गरीब धार्मिकता मनुष्य जितना गरीब होगा, बेरोजगार होगा, अशिक्षित होगा, असहाय और पिछड़ा होगा उतनी ही

धार्मिकता, आस्तिकता, नैतिकता, नियम-सयंम यह सब गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा व पिछड़ेपन की उपज है। 


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        मनुष्य जितना गरीब होगा, बेरोजगार होगा, अशिक्षित होगा, असहाय और पिछड़ा होगा उतनी ही उसकी प्रगाढ़ आस्था परमात्मा में होगी, वह उतनी ही त्वरा से प्रभु का गुणगान कर सकेगा। पृथ्वी पर जो यह इतनी धार्मिकता दिखाई पड़ती है भजन-कीर्तन हो रहे हैं, अखंड-पाठ चल रहे हैं, यज्ञ-हवन चल रहे हैं, यह सब धर्म की उत्सुकता के कारण नहीं हैं। यह सब गरीबी, भुखमरी और बीमारियों के कारण है। 

           जो लोग नास्तिक जान पड़ते हैं, अनैतिक, अधार्मिक दिखाई पड़ते हैं। उसका कारण उनकी नास्तिकता व अनैतिकता नहीं है। उसका कारण यह है कि वह इन बीमारियों का अतिक्रमण कर गये हैं। वह गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी को समाप्त करने के प्रयास में सफल हुए हैं वह इन बीमारियों से छुटकारा पाने में कमयाब हुए हैं। और इसलिए वह नीति-नियमों से भी छूट सके हैं। नैतिकता व धार्मिकता की जंजीरों को भी तोड़ सके हैं। 


          समझना थोड़ा मुश्किल है! लेकिन यह सच है गरीब आदमी ही नैतिक हो सकता है नीति और नियमों में बंधा हुआ हो सकता है। 


          बड़े-बड़े लोगों द्वारा बनाये नीति-नियम सब गरीबों के सहारे ही जीवित रहते हैं। नीति-नियमों के गरीब ही पालनहार होते हैं, गरीब ही आक्सीजन देने का कार्य करते हैं, गरीब ही सींचते हैं नियमों को नहीं तो वे क्षण में ही मुरझा जायें। क्योंकि जो गरीब नहीं है, बेरोजगार नहीं है, अशिक्षित नहीं है, पिछड़ा नहीं है, असहाय व कमजोर नहीं है! उसके लिए तो कोई कारण ही नहीं है धार्मिक होने का और ना ही कोई कारण है नीति नियमों का पालन करने का। उनकी दृष्टि में सारी धार्मिकता पाखंड है और सब नीति-नियम मखौल हैं। 

          सभी जानते हैं यहाँ सड़कों पर ट्रैफिक नियमों का पालन कौन करता है? कौंन अस्पतालों की लाईनों में खड़ा होकर नियम-पालन करता है। वे कतारें किन लोगों की हैं जो नंगे पाँव यातनाएं सहते हुए मन्दिरों की तरफ़ भागे जा रहे हैं। 

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           निश्चित ही वे ताकतवर लोग नहीं हैं, बलशाली नहीं हैं। वे सब गरीब हैं, कमजोर हैं, उनकी कुछ मांगें हैं, अवश्यकताएं हैं, जरूरतें हैं, इन मागों के कारण ही, इन आवश्यकताओं के कारण ही, इन जरूरतों के कारण ही वे अधिक धार्मिक, अधिक नैतिक, अधिक आस्तिक जान पड़ते हैं। यह नैतिकता, यह धार्मिकता, यह आस्तिकता इस बात की सूचक है कि हम असक्षम हैं, असहाय हैं। मेरे सिर में दर्द हो रहा हो और पास मेरे फूटी कौड़ी भी न हो तो मैं निश्चित ही किसी दूसरे के आगे हांथ फैलाने वाला हूँ वह दूसरा गौण है! वह दूसरा शाहूकार हो सकता है, जमींदार हो सकता है, भगवान भी हो सकता है। ठीक से समझें तो सारी धार्मिकता, सारी आस्तिकता, सारी नैतिकता सिरदर्द ठीक करने के उपाय हैं।। 

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