मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना की जिंदगी में एक दौर ऐसा भी आया...

          मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना की जिंदगी में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्हें अपनी ही चकाचौंध भरी जिंदगी अखरने लगी। अभिनेत्रियों का आलिंगन, चाहने वालों का प्रेम फीका दिखाई पड़ने लगा और परमात्मा की चकाचौंध के आकर्षण में खो जाने के लिए उनका मन लालायित हो उठा।



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         सत्य के आकर्षण ने, परमात्मा की पुकार ने उन्हें ऐसे झकझोरा कि तमाम ऐशो-आराम त्यागकर उन्हें भगवान रजनीश के सानिध्य में जाना पड़ा और संन्यासी का चोला स्वीकार करना पड़ा। आश्रम में उन्हें माली का काम सौंपा गया जिसे उन्होंने बड़ी सहजता से स्वीकार किया। 

    विनोद खन्ना के सन्यस्त होते ही तरह-तरह की आलोचनाओं व टीका-टिप्पणीयों से बाजार सजने लगे। उनके अपने ही सहयोगियों ने विनोद खन्ना के इस निर्णय को सही नहीं माना, लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि विनोद खन्ना एक निराशा से भरे और अवसाद के नीचे दबे हुए इंसान हैं बहुत बड़ी तादात में लोग यह मानते थे कि विनोद खन्ना ने यह निर्णय लेकर न अपने करियर को ही तबाह और बर्बाद किया है बल्कि अपनी नासमझी का परिचय भी दिया है। 

     लोगों की आलोचनाओं और टीका- टिप्पणियों का परिणाम यह हुआ कि विनोद खन्ना के मन ने भी यह स्वीकार करने में अधिक समय नहीं लगाया, कि उनका यह निर्णय ठीक नहीं है! वे शीघ्र ही आश्रम की शान्ति और मौनता को त्याग कर पुनः अपने शोर-शराबे भरे माहौल में लौट आये और अपने सहयोगियों के कहे अनुसार स्वयं को तबाह और बर्बाद होने से बचा लिया। 

        लेकिन मैं पूंछना चाहता हूँ! उन आलोचकों से कि  क्या  आश्रम से लौटने के बाद विनोद खन्ना की जो स्थिति हुई, जो हालत हुई वह किसी भी मायने में कहा जा सकता है कि वे स्वयं को तबाह और बर्बाद होने से बचाने में सफल हो सके। क्या उनका करियर सदा के लिए तबाह और बर्बाद होने से बच सका? 

चेतावनी:


         जरा आँख खोलकर देखें यहां सभी कुछ तबाह और बर्बाद हो रहा है, यहां सभी का करियर खतरे में है यहां कोई भी सफल नहीं होता। असफलता ही इस जगत का भाग्य है, बर्बाद हो जाना ही, मिट जाना ही, लुट जाना ही, यहां की शाश्वत नियति है। यहां दिखाई तो देते हैं लोग सफल होते हुए, लेकिन अंततः वे असफल ही सिद्ध होते देखे गए हैं सम्राट हो या भिखारी असफलता सभी का जन्म सिद्ध अधिकार है। इससे अन्यथा यहां कुछ भी नसीब नहीं है। 

          जब यह सुनिश्चित हो जाये कि मिटना ही जगत का अनिवार्य तथ्य है तो फिर पत्थर पर मिटने से बेहतर है उपजाऊ भूमि में मिटें, अस्पताल के वातावरण में साँस टूटने से अच्छा है, आश्रम के सन्नाटे में श्वांस से छुटकारा मिलने का अवसर मिले। 

          बहुत कम ही सौभाग्यशाली लोगों के जीवन में ऐसा सौभाग्यशाली क्षण आता है, जब उनमें इतना साहस जागृत होता है, इतना विवेक प्रगाढ़ होता है कि वे देख पाते हैं जगत का परिणाम क्या होने वाला है वह सौभाग्यशाली क्षण, वह अनमोल अवसर विनोद खन्ना ने गवांया सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान है वह क्षण यदि वह हांथ से निकल जाए, हाँथ से फिसल जाए तब समझना कि वास्तविक करियर बर्बाद हुआ जा रहा है उससे पहले तो सब बर्बादी, सब तबाही स्वाभाविक है! वह तो एक तथ्य है, वह तो होगा ही, वह होना ही है, उससे बचा नहीं जा सकता लेकिन जिससे बचा नहीं जा सकता लोग उसी को बचाने में संलग्न रहते हैं, चिन्तित रहते हैं। 

          इसलिए मैं कहना चाहता हूं उन मित्रों से! जो कूद गए हैं परमात्मा के सागर में उन्हें दुनिया की आलोचनाओं और टीका-टिप्पणियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए नहीं तो आप भी उस अवसर से चूक सकते हैं उस अवसर से चूक जाना ही, उस क्षण को गंवा देना ही सबसे बड़ी पराजय है, सबसे बड़ी असफलता है, सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। 

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