चुनाव हमारी भ्रांति है। आप ज़मीन पर चलते हैं, ज़मीन पर चलना आपकी मजबूरी है!

आप ज़मीन पर चलते हैं, ज़मीन पर चलना आपकी मजबूरी है चुनाव नहीं यदि यह चुनाव है तो आप कहीं भी चल सकते हैं।


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चुनाव एक भ्रांति है -: 

          मनुष्य की डिक्शनरी में कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनको की वहां होना नहीं चाहिए। ऐसे ही एक शब्द है चुनाव, सुनने में बड़ा अच्छा है। लेकिन वस्तुतः वह सिर्फ हमारी भ्रांति है! वह शब्द केवल हवा में है , क्योंकि वह शब्द किसी और ही लोक का है, किसी और ही जगत का है, किसी और ही आयाम का है वह शब्द ऐसे ही हमारे बीच तैर रहा है, विचरण कर रहा है जैसे कोई दूसरे ग्रह का जीव इस पृथ्वी पर आकर विचरण करे और उसका हम सभी के साथ तालमेल बैठ जाए, घुल-मिल जाये। ऐसे ही 'चुनाव, शब्द हमसे घुलमिल गया है, तालमेल बैठ गया है।

         इसलिए हमें लगता है चुनाव हमारा ही शब्द है। और पूर्णता हमसे ही संबंधित है। और हम चुनाव करते हैं स्वेच्छा से, हम जिसे चाहते हैं उसे चुनते हैं जिसे नहीं चाहते हैं उसे नहीं चुनते हैं। यह आपकी धारणा है, ख्याल है, सच्चाई नहीं है। एक आदमी सिगरेट पीता है, बीस वर्ष  से, तीस वर्ष से उससे कहो जरा आज न पियो, तब पता चलेगा यह एक दिन का भी न पीना उसके लिए कितना कठिन मामला है।

          यह जरा भी कठिन नहीं होना चाहिए, यदि किसी कार्य को चुनने के लिए मैं स्वतंत्र हूँ तो उस कार्य को न चुनने के लिए भी मुझे बाध्य नहीं होना चाहिए। लेकिन आश्चर्य है कि हम यह दावा तो बड़े जोर से करते हैं कि हम शराब पीते हैं, धूम्रपान करते हैं! लेकिन यदि हमसे कोई कहे कि अगर तुम स्वेछा से इस दलदल में धंसे हो, यह दलदल तुमने ही चुना है तो बाहर क्यों नहीं निकल आते, रोका किसने है? तो हम कहेंगें कि हम बाहर तो निकलना चाहते हैं, परन्तु निकल नहीं पाते। उसके लिए हमें डॉक्टर लगाने पड़ते हैं, धर्मगुरुओं को चिन्ता करनी पड़ती है, समाजसुधारकों को आगे आना पड़ता है। फिर भी सफलता नहीं मिलती। उसका कारण यही है कि हमने चुना ही नहीं था। और हम चुन भी कैसे सकते हैं, जहर को कोई नहीं चुनता।
       

          जानकर हैरानी होगी अभी तक आपने अपने जीवन में कुछ भी चुना नहीं है, किसी का भी चुनाव नहीं किया है। आप सदा चुनाव के मामले में विवश हैं, मजबूर हैं, स्वतंत्र नहीं है। आप कभी भी चीज़ों को चुनते नहीं हैं, चुनना पड़ता है। लेकिन यह मजबूरी, यह विवशता दिखाई नहीं पड़ती क्यों? क्योंकि दायरा बहुत बड़ा है।

इसे थोड़ा और ठीक से समझने के लिए कुछ उदाहरण देख लेते हैं। 


           जब हम जाते हैं बाजार साग सब्जी लेने तो हमें लगता है कि हम अपनी मर्जी की अपनी इच्छा की वस्तुएं खरीद रहे हैं या सामान खरीद रहे हैं! लेकिन आपको मालूम है, वस्तुएं पहले से ही तय कर रखी गई है, साग-सब्जियों की सूची पहले से ही लिख दी गई हैं कि आप अमुक-अमुक वस्तुओं का ही उपयोग कर सकते हैं, सेवन कर सकते हैं आप उन्हीं-उन्हीं लिखी हुई वस्तुओं का, बताई हुई चीजों का उपयोग कर रहे हैं। उन्हीं वस्तुओं के दायरे में से कोई एक चीज या वस्तु चुन सकते हैं। लेकिन उस दायरे से अन्यथा आप स्वयं से कुछ भी नहीं चुन सकते जो आपके लिए पूर्वनियोजित नहीं है।

          यदि किसी शेर को छोटे से पिंजड़े में कैद कर दिया जाय। तो उसे साफ दिखाई देगा कि वह कैदखाने में कैद है, स्वतंत्र नहीं है। परंतु यदि उसे एक विस्तृत स्थान पर छोड़ दिया जाए और उस स्थान के चारो तरफ दीवार खड़ी कर दी जाए जैसा कि हम बड़े-बड़े पार्कों व चिड़ियाघरों में करते हैं तो उस शेर को कभी भी यह अनुभव नहीं होगा कि वह कैदखाने में बंद है। क्योंकि उसे विचरण करने के लिए, उसे घूमने फिरने के लिए इतना स्पेस, इतना स्थान मौजूद है कि उसे पता चलना कठिन है।

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         एक और महत्वपूर्ण बात आप ज़मीन पर चलते हैं, ज़मीन पर चलना आपकी मजबूरी है चुनाव नहीं है। यदि यह चुनाव है तो आप कहीं भी चल सकते हैं। लेकिन आप कहीं भी नहीं चल सकते। अगर मैं कहूं कि जमीन से दो फीट ऊपर चलिए तो नहीं चल पायेंगे, क्योंकि हम ग्रेबिटेशन से बंधे हैं।

          चलने के लिए मार्ग भी हम स्वेछा से नहीं चुनते, मार्ग हमारे लिए पहले ही बनाये जा चुके है, रास्ते पहले से ही निर्मित है, लीकों के निशान पहले से ही मौजूद है उन्हीं लीकों के निशान देख देख कर हम चलते हैं हम पहले ही पूंछ लेते भाई, इधर से कोई निकला है या नहीं, यदि निकला है तो ही हम आगे कदम बढ़ाते हैं अन्यथा दूसरी लीकों को खोजने लगते हैं। उन्हीं लीकों के चुनाव को हम चुनाव कह रहे हैं।

          आदमी जिस हालत में है! उस हालत में चुनाव उसके लिए एक ख्याल भर है, एक अफ़वाह भर है, चुनाव नहीं है! इसलिए चुनाव कोई करता नहीं है, चुनने के लिए मजबूर है इसलिए मैंने कहा, चुनाव एक भ्रांति है।







         
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