मनुष्य का मन अनेक-अनेक दिशाओं से कल्पनाएँ करने में सक्षम है, और मनुष्य के लिए अनेकों प्रकार से कल्पनाएं करना संभव भी है।

       मनुष्य का मन अनेक-अनेक दिशाओं से कल्पनाएँ करने में सक्षम है, और मनुष्य के लिए अनेकों प्रकार से कल्पनाएं करना संभव भी है। कल्पना की दृष्टि से एक वे घटनाएं हैं जो अतीत में घट चुकी हैं। परंतु समय में बहुत दूर हैं, हमारी पकड़ से बाहर हैं, उन घटनाओं को जब हम याद करते हैं, जब स्मरण करते हैं तब हम कल्पना ही करते हैं।


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          यदि आज हम महाभारत को याद करते हैं, चित्रित करते हैं, तो वह चित्र, वह कथा हमारे लिए महज एक कल्पना है वास्तविक नहीं है, वास्तविक रही होगी कभी उनके लिए जो उस समय में मौजूद थे। हम वर्तमान में मौजूद हैं। अतीत के बाबत हमारा मन जो चित्रित कर रहा है, जिस संबंध में बता रहा है। चाहे चित्र के माध्यम से, चाहे कथा-कहानी़ के माध्यम से वह घटना अतीत में घट चुकी है। जहां हम मौजूद नहीं थे। यह एक प्रकार की कल्पना है।

इसे हम एक उदाहरण द्वारा समझेंगें।


          जैसे डायनासोर हैं, समय में इतनी दूर हैं कि उनके वास्तविक ढांचे को पकड़ पाना लगभग असंभव है इसलिए जो भी चित्र हम बनाएंगे वह हमारी कल्पना ही होगी। वह कोशिश होगी यह समझाने की कि वह लगभग ऐसा ही रहा होगा। वह भी हम इसलिए समझा पाते हैं क्योंकि हमारे पास उसके विषय में जानकारी है, उसके अवशेष हैं, उसका DNA है, उन्हीं अवशेषों के आधार पर, उसी DNA के बल पर हम उस को चित्रित कर पाते हैं और कह पाते हैं, समझा पाते हैं। लेकिन है वह कल्पना ही क्योंकि हम वहाँ वर्तमान नहीं थे। 

दूसरे प्रकार की कल्पना:-

          यह जो दूसरे प्रकार की कल्पना है, इससे हम उन घटनाओं को भी चित्रित कर पाने में सक्षम हैं जो अभी घटी ही नहीं हैं, जो अभी प्रकट ही नहीं हुई हैं। और न ही वे अतीत में कभी घटी हैं, जो अभी वास्तविक नहीं हैं, जिनका कोई वजूद ही नहीं है। उनकी भी कल्पना मनुष्य कर पाता है। मनुष्य ऐसी भी घटनाओं को चित्रित कर पाने में सक्षम है ऐसी भी कहानियां गढ़ पाने कुशल है, जो अभी संशंय का भी विषय नहीं हैं।

कुछ उदाहरण देखते हैं।

          जैसे हिंदू कल्पना करते आए हैं, हिंदुओं के 24वें अवतार कल्कि भगवान की वे अभी अवतरित नहीं है अतीत में कभी हुए भी नहीं हैं अन्य अवतार हुए हैं उनका इतिहास हमारे पास है लेकिन कल्कि का कोई इतिहास नहीं है, कोई जन्मकुंडली नहीं है क्योंकि वह घटना अभी घटी नहीं है। लेकिन जो घटना घटी नहीं है उसका भी चित्र हमारे पास मौजूद है। हिन्दुओं ने कल्कि भगवान का चित्र बना रखा है जिसमें उन्होंनें कल्कि भगवान के अवतार को घोड़े पर सवार दिखाया है।

          कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं कि जब वे गढ़ी गईं तब भी कहानियाँ थीं और आज भी कहानियाँ हैं। कुछ सिद्धांत भी ऐसे ही होते हैं जिन्हें कभी वास्तविक रूप नहीं मिल पाता।

          ऐसा ही राम राज्य के संबंध में है। ऐसे रामराज्य की घटना कभी अतीत में घटी नहीं है जैसी कल्पना तुलसीदास जी ने की है! "दैविक, दैहिक, भौतिक तापा, राम राज्य में कबहुं न व्यापा "राम का राज्य तो अवश्य ही रहा है वह एक वास्तविकता है उसके परमाण हैं, उसका इतिहास है। लेकिन ऐसा रामराज्य जहाँ दैविक, दैहिक, भौतिक तापा, कबहुं न व्यापा" हो ऐसा रामराज्य अभी कल्पना मात्र है वह किसी राम के राज्य की वास्तविकता नहीं है। रामचंद्र जी के जीवन की एक घटना है जब वे पंद्रह सोलह वर्ष की आयु में तीर्थयात्रा करके अयोध्या लौटे तब वे बीमार पड़ गए, उन्हें बैराग्य ने घेर लिया। कई-कई दिनों तक वे भूखे प्यासे एकांत में बैठे रहते। उनकी देह पीली पड़ गई।


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ऐसी कल्पना जो सत्य बन जाती है।


           रामराज्य भविष्य में घटित होने वाली घटना है, अतीत से उसका कोई संबंध नहीं है और यदि भविष्य में भी वह संभव होगा तो भी वह धार्मिक कल्पना के बल पर नहीं संभव होगा, वह विज्ञान की कल्पना से ही संभव होगा। क्योंकि विज्ञान की कल्पना सौ में निन्यानवे मौकों पर सत्य सिद्ध होती है और धार्मिक कल्पना सौ में निन्यानवे मौकों पर असत्य सिद्ध होती है।

          धार्मिक कल्पना के द्वारा सदियों से लोगों को कहा जा रहा है कि घबराओ न प्रभु के मार्ग पर मरोगे तो प्रभु तुम्हें पुनः जीवित करेंगें। आज तक एक भी आस्थावान व्यक्ति इस कल्पना के द्वारा जीवित नहीं किया जा सका। पुनर्जीवन के संबंध में विज्ञान की कल्पना ने अभी-अभी जन्म लिया है। लेकिन अभी से ही उसने तमाम लोगों को अपने ऊपर भरोसा करने के लिए बाध्य कर दिया है। क्योंकि विज्ञान का मस्तिष्क एक प्रर्थक कल्पना से संबंधित है। यह कल्पना करीब-करीब सत्य की पर्यावाची है।
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