संवेदनहीन व्यवस्थाएं।

      भस्टाचार, अपराध, अन्याय, लूट, हत्या, बलात्कार। यह सब देश व समाज की व्यवस्थाओं, नीतियों व दंडनीतियों पर निर्भर है। व्यवस्थाएं ऐसी भी हो सकती हैं, जिसमें ये समस्याएं कम से कम हों या न के बराबर हों। 


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          हमारे पास लोकतंत्र की नियति है, संविधान का विवेक है, उपनिषद और गीता की आत्मा है। और व्यवस्थाएं हमनें ऐसी खड़ी की हैं, जिसमें उपरोक्त बीमारियां ही अधिक से अधिक संभव हैं! इसलिए दोष व्यक्ति का नहीं है। देश में व्याप्त भस्टाचार, ठगी, लूट, अपराध,अन्याय, अत्याचार के लिए संपूर्णता हमारी व्यवस्थाएं, नीतियां व दंडनीतियां ही कसूरवार हैं।

          दंडनीतियां हमारी अपराध के पक्ष में खड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं। एक अपराधी को दंडित करते समय हमें पच्चीस दफे विचार करना पड़ता है। कहीं उसके मानवीय मूल्यों का हनन तो नहीं हुआ जा रहा है। और यह अपराधी एक दफे भी यह ख्याल नहीं करता कि जिसके साथ मैं अपराध कर रहा हूँ, उसका भी कोई मूल्य है या नहीं! तब यह बर्बरता के असीम में उतर जाता है।

          भारत में जो व्यक्ति सैकड़ों दफे अपराध करने के बाद पकड़ा जाता है, सैकड़ों दफे बलात्कार करने के बाद पकड़ा जाता है और दंडित होने से बच पाता है। ऐसा व्यक्ति अन्य तमाम देशों में एक दफे ही अपराध व बलात्कार करने के बाद जीवित नहीं रह पाता।

          जमीन पर भारत ही ऐसा अकेला मुल्क है। जहां कि जेलों में अपराधी जब जाता है तो दुखी होता है, उदास व हतास होता है। लेकिन जब वह बाहर आता तो मुस्कराते हुए अाता है। उसके चेहरे पर कोई सिकन नहीं, कोई पछतावा नहीं, वह और निखर जाता है, और चमक जाता है, और कुंदन हो जाता है। समाज में उसकी और कीमत हो जाती है, और सम्मान मिलने लगता है। वह जिस गली-मोहल्ले से गुजरता है लोग दौड़-दौड़ कर नमस्कार करते हैं। स्वभावत: छोटे-छोटे बच्चे पूछते हैं, दादा-दादी से इस स्तुति का, इस सम्मान का कारण क्या है, राज क्या है, तो उन्हें बताया जाता है कि यह जघन्य अपराधी है और दंड भुगत कर आया है! यह स्तुति, यह सम्मान उसी का परिणाम है।

          वे बच्चे भी प्रभावित होते हैं और वे भी बड़े होकर जेल जाते हैं। और हम इसी गोरखधंधे का गुणगान करते नहीं अघाते, हम बड़े प्रसंन्न हैं। उसका कारण है, कारण भी बाहरी नहीं है, भीतरी कारण है।

          बाईबिल में कथा है! एक स्त्री को भीड़ दौड़ाये जा रही है। भीड़ के हाथों में पत्थर हैं। सामने जीसस आ जाते हैं। पूछने पर मालुम होता है वह स्त्री एक वेश्या है, वह व्यभिचारिणी है, वह पापी है! जीसस ने कहा भीड़ से तुममें से पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी पाप न किया हो और कहते हैं उस भीड़ ने पत्थर फेंक दिए। दंड देने का अधिकार भी उसी को है जिसने स्वयं कोई दंड योग्य कार्य न किया हो।

          शायद इसीलिए! हम बातें तो खूब बघारते हैं, अपराधियों को दौड़ाते भी खूब हैं। लेकिन अंतत: हमें पत्थर फेंकने पड़ते हैं, एक अपराधी के प्रति, एक बलात्कारी के प्रति समर्पण करना पड़ता है। क्योंकि हम स्वयं ही उन्हीं-उन्हीं अपराधों में लिप्त हैं। मंत्री हो, न्यायाधीश हो, साधु-महात्मा हो, शिक्षक हो, गुरु हो सब उसी जमात, उसी क्यू में खड़े हैं। इसलिए तो कोई गंभीर नहीं है, हो नहीं सकता। और यदि कोई होगा भी तो उसका इस जमात से कोई विशेष सरोकार नहीं होगा। लेकिन वह अपवाद् होगा। लेकिन ऐसे व्यक्ति भी अंतत: भारत जैसे मुल्क में पराजित हुए पाये जाते। संवैधानिक व गैर-सैंविधानिक व्यवस्थाओं के कारण, नीतियों व दंडनीतियों के कारण। इसलिए बिना व्यवस्थाएं बदले, देश की तकदीर बदलना बड़ा कठिन परिश्रम है।

          हमारी व्यवस्थाओं ने भारतीय हृदय को इतना संवेदनहीन बना दिया है, इतना पत्थर बना दिया है। जितना वह कभी न था। आज राह किनारे पड़े तड़फते, घायल व्यक्ति को कोई चाहकर भी सहायता नहीं पहुंचा पाता। बाजार में हत्या होती है, सरेराह स्त्री को बेइज्जत किया जाता है,भीड़ तमाशबीन दिखाई पड़ती है। लेकिन यह भीड़ की मजबूरी है। इस देश में गवाहों की, बचाने वालाें की, सही जानकारी देने वालाें की जो दुर्दशा होती है वह शायद ही कहीं होती होगी। अगर मैंने किसी की हत्या करते हुए किसी को देख लिया, और मेरी चीख निकल जाये तो मेरा मरना तय है। फिर मुझे कोई सहायता नहीं पहुंचा सकता।

          हमारी व्यवस्थाओं ने व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव को समाप्त किया है, खंडित किया है। आज कोई भी किसी के झगड़े-झांसे में नहीं पड़ना चाहता। उसे भय लगता है व्यवस्थाओं से। व्यवस्थाओं ने आदमी को आदिम बना दिया है।


         
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