आह! कितनी भयानक है यह दासता, यह गुलामी।

https://www.paltuji.com
practical life

क्या आप जानते हैं? 

          जब अंग्रेज भारत आए तो वे बहुत बड़ी तादाद में अपने साथ घोड़े भी लाये थे। लेकिन उन घोड़ों को खाने के लिए 'चारा, नहीं लाये। और अंग्रेज सिपाही जब आये तो लंबे-लंबे बूट पहनकर आये, लेकिन उन बूटों पर पालिस करने के लिए कोई 'चमार, नहीं लाये। और न ही धोबी लाये, न ही हज्जाम लाये। वे सिर्फ अपने साथ कोड़े और जल्लाद लाये। इन जल्लादों ने कोड़े मार-मारकर, यहां जो घूमते थे छाती फुलाकर पूंजीपति, राजा-महाराजा उनको चमार बनाया और उनसे जूते साफ करवाये, और घोड़ों की देखभाल करवायी। बड़े-बड़े शाहूकारों व जमींदारों से कपड़े धुलवाये, और मालिश करवायी। और गरीबों, असहाय व कमजोरों पर कोड़े बरसाये और महिलाओं पर जुल्म ढाये और बलात्कार किये।

           आह! कितनी भयानक है यह दासता, यह गुलामी। वही पूंजीपति, शाहूकार, जमींदार जो अंग्रेजो की बर्बरता का शिकार हुए। वे ही आज गरीबों, कमजोरों व असहायों से गुलामी करवा रहे हैं। उनके अधिकार हड़पने में लगे हैं, महिलाओं के साथ झीनाझपटी कर रहे हैं।

           आप यह कतई न समझें कि अंग्रेज चले गए तो उनके साथ वह लूटघसोट की भावना, वह झीनाझपटी की भावना, वह महिलाओं पर अत्याचार करने की भावना भी चली गई। भावना किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। भावनाएं सर्वव्यापक होती हैं, सर्वमानव के लिए। भावनाएं समय, क्षेत्र व काल से परे हैं। व्यक्ति मिटते हैं, भावनाएँ नहीं मिटती। यदि अंग्रेजों के चले जाने से भावनाओं का मिटना संभव होता तो आज जो यह भारत में महिलाओं के साथ झीनाझपटी हो रही है, जो लूट-घसोट हो रही है, जो गरीबों की जमींनें हड़प ली जा रही हैं, यह सब कैसे संभव हो पाता।
          सुना है! एक गांव में, उस गांव के दबंगों ने ग्राम-प्रधान से सांठ-गांठ करके एक गरीब किसान की जमीन पर कब्जा कर लिया। और फसल भी उगा ली, गरीब किसान ग्राम-सभा के सभी लोगों से अपनी जमीन छुड़वा देने के लिए कहता रहा, लेकिन किसी ने भी उस गरीब की आवाज नहीं सुनी।
           एक सांझ हताश व उदास किसान घर में चौके के पास बैठा था। पत्नी खाना पका रही थी, तभी उसके छोटे बेटे ने पूछा दादा, आज स्कूल में मास्टर जी समझा रहे थे कि बच्चों अब हम आजाद हो गए हैं। हमें अपने महापुरुषों को धन्यवाद कहना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें आजादी दिलाई। पिताजी कहां है आजादी? कैसी दिखती है वह, मुझे भी दिखाओ कुछ मुझे भी समझाओ। किसान की आंखों में तो आंसू आ गए। कैसे दिखाए? कैसे समझाए? कभी जाना नहीं, कभी आजादी के साथ जिया नहीं।
         पति को रोता देखा तो पत्नी ने अपने आंसू पोंछ डाले। और किसान को समझाते हुए बोली। कहा! क्यों परेशान होते हैं, चले जाइए न्यायालय में, न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित हो जाइए, यहां तो कोई सुनने वाला नहीं है। मुझे भरोसा है वहां न्याय अवश्य ही मिलेगा।


https://www.paltuji.com
practical life

          "इस बेचारी को पता नहीं है। असहाय व्यक्ति को गांवों की खाप पंचायतों में तो न्याय मिलता नहीं और ऐसे व्यक्ति को न्यायालयों में भी यातनाएं ही सहनी पड़ती हैं"।

          किसान ने कहा ठीक है। तुम कहती हो, तुम्हें भरोसा है तो मैं जाता हूँ। थोड़ा जल्दी कुछ पका देना या थोड़े सत्तू ही थैले डाल देना, भूख लगेगी तो खा लूंगा। मालुम नहीं कितना समय लग जाय। सुबह भोर में ही किसान प्रस्थान कर कर गया। सुबह दस बजे के करीब वह डीएम कार्यलय के समक्ष उपस्थित हो गया। वहां पहले से ही अन्य ग्रामीण किसान मौजूद थे। कोई बीड़ी पी रहा था तो कोई तम्बाकू फांक रहा था, तो कोई कक्ष के भीतर तकाझांकी कर रहा था। किसान भी उसी भीड़ में सम्मिलित हो गया। थोड़ी देर में घुसुर-फुसुर की आवाजें आने लगीं। लोग एक दूसरे से बड़बड़ा रहे थे। लगता है आने वाली हैं, लगता है आ रही हैं, शायद बैठने जा रही हैं। इन्हीं आवाजों के साथ जज साहिबा की कुर्सी पीछे खींची जाती है। और सब भीतर कक्ष में उत्साह और शान्ति के साथ खड़े हो जाते हैं।

         और तभी थोड़ी ही देर में दूसरी तरह की आवाजें आनें लगती हैं। ये आवाजें वहां मौजूद पेशकारों की तरफ से आ रही थीं। जज साहिबा आज नहीं बैठेंगी, कल बैठेंगी। सब लोग बीस-बीस रुपयों का चढ़वा चढ़ा कर अपनी-अपनी फाइलों पर दस्तखत करो और घर जाओ। अनवरत् यही सिलसिला चलता रहा, साल दर साल। किसान इसी तरह दौड़ता रहा, और इस दौरान दबंग उसकी जमीन पर फसल काटते रहे।

          एक दिन साहस बटोरकर किसान जज साहिब के मुनीमों से पूंछ बैठा। साहिब- दो बरस हो गये हमको दौड़ते हुए अभी तक मेरी फाइल का नंबर नहीं आया, यह कब आयेगा। मुनीमों ने कहा सुनो! पांच सौ रुपयों का इंतजाम कर दो अभी तुम्हारी फाइल का नंबर आ जायेगा और न्याय भी हो जायेगा। किसान ने माथा ठोक लिया। कहा कि न पांच सौ रूपये होंगे न न्याय मिलेगा।
          सोंचो जब न्याय के मन्दिरों में यह सब चलता है तो अन्याय के मंदिरों में क्या चलता होगा। https://www.paltuji.com/
Previous
Next Post »