"बाबा रे बाबा" यह जो बैठा है महात्मा तुम्हारी कुटिया में, तुम्हारे मंदिर में..



        बाबा, शब्द सुनते ही मन में विरक्ति का, त्याग का, एकाकी पन का भाव उमड़ने लगता है। जब हम कहते हैं "बाबा" तो मन पूंछता "मतलब" क्या है? बाबा का! तो हम ब्याख्या कर देते हैं, समझा देते हैं! बाबा, यानी जो काम से दूर हो, जो घर से दूर हो, जो समाज से दूर हो, जो गांव के बाहर कुटिया बनाकर रहता हो, जो आश्रम बनाकर रहता हो तो ऐसा भाव हमने अपने भीतर खोद रखा है, बाबाओं की ऐसी प्रतिमाएँ हमने अपने भीतर गढ़ रखी हैं। 


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          इन्हीं प्रतिमाओं के कारण ही, इन्हीं व्याख्याओं के कारण ही, इन्हीं परिभाषाओं के कारण ही हम धोखा खाते हैं और इसके लिए किसी बाबा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोष हमारा है, हमने ही यह असंभव परिभाषा गढ़ी है। असंभव इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि कोई भी व्यक्ति व्यक्तित्व के रहते न तो वह काम से ही छूट सकता है और न ही समाज से, जिसे कृष्ण कहते हैं "देहभिमानी पुरुष के विषय तो छूट जाते हैं, परन्तु 'रस' नहीं छूट पाते" और इन बाबाओं से बड़ा देहभिमानी कौन है भला! विषय इनके छूट गये हैं, घर छूट गया, पत्नी छूट गई, गांव छूट गया, समाज छूट गया लेकिन वह रस, वह स्वाद नहीं छूटता।

          इसलिए वे अन्य गांवों में रस लेने लगते हैं, अन्य स्त्रियों में स्वाद ढूंढने लगते हैं, वह भीतरी रस के कारण भीतर जब तक रस मौजूद है तब तक महात्मा होना असंभव है, बाबा होना असंभव है। भेष वह बना सकता है, बाल बढ़ा सकता है, जटाएं खड़ी कर सकता है। लेकिन इससे भूल में मत पड़ जाना, इससे उसे महात्मा समझकर चरणबंदना न करने लग जाना, वह बाबा नहीं है। वह हमारे जैसा ही है।

कबीर साहब ने कहा है। 


"तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय।
सब विधि सहजै पाइए, जो मन जोगी होय"।। 


          यह जो बैठा है महात्मा तुम्हारी कुटिया में, तुम्हारे मंदिर में यह तन का जोगी है मन का नहीं, मन से तो यह तुमसे बड़ा रसिया है। इसलिए अगर इसका हृदय धड़कता हो किसी स्त्री के प्रति, प्रेम वगैरह हो गया हो तो अचरज न करना यह स्वाभाविक है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। और यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ कि साधारण आदमी का हृदय उतनी जोर से कभी नहीं धड़कता, जितनी जोर से इन तथाकथित बाबाओं का धड़कता है किसी स्त्री को देखकर, उसका कारण है क्योंकि बाबाओं के पास और कोई काम तो होता नहीं सारे कामों से तो वह भाग खड़ा हुआ है। लेकिन जिन कामों से वह भागा है वह काम हैं ही नहीं, असली काम तो भीतर है। उससे कैसे भागेंगे। वह भीतर का "काम" सब उपद्रव करवा लेता है। यह महाराज अभी 'काम, के गुलाम है।

          इसलिए इनको दोष न दो, इन्हें भी प्रेम का अधिकार है, इन्हें भी प्रेम करने दो, इन्हें भी घर बसाने दो, इन्हें भी राजनीति में दो-दो हांथ करने दो, नाहक ही इन पर उंगली न उठाओ! यह जरा ज्यादती होगी कि जिनके भगवान तो सब अपनी-अपनी पत्नीयों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हों, अपने-अपने परिवारों के साथ रंगरलियां मना रहें हों, चाहे वे हिमालय पर हों या झीर सागर में और  उनके भक्तों पर ऐसा प्रतिबंध लगाया जाए कि वे प्रेम भी न कर सकें।

          महात्माओं के प्रति, बाबाओं के प्रति हमारी जो व्याख्या है, हमारी जो परिभाषा है, उसे बदलने की जरूरत है, वह बदलनी ही चाहिए, वह व्याख्या असंभव है नहीं तो कृष्ण यह न कहते कि देहाभिमानी के विषय छूटते हैं, किन्तु रस नहीं छूटते। इसका मतलब यह न समझ लेना कि रस बाद में छूट जाते होंगे। बाद में भी नहीं छूटते। आदमी छूट जाता है। इसलिए यह भी समझ लेने जैसा है कि जो लोग कहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह छूट जाता है वह या झूंठ बोलते हैं या हम समझ नहीं पाते। वस्तुतः बाबा, साधु, महात्मा यह कोई घटना नहीं है, इसका जीवन से कोई संबंध नहीं है।

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