Am i sure I do not know of it. मैं कौंन हूँ? इसका मुझे पता नहीं है। मैं कहाँ से आया हूँ, इसकी भी मुझे खबर नहीं। कहां मुझे जाना है।

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मैं कौंन हूँ, मैं कहाँ से आया हूँ, इसकी भी मुझे खबर नहीं कहां मुझे जाना है, इसका भी कोई ठिकाना नहीं है।


      लेकिन मैं जो भी हूँ। हूँ, तो जरूर और यह जो मेरा होना है यह भरोसे योग्य नहीं है, मेरे ऊपर भरोसा करना मूढ़ता है। मैं एक अनिश्चितकालीन अनिश्चिय हूँ। मैं कोई वादा निभाने वालों में से नहीं हूँ। मैं धोखेबाज भी हूँ और धोखा भी! मैं बात कहकर पलट जाने वालों में से हूँ। मैं किसी का हमसफर नहीं हूँ, मुझे हमसफर समझने वाला निश्चित ही बहुत बड़ी भूल में है।

     मेरा कोई घर नहीं है, मेरा कोई नगर नहीं है, मेरा कोई राष्ट नहीं है, मेरा कोई वर्ण भी नहीं है। यह पृथ्वी भी मेरी नहीं है, और न ही आसमान मेरा है। इस चांद व सूरज पर भी मेरा कोई अधिकार नहीं है। इस देह का मालिक भी मैं नहीं हूँ।

      इस कहने वाले जगत में मेरा कोई प्रिय नहीं है और न ही संबंधी है। मुझे यहां की कोई भी वस्तु पसंद नहीं है, मुझे यहाँ का सौंदर्य भी भाता नहीं है, मुझे कोई रंग भी अच्छा नहीं लगता है। मुझसे अगर प्रीति करनी हो, मुझसे अगर प्रेम करना हो तो तभी करना जब तुम घास पर पड़ी ओस की बूँद से करने लगो, अन्यथा नहीं करना क्योंकि मैं भी घास की पत्तियों पर पड़ी ओस की बूँद की तरह ही हूँ, उससे अधिक मेरा जीवन नहीं है, यह मैं भलीभांति जान चुका हूँ।

      मुझे अकेलापन अच्छा लगता है, संग-साथ भयभीत करता है, भीड़भाड़ से डरता हूँ। पुनर्जन्म की मांग नहीं है, युवावस्था आवश्यक नहीं है, इंद्रियां भी मेरी नहीं हैं। सरल शब्दों में समझें तो मैं मर्त्यु का ही प्रर्यावाची रूप हूँ, वस्तुतः मैं मर्त्यु ही हूँ। मैं जिस घड़ी से जन्मा हूँ तभी से क्षण-प्रतिक्षण मर रहा हूँ, मैं इस जीवन में मर्त्यु के अतिरिक्त और कुछ संग्रह ही नहीं कर पाया। मर्त्यु के साथ ही मैं जन्मा था, मर्त्यु के साथ ही मेरी विदाई होगी, वही मेरी संगी है, वही मेरी साथी है। वही मेरी प्रेमिका है, वही मेरी प्रेयसी उसी का आलिंगन मुझे प्रीतकर लगता है उसी की बाहों में मुझे सदा के लिए समा जाना है।

      मर्त्यु ही मेरा अतीत था, मर्त्यु ही मेरा वर्तमान है और मर्त्यु ही मेरा भविष्य है। वही मेरा भाग्य है, वही मेरा स्वभाव है और वही मेरी नियति भी है। मैं और मर्त्यु जिस्म और जान की तरह सदा साथ-साथ ही जीते हैं,  जब-तक मैं हूँ, तब-तक मर्त्यु है, 'मैं, के अभाव में मर्त्यु का कोई आस्तिव नहीं है। मैं पहले न कभी हुआ था, न कभी भविष्य में होऊंगा। यह संपूर्ण आस्तिव मैं का ही फैलाव है, मेरे जाते ही यह संपूर्ण द्रश्यमान जगत एक दिए की भांति बुझ जाएगा फिर न मैं होगा, न तू होगा, न वह होगा। तभी शायद मैं जान सकूंगा कि मैं कौंन हूँ। 


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