जीवन मांसाहार की बुनियाद पर ही निर्भर है।




जरा सजगता से, जरा विवेक से, जरा होश से, जरा गहराई से विचार करें, तो मालुम होगा यह जीवन मांसाहार की बुनियाद पर ही  निर्भर है।


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मांसाहार है क्या? 


   दूसरे का आहार ही 'मांसाहार, है। जब हम जन्में तब हमारा भार न कुछ था। बढ़ते-बढ़ते यह पचास पौंड हो गया या उससे अधिक अथवा कम हो गया। यह वजन कहां से आया? यह हमने  झीना है, दूसरों से! हम अवश्य ही सोंचते रहें हैं, कि यह 'देह' हमारी निजी संपत्ति है।


   लेकिन यह सच नहीं है! निजी शब्द बड़े धोखे का है। जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे तुम निजी कह सको, जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही है। जिस मकान में तुम रहते हो उस मकान की दीवार पर जो छिपकली है, यदि तुम पूँछ सको उससे, यदि तुम समझ सको उसे तो वह भी कहेगी, यह मकान मेरा है। मैं इसकी मालिक हूं! घर में जो कुत्ता है। वह भी कहेगा यह घर मेरा है। मैं इसका मालिक हूं। अनंत हैं दावेदार तुम पूँछते जाओ, दावेदार मिलते जायेंगें।

   जो हृदय भीतर धड़क रहा है। यह कोई सिर्फ तुम्हारा ही नहीं है, इस पर कोई अकेले तुम्हारी ही बपौती नहीं। यदि कोई चोर इस हृदय को चुरा ले तो यह हृदय दूसरे के भीतर धड़कने लगता है। यह चोर के भीतर भी अपना काम-काज जारी रखता है! इसलिए तो अंगों की चोरी होती है, तस्करी होती। यह देह अंगों से बनी है! अंग यानी पुर्जा, हृदय भी पुर्जा है। जिसे हम दिल कहते आये हैं। वह भी पुर्जा ही है। इसलिए तो लोग दिल दे देते हैं। चोरी-चोरी देना पड़े या चुपके-चुपके दिल देने में कोई भी कंजूसी नहीं करता। क्योंकि जो मेरा है ही नहीं उसे देने में हर्जा भी क्या है। और कंजूसी भी क्या करना।
  दरअसल दिया वही जाता है, जो मेरा नहीं है, जो निजी नहीं है! हृदय मेरा नही है! इसलिए तो आदान -प्रदान संभव है। इसलिए मेरा दिल तुम्हारे पास हो सकता है, तुम्हारा दिल हमारे पास हो सकता है, या इससे उलट भी संभव है! आदमी का दिल जानवर के पास हो सकता है, जानवर का दिल आदमी के पास हो सकता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है! इसमें कोई प्रेम वगैरह के बढ़ने का संबंध नहीं है! यह एक जैविक संभावना है।
  इसलिए निजी जैसा कुछ भी नहीं है। जरूरी जैसा बहुत है। और जरूरी यह है कि यदि मुझे अपना 'मांस' बढ़ाना है तो दूसरे को खाये बिना कोई उपाय नहीं है जिससे अपना वजन बढा़या जा सके। लेकिन यह दूसरा कौंन होगा, यह निर्णय की क्षमता, यह चुनाव की क्षमता मेरे पास ही है। इसलिए मैं यह तय कर सकता हूँ कि मैं आदमी का मांस खाऊं या जानवर का, पशु-पक्षी खाऊं या साग-सब्जी। चूंकि मैं इस क्षमता का उपयोग विवेकपूर्ण नहीं कर पाता हूँ।

  इसलिए यह व्यक्ति पर छोड़ना कि वह क्या खाये,क्या न खाये निपट मूढ़ता है। सरकार यदि यह तय कर देना चाहे कि व्यक्ति के लिए क्या खाने योग्य है, क्या खाने योग्य नहीं है तो इससे ज्यादा सराहनीय कुछ भी नहीं है। अध्यात्म यह बहुत पहले से समझाता आया है। यदि व्यक्ति को स्वेछा से कुछ भी खाने के लिए स्वतंत्र रखना है तो फिर "कोहली" जैसे अपराधयों को, जिन्होंने बच्चों का मांस खाया उन्हें जेल में ठूंसना ठीक नहीं है। और फिर दादा ईदी अमीनी को भी हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। ईदी अमीनी युगांडा का एक खूंखार, आदमखोर प्रजाति का शख्स था। बतौर राष्ट्रपति उसने आठ वर्षों तक युगांडा की जनता पर अत्याचार किए। वह शबाब के स्थान पर नित नूतन लड़कियों का ग्रहण करता और कबाब के स्थान पर मनुष्यों का मांस खाता था और खून पीता था। उसके पलायन के बाद जब उसके घर की तलाशी ली गई। तब उसके फ्रीज से मानव अंग एवं मानव मांस मिला।

  ख्याल रहे जो व्यक्ति दूसरों का मांस खा सकता है वह अपना भी खा सकता है। क्योंकि मांस कोई अपना पराया नहीं होता। और न ही कोई ऐसा भेद है जिससे तुम पहचान सको कि यह मेरा है और यह दूसरे का। भेद सिर्फ गंध का है, स्वाद का है। लेकिन वह स्वाद, वह गंध भी पैदा की जा सकती है कुछ उपायों द्वारा।

   मैंने सुना है! एक हवाई यात्री दुर्घटना में बहुत बड़े जंगल में गिर गया। पेड़ों में फंसकर उसका एक पैर टूट गया। जंगली लोग, आदिवासी लोग उसे उठा ले गए। वह यात्री बेहोश था। सांझ हो चली थी। आदिवासी भूखे थे। उन्होंनें उस यात्री के टूटे हुए पैर को सुन्न कर दिया और उसके शरीर को कपड़े से ढक दिया। और पैर काटकर उसका सूप बना लिया। यात्री को होश आया उसने कहा, मैं भी भूखा हूँ। उन्होंनें वह सूप उस यात्री को भी दिया और उसने भी चटकारे लगा लगाकर वह सूप पिया। क्योंकि वह मांसाहार का शौकीन था। आप सोंच रहें होंगें यह तो हद्द हो गयी।  
                   
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   यह तुम्हारे साथ भी हो सकता है। यदि तुम मांसाहार करते हो। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम किसका मांस खाते हो, महत्वपूर्ण यह है कि तुम मांस खाते हो या नहीं। अगर तुम जानवर का मांस खा सकते हो तो आदमी का भी मांस खा सकते हो। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। क्योंकि बुनियादी भेद समाप्त हो गया। इसलिए अपनी बुनियाद की संभावना को बदलने का प्रयास करो।

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