अन्न नहीं 'इंसाफ, गरीब का भोजन है।



       पिछले चुनाव में बीजेपी पार्टी की ओर से चुनाव आयोग से शिकायत की गई मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को लेकर। शिकायत में मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को पहचान करने में बाधक बताया गया।


          पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए, समाजवादी पार्टी के नेता 'नरेश अग्रवाल जी' ने बीजेपी नेताओं पर चुटकी लेते हुए कहा कि शिकायत वे लोग करते हैं जो कमजोर होते हैं। पता नहीं नरेश अग्रवाल जी यह कैसे कह गए, शायद भूल से कह गए होंगे। लेकिन बात वे बड़े राज की कह गए नेता भी कभी -कभी भूल-भटक से सच्ची बातें कह जाते हैं।

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         नरेश अग्रवाल जी का यह वक्तव्य कि कमजोर शिकायत करते हैं, यह सोलह आने सच है। दरअसल यह जो चौरस्ते पर पुलिसवाला खड़ा है, ये जो न्यायालय व उच्च्नयालय बनाए गए हैं, ये जो तमाम तरह की न्याय-नीतियां गठित की गई हैं, अदालतें, कोट-कचहरी, न्यायालय, न्यायाधीश, न्यायपालिकाएं, यह सब तामझाम उस कमजोर के लिए ही चलाया जा रहा है, उस गरीब के लिए, पिछड़े के लिए, असहाय के लिए, दबे-कुचले के लिए ही खड़ा किया गया है!

          आप शायद सोंचते होंगे ताकतवर के लिए, बलवान के लिए, धनवान के लिए, दबंग के लिए यह सब संचालित है तो आप गलत हैं। धनवान को, बलवान को, दबंग को न्याय-व्यवस्था से कुछ विशेष लेना-देना नहीं है। वह न्याय पाने के लिए कहीं न्यायलयों के चक्कर काटने जाता हो यह जरूरी नहीं है। उसके साथ जब कुछ गलत होता है तो वह अपना न्याय स्वयं ही कर लेता है, तत्काल! वह स्वयं ही न्यायकर्ता है, तुम देखते हो, किसी रिक्शेवाले से किसी दबंग की कार में जरा सी खरोंच लग जाये तो वह तत्काल उसकी भरपाई करवा लेता है। यदि रिक्शावाला न-नुकर करे तो थप्पड मार कर छीन लेता है।

          और यही हादसा जब किसी गरीब के साथ होता है, तो उसके नुकसान की भरपाई करवाने वाला कोई भी नहीं है। और भी मजेदार बात तो यह है कि वह जब न्याय की आस में न्याय के मंदिरों में जाता है तो वहाँ भी उसे यातनाएं ही झेलनी पड़ती हैं। गरीबों के लिए, कमजोरों के लिए हमारे न्यायालय कहना चाहिए कि सिर्फ यातना शिविरों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। जाओ देखो कोट-कचहरीयों के बाहर गरीबों की, किसानों की कतारें लगी हैं, गरीब बेचारे पैकरमा कर रहे हैं, दौड़ लगा रहे हैं और वे दबंग उनकी जमीनों पर फसलें काट रहे हैं।

          और हमारे नेता, हमारे मुखिया, इसी न्याय-प्रणाली की स्तुति में संलग्न हैं। तुमने कभी गरीब को, किसान को, मजदूर को संविधान का गुणगांन करते हुए न देखा होगा ? संविधान के विषय में कुछ भला बुरा होने लगे तो गरीब सड़कों पर प्रदर्शन नहीं करने लगते। RSS के लोग करते हैं, पूंजीपति करते हैं, कांग्रेस के खड़गे साहब करते हैं! लेकिन वे सब इसलिए नहीं गुणगान करते हैं कि संविधान में सभी को बराबर अधिकार देने की बात कही गई है बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि संविधान में वे अपना बचाव खोज पाते हैं, राहत खोज पाते हैं, जेल में बैठकर भी चुनाव जीत पाते हैं, हत्याएं करके भी क्षण में छूट पाते हैं। इसलिए ऐसे लोग गुणगान तो करेंगें ही, पिसता तो गरीब है! सारे नियम-कानून इस गरीब पर ही लागू हो पाते हैं।

         इसलिए आश्चर्यचकित न होओ जानकर कि फैसला 17, साल में आया या 18, साल में या 13, साल में यह सब खूब अध्ययन-मनन का परिणाम है। इस देरी के पीछे बहुत गहरा मनोविज्ञान है। एक संत के संबंध में सुना है वह कहता था मैने मेरे पिता जी से यह सीखा है कि अगर कोई गाली दे जाय तो तत्काल उसका उत्तर न देना अगर तुम टाल सके तो तुम्हारा क्रोध जाता रहेगा, जितना तुम टालोगे, उतना ही तुम्हारे भीतर बदले की भावना न्यून होती जायेगी और एक दिन तुम पूर्णरूप से बदले की भावना से बाहर हो जाओगे।

          हमारे न्यायालय किसी संत से कम नहीं हैं, वे टालते हैं दिन पर दिन, तारीख पर तारीख़ ताकि शिकायत करने वाले की मांग ठंडी पड़ जाए और अभियुक्त को मजे से छोड़ा जा सके।

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          और पैसा न हो तो अदालत की ओर देखना भी गुनाह है। यह सही! परन्तु पैसा हो तो भी अदालत की जरूरत नहीं है, तब तो तुम स्यमं ही अदालत हो! अदालत की ओर देखना जिसके पास पैसा नहीं है उसका  गुनाह नहीं है! अदालतों का गुनाह है! अदालतों को अपने उपर लग रहे इस लांछन से बचना चाहिए, और कमजोरों को न्याय मिल सके इस पर विचार न करके, कमजोरों के साथ अन्याय न होने पाये इस विचार करना चाहिए। अभी तो हम उलटी गंगा बहा रहे हैं! इसलिए तो गरीब व कमजोर भटक रहे हैं और वे भटकते ही रहेंगे! ठीक कहते हैं नरेश अग्रवाल साहब, शिकायत वे करते हैं जो कमजोर हैं, जो गरीब हैं, जो असहाय हैं! निश्चित ही यह शर्मनाक है।।


          
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