माया क्या है? यह जानने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि द्रश्य क्या है। क्योंकि यह प्रश्न आंख से संबंधित है।

माया क्या है? यह जानने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि द्रश्य क्या है। क्योंकि यह प्रश्न आंख से संबंधित है। 



         अगर हम पूछें कि ध्वनि क्या है तो यह कान से संबंधित है फिर हमें कान का विज्ञान समझना पड़ेगा। कान अर्थात ध्वनि, द्रश्य अर्थात आंख, इसी तरह प्रत्येक शब्द किसी न किसी इंद्रिय से संबंधित है। माया 'द्रश्य, है, आंख द्रष्टा है। इसलिए आंख के ही विज्ञान को समझना पड़ेगा। विज्ञान के अनुसार देखने के लिए तीन तत्वों की मौजूदगी अनिवार्य है। एक प्रकाश दूसरा पदार्थ या वस्तु और तीसरा हमारी आंख, इनमें से अगर एक भी नदारद हुआ तो वह देखने की घटना नहीं हो सकती यह विज्ञान की खोज है। 

माया क्या है? यह जानने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि द्रश्य क्या है। क्योंकि यह प्रश्न आंख से संबंधित है।
practical life

          किन्तु यह पूर्णतः सत्य नहीं है क्योंकि हम सपने देखते हैं बिना प्रकाश की किरण के, बिना वस्तु की मौजूदगी में, रस्सी में सांप देखते हैं, संसार में सुख देखते हैं और इतना स्पष्ट देखते हैं जितना वास्तविक जगत को नहीं देख पाते। अगर विज्ञान की व्याख्या एकदम ठीक है तो भ्रम नहीं होना चाहिए, सब स्पष्ट और साफ सुथरा होना चाहिए। लेकिन भ्रम होता है लोगों को रस्सी में सांप दिखाई पड़ रहा है। यह कैसे संभव हो पाता है विज्ञान इसकी व्याख्या नहीं करता। लेकिन आध्यात्म ने उसकी भी व्याख्या की है। आध्यात्म कहता है कि जैसा जगत हमारे बाहर है ठीक वैसा ही जगत हमारे भीतर भी मौजूद है। वही चांद, वही सूरज, वही आकाश, वही हिमालय, वही नदियाँ, वही पहाड़, वही सागर समस्त ब्रह्मांड भीतर विराजमान है। बाहर और भीतर में एक समांतर दुनियां का आस्तिव है। बाहर के जगत में हमें वही दिखाई पड़ता है जिसे हमने भीतर के जगत में देखा है। बाहर प्रकाश इसलिए दिखाई पड़ता है क्योंकि भीतर सूर्य मौजूद है अगर यह न हो मौजूद तो बाहर हजार सूर्य भी चमक रहे हों, सब व्यर्थ हैं। 

         जब हम बाहर पड़ी रस्सी में सांप देखते हैं तब हम स्वयं के भीतर मौजूद जगत में वास्तविक सांप को ही देख रहे होते हैं। वह रस्सी सिर्फ की-वर्ड का काम करती है असली कारण भीतरी है। अब पूछा जा सकता है कि क्या इससे उल्टा भी संभव है? क्या होगा यदि भीतर  रस्सी हो और बाहर सांप दिखाई दे जाय। यह करीब-करीब नहीं होता। बुराई सदा पहले है, रावण पहले से मौजूद है राम बाद में आते हैं या कहिए हमें लाना पड़ता है, कंस पहले से मौजूद है कृष्ण को पीछे से आना पड़ा। और जिसके भीतर कंस पहले से ही बैठा हो वह कृष्ण में भी कंस को ही देखने लगता है। बुराई हमें विरासत में मिलती है, काम, क्रोध, लोभ, मोह उसके लिए कुछ प्रयत्न नहीं करना पड़ता, अच्छाई को जन्माना पड़ता है, पुरुषार्थ करना पड़ता है। काम की जगह निष्काम, क्रोध की जगह प्रेम, लोभ की जगह संतुष्टि, मोह की जगह वैराग्य पैदा करना पड़ता है। यह विरासत में नहीं मिलता। 

          इसलिए काम, क्रोध, लोभ, मोह सभी के भीतर दिखाई पड़ता है लेकिन प्रेम, करुणा, दया आदि भाव बहुत कम लोगों में दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि यह स्वभाविक नहीं हैं। रज्जु में सर्प दिखाई पड़ना स्वाभाविक है। 

माया क्या है? यह जानने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि द्रश्य क्या है। क्योंकि यह प्रश्न आंख से संबंधित है।
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         आंख वही देखती है जो भीतर है। बाहर के जगत में जो कुछ भी खोजा जाता है वह भीतर पहले ही खोज लिया जाता है। बाहर ऐसा कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है जो भीतर उपलब्ध न हो। माया का भान, तभी तक है जब तक हम कुछ अन्यथा की खोज में लगे हैं। कुछ और देख रहे हैं जहां बाहर और भीतर की घटनाएं एक हो जाती हैं, जहां बाहर और भीतर के द्रश्य एक हो जातें हैं। जहां हम उसे देखने में समर्थ हो जाते हैं जो है वहाँ सारे भ्रमजाल स्वत: ही विदा हो जाते हैं। फिर हमें रस्सी में सांप नहीं दिखाई पड़ता, फिर रस्सी ही दिखाई पड़ती है। मायाजाल समाप्त हो जाता है। 



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