सब बच्चों का बाजार है, सब झूंठों की जमात है, सब अंधों का बोलबाला है।

https://www.paltuji.com
practical life

'राहत इंदौरी' की ये लाइनें हैं!

          झूठों ने झूठों से कहा है, सच बोलो,
सरकारी ऐलान हुआ है, सच बोलो!
          घर के अंदर झूठों की एक मण्डी है,
 दरवाजे पर लिखा है, सच बोलो!!



          यह बड़े मजे का तथ्य है, यहां झूठे झूठों को सच बोलने के लिए समझाते हैं, अंधे, अंधों को राह बतलाते हैं, बलात्कारी, बलात्कारी के विरोध में नारेबाजी करते हैं, धर्मगुरु, धर्मगुरु को गालियां देता है! भेड़िए, भेड़ियों को समझाते हैं कि मांसाहार पाप है! तुलसी भी सावन मास में मांस नही खाते!



          तुम शायद सोंचते होआओ कि यह जो सड़कों पर बलात्कारियों के विरोध में नारेबाजी होती है, विरोध प्रदर्शन होते हैं यह कोई उन लोगों के द्वारा किया जाता है जो पवित्रम हैं, ब्रह्मचारी हैं, तो यह आपकी सोंच सही नहीं है! आंख वाला कभी अंधे से नहीं कहता कि कृपया देखकर चलें! क्योंकि वह जानता है कि अंधे से कहना कि देख कर चलो फिजूल है! जब अंधा ही है तो क्या खाक देखकर चलेगा! आंख वाला यह जानता है!

           अंधा ही शोरगुल मचाता है कि भाई जरा देख कर चलो, संभल कर चलो! क्योंकि वह भी तुम्हारे पीछे चल रहा है! और सच्चाई यह है कि अंधा ही है यह जगत, आंख वाले यहां हैं ही नही! वह जो 'जज' है, जिसने बलात्कार के जुर्म की सजा सुनाई वह भी कोई पवित्रतम व्यक्ति नहीं है और ना ही ब्रह्मचारी है, वह भी वही है, उसके अंदर भी वही सब संभावनाएं हैं जो किसी अपराधी के अंदर होती हैं! लेकिन अभी वह समय में, सुविधा में, परिस्थितियों में दबी पड़ी हैं ! अगर उस व्यक्ति को भी अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हो जाएं तो वह भी वही सब करेगा जो कोई मुजरिम करता है! यहां चोर और सिपाही में कोई बुनियादी भेद नहीं है, समस्त भेद समय व आवरण के हैं!

          प्रत्येक व्यक्ति में समस्त संभावनाएं समाहित रहती हैं यह बात विज्ञान भी स्वीकार करता है! देखें, 'क्वांटम' की व्याख्या क्या कहती है!

           यानी! मैं जो कहना चाह रहा हूं, वह एक उदाहरण से समझें! मेरे बचपन के समय में, गांव के बच्चे एक खेल खेलते थे, दस-बारह बच्चे मिलकर एक गांव बसाते थे! कुछ बच्चे उस गांव में ग्रामीण होते थे, कुछ बच्चे पुलिस बनते थे, कुछ जज बनते थे, कुछ चोर बनते थे, यह एक खेल था! और चोर बच्चे, ग्रामीण बच्चों के घर लूटते और फिर 'जज' बच्चे के पास फैसला जाता! और फिर चोर बच्चे को सजा सुनाई जाती! ऐसा खेल था, अब मुझे लगता है कि वे बच्चे बड़े हो गए, और यह सब खेल चल रहा हैं! यहां सब बच्चे हैं, सब बचकाना है! वह जो चोर है, वह भी बच्चा, ग्रामीण भी बच्चे, अपराधी भी बच्चा और वह जो सजा देने वाला है वह भी बच्चा,  सब बच्चों की जमात है! यहां कोई प्रौढ़ नहीं है! सब बच्चों का खेल है।

https://www.paltuji.com
practical life











झूंठों ने झूठों से कहा है, सच बोलो,

       सरकारी ऐलान हुआ है, सच बोलो!
घर के अंदर झूठों की एक मण्डी है
         दरवाजे पर लिखा है, सच बोलो"!!



          सब बच्चों का बाजार है, सब झूंठों की जमात है,  सब अंधों का बोलबाला है, चाहे शंकराचार्य हो, चाहे अन्य कोई तथाकथित महात्मा हों, किसी की आंख में भी बुद्धत्व की, सत्य की, परमात्मा की चमक नहीं है! बस पूजा चल रही है! क्योंकि यहां अधिकांश अंधे ही अंधों की पूजा में संलग्न है, भक्त भी अंधे और भगवान भी अंधे, अंधे अंधों को मार्ग सुझा रहे हैं!!

https://www.paltuji.com/




Previous
Next Post »