटकट का उपयोग करता है, वह कोई बहुत बड़ा साहसी व्यक्ति नहीं होता है! स्वभावत: शाॅटकट रास्तों पर चलने वाले लोग ही हमें अधिक साहसी मालुम पड़ते हैं! लेकिन वे साहस के कारण नहीं चलते, वे चलते हैं, असमर्थता के कारण, वे चलते हैं मजबूरी में, वे चलते हैं इसलिए, क्योंकि पैरों में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वे लम्बे रास्ताें पर चल सकें!

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       जुगाड़ क्या है? जुगाड़ एक शॉटकट रास्ता है, मजबूरी है, असमर्थता है! जुगाड़ हम करते हैं, इसलिए! क्योंकि 'मूल' को हम निर्मित करने में असमर्थ हैं! एक अच्छी "कार" निर्मित करने के लिए, सामर्थ्य चाहिये, पैसा चाहिए, साहस चाहिए, मस्तिष्क चाहिए! लेकिन जुगाड़ करने के लिए यह कुछ भी जरूरी नहीं है! सब रेडीमेड मिल जाता है, बस इकट्ठा करना होता है और इकट्ठा करने में तो हम सब बड़े कुशल हैं, इकट्ठा करने का, जमा करने का, संग्रहित करने का अभ्यास हमारा पुराना है। वह तो हमें विरासत में ही मिल जाता है, इसलिए वह कोई उपलब्धि नहीं है।

"यहां की ईंट, वहां का रोड़ा,
 भानुमती ने कुनबा जोड़ा"!

       और 'हद' तो यह है कि उस भानुमती के कुनबे की खूब प्रशंसा हो रही है, खूब आरती हो रही है, खूब वाह-वाह हो रही है! लोग चौंक-चौंककर देख रहे हैं, उचक-उचककर देख रहे हैं और तालियाँ बजा रहे हैं! हमारे यहाँ सरकार से लेकर सन्यास तक सब जुगाड़ पर ही निर्भर है! कुछ तो शर्म करो!!

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